MN 41
Sāleyyaka sutta: सालेय्य-सुत्तन्त
Sāleyyakasutta
Cūḷayamakavagga
Traduceri
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् महान् भिक्षु-संघ के साथ कोसल (देश) में विचरते जहाँ कोसल (= वासियों) का साला (= शाला) नामक ब्राह्मण-ग्राम है, वहाँ पहूँचे।
शाला के ब्राह्मण गृहस्थों ने सुना—शाक्य-कुल से प्रब्रजित शाक्य-पुत्र श्रमण गौतम महान् भिक्षु-संघ के साथ कोसल मंे विचरते शाला में आ पहूँचें हैं। उन भगवान् गौतम का ऐसा मंगल कीर्तिशब्द उठा हुआ है—‘वह भगवान् अर्हत् है ॰, भगवान् बुद्ध हैं। वह ब्रह्मलोक-सहित ॰ ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करते हैं। ऐसे अर्हतो का दर्शन अच्छा होता है।
तब शाला-निवासी ब्राह्मण गृहस्थ जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये; जाकर (कोई कोई) भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। कोई कोई भगवान् से कुशल क्षेम पूछ एक ओर बैठ गये। कोई कोई जिधर भगवान् थे, उधर हाथ जोडकर ॰। कोई कोई नाम-गोत्र सुनाकर एक ओर बैठ गये। कोई कोई चुप-चाप एक ओर बैठ गये।
एक ओर बैठे शाला-निवासी ब्राह्मण गृहस्थों ने भगवान् से यह कहा—
“हे गौतम! क्या हेतु है=क्या प्रत्यय है, जो कोई प्राणी काया छोड मरने के बाद अपाय=दुर्गति, पतन नर्क में उत्पन्न होते हैं? हे गौतम! क्या हेतु है=क्या प्रत्यय है, जो कोई प्राणी काया छोड मरने के बाद सुगति, स्वर्गलोक में उत्पन्न होते हैं?
“गृहपतियो! अधर्माचरण के कारण कोई प्राणी ॰ नर्क में उत्पन्न होते है। धर्माचरण के कारण गृहपतियों! कोई प्राणी सुगति, स्वर्गलोक में उत्पन्न होते है।
“हम लोग आप गौतम के इस विस्तार से न विभाजित किये, संक्षिप्त भाषण का विस्तारपुर्वक अर्थ नहीं समझ रहे है। अच्छा हो, आप गौतम हमे इस प्रकार धर्म उपदेश करें, जिसमें आप गौतम इस विस्तार से न विभाजित किये, संक्षिप्त भाषण का विस्तारपूर्वक अर्थ हम समझ सकें।”
“तो गृहपतियो! सुनो, अच्छी तरह मन में करों, कहता हूँ।”
“अच्छा, भो!”—कह, शाला-निवासी ब्राह्मण गृहस्थों ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—“गृहपतियों! कायिक अधर्माचरण, विषम आचरण तीन प्रकार का होता है। वाचिक अधर्माचरण, विषम-आचरण चार प्रकार का होता है। मानसिक अधर्माचरण, विषम-आचरण तीन प्रकार का होता है। गृहपतियो! कैसे कायिक अधर्माचरण ॰ तीन प्रकार का होता है?—यहाँ गृहपतियो! कोई (पुरूष) (1) हिंसक, क्रुर, लोहित-पाणि (= खून रंगे हाथों वाला), मार-काट में रत, प्राणियों के प्रति निर्दयी होता है। (2) अदिन्नादायी (= चोर) होता है, जो दूसरे का बिना दिया, चोरी का कहा जाने वाला गाँव में या जंगल में रक्खा धन-सामान है, उसका लेने वाला होता है। (3) कामों (= स्त्री संभोग) में मिथ्याचारी (= दुराचारी) होता है; उन (स्त्रियों) के साथ संभोग करता है, जो कि माता द्वारा रक्षित है, पिता द्वारा रक्षित, माता-पिता द्वारा रक्षित, जाति-वालों द्वारा रक्षित, भगिनी द्वारा रक्षित, जातिवालों द्वारा रक्षित, गौत्रवालों द्वारा रक्षित, धर्म से रक्षित हैं, पति वाली दंडयुक्त हैं, अन्त में (विवाह संबंधी) माला मात्र भी जिन पर डाल दी गई है। इस प्रकार गृहपतियो! तीन प्रकार का कायिक अधर्माचरण ॰ होता है।
“कैसे गृहपतियों! चार प्रकार का वाचिक अधर्माचरण ॰ होता है?—यहाँ गृहपतियों! कोई (पुरूष) (1) मिथ्यावादी होता है। सभा में, या परिषद् में, या जाति के मध्य में, या पूग (= पंचायत) के मध्य में, राजदर्बार में, बुलाने पर साक्षी के लिये—‘हे पुरूष! जो जानते हो, वह काहे।’—(पूछने पर); वह न जानते हुए कहता है—‘मैं जानता हूँ’, जानते हुये कहता हे—‘मैं नहीं जानता’। न देखे कहता है—‘मैंने देखा है’; देखे हुए कहता है—“मैंने नहीं देखा।’ इस प्रकार अपने लिये या पराये के लिये, या थोडे आमिष (= भोगवस्तु) के लिये जानबूझकर झूठ बोलता है। (1) चुगुलखोर होता है—इनमें फूट डालने के लिये वहाँ सुनकर वहाँ कहता है; उनमें फूट डालने के लिये, वहाँ सुनकर यहाँ कहता है। इस प्रकार मेलजोल वालों को फोडनेवाला, फूटे हुओं (की फूट) को सह देने वाला, वर्ग (= पार्टीबाजी) में खुश, वर्ग में रत, वर्ग में आनन्दित, वर्गकरणी वाणी का बोलने वाला होता है। (3) परूष (= कटु)-भाषी होता है—जो वाणी तेज, कर्कश, दूसरे को कडवी लगने वाली, दूसरे को पीडित करने वाली, क्रोधपूर्ण, अशांति पैदा करने वाली है, वैसी वाणी का बोलने वाला होता है। (4) प्रलापी होता है—बेवक्त बोलने वाला, अयथार्थ बोलने वाला=अतथ्यवादी, अधर्मवादी, अ-विनय (= अनीति)-वादी, बिना समय, बिना-उद्देश्य के तात्पर्य-रहित, अनर्थयुक्त निस्सार वाणी का बोलने वाला होता है। इस प्रकार गृहपतियो! चार प्रकार का वाचिक अधर्माचरण ॰ होता है।
“कैसे गृहपतियो! तीन प्रकार का मानसिक अधर्माचरण ॰ होता है?—यहाँ गृहपतियो! कोई (पुरूष) (1) अभिध्यालु (= लोभी) होता है; जो दूसरे का धन-सामान (= वित्त-उपकरण) है, उसका लोभ करता है—‘अहो! जो दूसरे का (धन) है, वह मेरा हो जाता।’ (2) व्यापन्नचित्त=द्वेषपूर्ण संकल्पवाला होता है—‘यह प्राणी मारा जायें, वध किये जायें, उच्छिन्न होवें, विनष्ट होवे, मत रहें’—इत्यादि। (3) मिथ्यादृष्टि=उलटी धारणावाला होता है—‘दान कुछ नहीं’, यज्ञ कुछ नहीं, हवन कुछ नहीं, सुकृत दुष्कृत कर्मो का कोई फल=विपाक नहीं, यह लोक नहीं, परलोक नहीं, माता नहीं, पिता नहीं, औपपातिक सत्व (अयोनिज प्राणी=देवता लोग) नहीं है। लोक में ठीक-पहूँच वाले ठीक-रास्ते-पर-लगे ऐसे श्रमण ब्राह्मण नहीं हैं, जो इस लोक और परलोक को स्वयं जान कर साक्षात्कार कर (औरों को) जतलायेंगे। इस प्रकार गृहपतियो! तीन प्रकार का मानसिक अधर्माचरण ॰ होता है।
“गृहपतियो! इस प्रकार अधर्माचरण=विषम-आचरण के कारण कोई प्राणी काया छोड मरने के बाद ॰ नरक में जाते है।
“गृहपतियो! तीन प्रकार का कायिक धर्माचरण=सम-आचरण होता है। चार प्रकार का वाचिक धर्माचरण=सम-आचरण होता हे। तीन प्रकार का मानसिक धर्माचारण=सम-आचरण होता है। कैसे गृहपतियो! तीन प्रकार का कायिक धर्माचारण ॰ होता है?—यहाँ गृहपतियो! कोई (पुरूष) (1) प्राणातिपात (= हिंसा) छोड प्राणातिपात से विरत होता है—वह दण्ड-त्यागी, शस्त्रत्यागी लज्जालु, दयालु, सारे प्राणियों का हित और अनुकंपक हो विहरता है। (2) अदिन्नादान (= चोरी) को छोड, अदिन्नादान से विरत होता है—जो दूसरे का बिना दिया ॰ उसका न लेने वाला होता है। (3) कामों (= स्त्री-संभोग) के मिथ्याचारकों छोड, काम-मिथ्याचार से विरत होता है। उन स्त्रियों के साथ संभोग करता, जो कि माता द्वारा रक्षित है ॰। इस प्रकार गृहपतियो! तीन प्रकार का कायिक धर्माचरण ॰ होता है।
“कैसे गृहपतियो! चार प्रकार का वाचिक धर्माचरण ॰ होता है?—यहाँ गृहपतियों! कोई (पुरूष) (1) मृषावाद को छोड मृषावाद से विरत होता है। समा में ॰ जानबूझकर झूठ नहीं बोलता। (2) पिशुनवचन (= चुगली) छोड, विशुनवचन से विरत होता है। इनमं फूट डालने ॰ फूटे हुओं का मिलाने वाला होता है, मेलजोल वालों को सहायता देने वाला होता है। मेल में रत, मेल में प्रसन्न, मेल में आनंदति, मेलकरणी वाणी का बोलने वाला होता है। (3) परूषवचन को छोड, परूषवचन से विरत होता है। जो वह वाणी मधुर, कर्णसुखद, प्रेमणीय, हृदयंगम, सभ्य (= पौरी), बहुजन-कान्ता=बहुजन-मनापा होती है, उसका बोलने वाला होता है। (4) प्रलाप को छोड प्रलाप से विरत होता है।—समय देख बोलने वाला ॰ अर्थयुक्त सारवती वाणी का बोलने वाला होता है। इस प्रकार ॰।
“कैसे गृहपतियो! तीन प्रकार का मानसि धर्माचरण ॰ होता है?—यहाँ गृहपतियो! कोई (पुरूष) (1) अभिध्या-रहित (= निर्लोम) होता है—जो दूसरे का धन-सामान है ॰ उसका लोभ नहीं करता। (2) अ-व्यापन्न चित्त रहित-द्वेष संकल्प वाला होता है—यसह प्राणी वैर-रहित, व्यापाद (= द्रोह)-रहित प्रसन्न सुखी हो अपने को धारण करें। (3)सम्यग्-दृष्टि=ठीक धारणा वाला होता है—यज्ञ है, हवन है ॰ ऐसे श्रमण ब्राह्मण है, ॰ जतलायेंगे। इस प्रका गृहपतियों तीन प्रकार का धर्माचरण ॰ होता है।
“गृहपतियो! इस प्रकार धर्माचारण=सम-आचरण के कारण कोई प्राणी काया छोड मरने के बाद सुगति, स्वर्ग में उत्पन्न होते हैं।
“गृहपतियो! यदि धर्मचारी=समचारी इच्छा करे—‘अहो! मैं काया छोड मरने के बाद महाधनी क्षत्रिय हो उत्पन्न होऊँ; यह हो सकता है, कि वह ॰ मरने के बाद महाधनी क्षत्रिय हो उत्पन्न होवे। सो किस कारण?—वह वैसा धर्माचारण करने वाला है, सम-आचरण करने वाला हे। गृहपतियों! यदि धर्मचारी इच्छा करे—‘अहो! मैं ॰ महाधनी ब्राह्मण हो उत्पन्न होऊँ; ॰। ॰—‘अहो मैं महाधनी गृहपति (= वैश्य) हो उत्पन्न होऊँ;॰।
“गृहपतियो! यदि कर्मचारी ॰ इच्छा करे—‘अहो! मैं ॰ चातुर्महाराजिक देवताओं में उत्पन्न होऊँ; ॰। ॰ त्रायस्त्रिंश देवताओं में ॰। ॰ तुषित देवताओं में ॰। ॰ निर्माणरति देवताओं में ॰। ॰ परनिर्मित-वशवर्ती देवताओं में ॰। ॰ ब्रह्म-कायिक देवताओं में ॰। ॰ आभा देवताओं में ॰। ॰ परीत्ताभ देवताओं में ॰। ॰ अप्रमाणाभ देवताओं में ॰। ॰ आभस्वर देवताओं में ॰। ॰ शुभ देवताओं में ॰। ॰ परात्त-शुभ देवताओं में ॰। ॰ अप्रमाण-शुभ देवताओं में ॰। ॰ शुभकृत्स्र देवताओं में ॰। ॰ बृहत्फल देवताओं में ॰। ॰ अविभ देवताओं में ॰। ॰ आतप्य देवताओं में ॰। ॰ सुदर्शन देवताओं में ॰। ॰ सुदर्शी देवताओं में ॰। ॰ अकनिष्ठक देवताओं में ॰। ॰ आकाशानन्त्यायतन के देवताओं में ॰। ॰ विज्ञानानत्यायतन केदेवताओं में ॰। ॰ आकिंचन्यायतन के देवताओं में ॰। ॰ नैवसंज्ञानासंज्ञायतन के देवताओं में ॰।
“गृहपतियो! यदि धर्मचारी=समचारी इच्छा करे—‘अहो! मैं आस्रवों (= चित्त-मलों) के क्षय से आस्रव-रहित चित्त की विमुक्ति, प्रज्ञा की विमुक्ति को इसी जन्म में स्वयं जानकर साक्षात्कार कर प्राप्त कर विहरूँ। यह हो सकता है, कि वह आस्रवों के क्षय से ॰ प्राप्त कर विहरे। सो किस कारण?—वह वैसा धर्मचारी=समचारी है।”
ऐसा कहने पर शाला-निवासी ब्राह्मण गृहस्थों ने भगवान् से यह कहा—
“आश्चर्य भो गौतम! आश्चर्य भो गौतम! जैसे औधे को सीधा कर दे ॰ यह हम भगवान् गोतम की शरण जाते हैं, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आज से आप गौतम हमें अंजलिबद्ध शरणागत उपासक स्वीकार करें।
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Fie ca toate ființele să fie fericite