Uposatha

← Discursuri medii

MN 71

Tevijjavaccha sutta: तेविज्ज-वच्छगोत्त-सुत्तन्त

Tevijjavacchasutta

Paribbājakavagga

Traduceri

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् वैशालीमें महावनकी कूटागार-शालामें विहार करते थे।

उस समय वच्छ-गोत्त (= वत्सगोत्र) परिबा्रजक एक-पुण्डरीक परिब्राजकाराममे वास करता था। भगवान् पूर्वाहृ-समय पहिनकर, पात्रचीवर ले, वैशालीमें पिड-चारके लिये प्रविष्ट हुये। तब भगवानको ऐसा हुआ — अभी वैशालीमें पिडचार करनेके लिये बहुत सबेरा है। क्यों न मैं जहाँ एक-पुण्डरीक परिब्राजकाराम है, जहाँ वच्छ-गोत्त परिब्राजक है, वहाँ चलू। तब भगवान् ० वहाँ गये।

वच्छ-गोत्त परिब्राजकने दूरसे ही भगवान्को आते देखा। देख कर भगवान् से बोला—

“आइये भन्ते! भगवान्! स्वागत भन्ते! भगवान् बहुत दिन हो गया भन्ते! भगवान् को यहाँ आये। बैठिये भन्ते। भगवान्। यह आसन बिछा है।”

भगवान् बिछे आसनपर बैठ गये। वत्स गोत्र परिबा्रजक भी एक नीचा आसन लेकर, एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे वत्स-गोत्र परिब्राजकने भगवान् से कहा—

“सुना है भन्ते!—“श्रमण गौतम सर्वज्ञ=सर्वदर्शी है, निखिल ज्ञान-दर्शन (= ज्ञानके साक्षात्कार करने) का दावा करते है। चलते, खडे, सोते, जागते (भी उनको) निरंतर सदा ज्ञान-दर्शन उपस्थित रहता है, । क्या भन्ते। (ऐसा कहनेवाले) भगवान्के प्रति यथार्थ कहनेवाले हैं, और भगवान्को असत्य=अभूतसे निन्दा (= अभ्याख्यान) तो नही करते? धर्मके अनुकुल (तो) वर्णन करते हैं? कोई सह-धार्मीक (= धर्मानुकूल) वादका अ-ग्रहण, गर्हा (= निंदा ) तो नहीं होती।”

“वत्स! जो कोई मुझे ऐसा कहते हैं—“श्रमण गौतम सर्वज्ञ है ०। वह मेरे बारेमें यथार्थ कहनेवाले नहीं हैं। अ-सत्य (= अभूत) से मेरी निंदा करते हैं।”

“कैसे कहते हुये भन्ते! हम भगवान्के यथार्थवादी होंगे, भगवान्को अभूत (= असत्य) से नहीं निन्देंगे०?

“वत्स!— श्रमण गौतम त्रैविद्य (= तीन विद्याआंे का जानने वाला) है, —ऐसा कहते हुये, मेरे बारेमें यथार्थवादी होगा ०। (1) वत्स! मैं जब चाहता हूँ, अनेक किये पूर्व निवासो (= पूर्वजन्मों) को स्मरण कर सकता हूँ, जैसे कि—एक जाति (= जन्म) ०। इस प्रकार आकार (= शरीर आकृति आदि), नाम (= उद्देश) के सहित अनेक पूर्वजन्मोको स्मरण करता हूँ। (2) वत्स! मैं जब चाहता हूँ, अ-मानुप विशुद्ध दिव्य-चक्षुसे मरते, उत्पन्न होते, नीच-ऊॅंच, सुवर्ण-दुर्वर्ण, सुगत-दुर्गत ० कर्मानुसार (गति को) प्राप्त सत्वोंको जानता हूँ। (3) वत्स! मैं आस्त्रवों (= राग-द्वेष आदि) के क्षयसे आस्त्रव-रहित चित्तकी विमुक्ति (= मुक्ति) प्रज्ञाद्वारा विमुक्तिको इसी जन्ममें स्वयं साक्षात् कर=प्राप्त कर विहरता हूँ।”

ऐसा कहनेपर वत्स गोत्र परिबा्रजकने भगवान्से कहा—

“भो गौतम! क्या कोई गृहस्थ, जो गृहस्थके संयोजनों को (= बंधनो) को बिना छोडे, कायाको छोड दुःखका अन्त करनेवाला (= निर्वाण प्राप्त करनेवाला) हो?”

“नही वत्स! ऐसा कोई गृहस्थ नही ०।

“भो गौतम! है कोई गृहस्थ, जो गृहस्थके संयोजनोंको बिना छोडे, काया छोडने (= मरने) पर, स्वर्गको प्राप्त होनेवाला हो?”

“वत्स! एक ही नही सौ, सो नही दोसौ, ०तीनसौ, ० चारसौ, ० पाचसौ, और भी बहुतसे गृहस्थ है, (जो) गृहस्थके संयोजनोंको बिना छोडे, मरनेपर स्वर्गगामी होते हैं।”

“भो गौतम! है कोई आजीवक, जो मरनेपर दुःखका अन्त करनेवाला हो?”

“नही, वत्स! ०।”

“भो गौतम! है कोई आजीवक जो मरनेपर स्वर्गगामी हो ?”

“वत्स! यहा से एकानवे कल्प तक मैं स्मरण करता हूँ, किसीको भी स्वर्ग जानेवाला नहीं जानता, सिवाय एककेः और वह भी कर्म-वादी=क्रियावादी था।”

“भो गौतम! यदि ऐसा है तो यह तीर्थायतन (= पंथ) शून्य ही है, यहाँ तक कि स्वर्ग-गामियोंसे भी।”

“वत्स! ऐसा होते यह , पंथ, शून्य ही है ०।

भगवान्ने यह कहा! वत्स-गोत्र परिबा्रजकने सन्तुष्ट हो, भगवान्के भाषणका अनु-मोदन किया।

Despre această traducere

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Fie ca toate ființele să fie fericite