Упосатха

← Средние наставления

МН 107

Gaṇakamoggallāna sutta: गणक-मोग्गलान-सुत्तन्त

Gaṇakamoggallānasutta

Devadahavagga

Переводы

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान श्रावस्ती में मृगारमाता के प्रासाद पूर्वाराम में विहार करते थे।

तब गणक-मोग्गलान ( मौद्गल्यायन ) ब्रामण जहां भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान के साथ संमोदन कर एक और बैठा। एक ओर बैठे गणक-मोग्गलान ब्राम्हण ने भगवान से यह कहा —

“जैसे, भो गौतम ! इस मृगार-माता के प्रासाद में अंतिम सोपान के कलेवारतक क्रमिक (दर्जे-बदर्जे) शिक्षा, क्रमिक शिक्षा देखी जाती है। इन धनुर्धरों के इपु-अस्त्र में भी क्रमिक शिक्षा, देखी जाती है। हम गणकों, गणना से जीविका करने वालों के संख्यान (गणन) में भी क्रमिक शिक्षा, देखी जाती है। हम अन्तेवासी (विद्यार्थी) पाकर पहिले यह गिनवाते हैं- एकका एक, दुक्के दो, तिक्के तीन, चऊके चार, पंचमें पाँच, छक्के छः, सत्ते सात, अट्ठे आठ, नवाई नौ, दहाई दस। भो गौतम! हम सौ (तक) भी (इसी तरह) गिनवाते हैं। क्या, भो गौतम ! इस (आपके) धर्म-विनय (धर्म) में भी इसी प्रकार क्रमिक शिक्षा बतलाई जा सकती है।”

“बतलाई जा सकती है, ब्राम्हण ! इस धर्म-विनय में भी क्रमिक शिक्षा, जैसे, ब्राम्हण ! चतुर चाबुकसवार, उत्तम खेत के (आजानीय) भद्र अश्व को पाकर पहिले मुंह में (लगाम) पकडाने की क्रिया (कारण) सिखलाता है, फिर आगे की क्रिया बतलाता है। ऐसे ही ब्राम्हण ! तथागत दम्य (संयत) बनाने लायक पुरूष को पाकर पहिले इस प्रकार सिखाते (विनय देते) हैं। आ-भिक्षु ! तू शीलवान् बन, प्रातिमोक्ष (भिक्षु-नियम) को ग्रहण कर उनका अभ्यास कर।

“ब्राम्हण! अब भिक्षु शीलवान् होता है, शिक्षापदों को स्वीकार कर उनका अभ्यास कर लेता है। तब उसे तथागत आगे का विनय देते। (ले चलते) हैं- आ, भिक्षु ! तू इन्द्रियों में गुप्तहार (संयत-इन्द्रिय) हो चक्षु से रूप् को देख निमित्तग्राही, अनुव्यंजन-ग्राही मत हो। चक्षु-इन्द्रिय का संवर (संयम) कर। श्रोत्रसे शब्द को सुन, घ्राण से गंध को सूंघ, जिव्हा से रस को चख, काया से स्पष्ट को छू मन में धर्म को जान मन इन्द्रिय का संवर कर।

“ब्राम्हण! जब भिक्षु इन्द्रियों में गुप्तद्वार हो लेता है, तब उसे तथागत आगे का विनय देते हैं- आ, भिक्षु! तू जागरण में तत्पर हो। अन्तिम याम में उठकर टहलने बैठने या अन्य आचरणीय धर्मों से चित्त को शुद्ध कर।

“ब्राम्हण! जब भिक्षु जागरण में तत्पर हो लेता है, तब उसे तथागत आगे का विनय देते हैं- आ भिक्षु ! तू स्मृति संप्रजन्य से संयुक्त हो, आने-जाने में बोलने, चुप रहने में संप्रजानकारी हो।

“आ-भिक्षु! तू एकान्त में , वासकर, विचिकित्सा से चित्त को शुद्ध करता है। वह इन पाँच नीवरणों को चित्त से हटा, चतुर्थ ध्यान को प्रापत हो विहरता है।

“ब्राम्हण! जो भिक्षु शैक्ष्य (जिन्हें अभी सीखना बाकी है, जो अभी निर्वाण को नहीं प्राप्त हुये), मनकी (शुद्ध अवस्था) करे न प्राप्त है, जो अनुपम योग-क्षेम (निर्वाण) की इच्छा से विहर रहे हैं, उनके लिये मेरी सीख इस प्रकार होती है, और जो भिक्षु अर्हत् क्षीणाश्रव (चित्त-मल-विमुक्त), ब्रम्हचर्य वास पूरा कर चुके, कृत-कृत्य, भार-मुक्त, सद्-अर्थ (निर्वाण) प्राप्त, भव-बंधन-विहीन, ठीक से जानकर मुक्त है, उनके लिये यह बातें (धर्म) इसी शरीर में सुख पूर्वक विहार के लिये, तथा स्मृति संप्रजन्य (होश-चेत) के लिए हैं।”

ऐसा कहने पर गणक मोग्गलान ब्राम्हण ने भगवान से यह कहा —

“क्या आप गौतम के श्रावक (शिष्य) आप गौतम के इस प्रकार अवसाद, अनुशासन (उपदेश) करने पर सभी अत्यन्त-निष्ठावाले निर्वाण को आराधन करते हैं, या कोई-कोई नहीं आराधन करते ?”

“भो गौतम! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जो निर्वाण के रहते, निर्वाण-गामी प्रतिपदा (मार्ग) के रहते, आप गौतम (जैसे) (मार्ग) देष्टा रहते भी, कोई कोई आप गौतम के श्रावक, अनुशासन करने पर भी, निर्वाण को आराधन करते हैं, और कोई-कोई नहीं आराधन करते ?”

“तो, ब्राम्हण ! तुझे ही पूछता हॅूं, जैसा तुम्हें ठीक मालूम हो, वैसे ही इसका उत्तर दो। तो क्या मानते हो, ब्राम्हण ! राजगृह को जानेवाले मार्ग से तुम सुपरिचित हो न ?”

“हाँ, भो ! मैं राजगृह-गामी मार्ग से सुपरिचित हॅूं।”

“तो क्या मानते हो ब्राम्हण ! यहाँ कोई राजगृह जाने वाला पुरूष आवे, और तुम्हारे पास आकर यह कहे — “भन्ते ! मैं राजगृह जाना चाहता हॅूं, सो मुझे राजगृह का मार्ग बतलाइये।” तब उसे तुम यह बतलाओ- हे पुरूष ! यह मार्ग राजगृह को जाता है, इससे थोडा जाओ। इससे थोडा जाकर अमुक नामवाला गाँव देखोगे। वहाँ से थोडा (आगे) जाओ, थोडा जाकर अमुक नामवाल गाँव देखोगे। वहाँ से थोडा आगे जाओ, थोडा जाकर अमुक नामवाला गाँव देखोगे। वहाँ से थोडा (आगे) जाओ, थोडा जाकर राजगृह के आराम-सौन्दर्य, वन-सौन्दर्य, भूमि-सौन्दर्य, पुष्करिणी सौन्दर्य, पुष्करिणी सौन्दर्य को देखोगे। वह तुम्हारे ऐसा कहने, ऐसा उपदेशने पर कुरास्ता पकड़ पीछे की ओर चला जाये। फिर दूसरा राजगृह जाने वाला पुरूष आवे और तुम्हारे पास आकर यह कहे- भन्ते ! — हे पुरूष! पुष्करिणी सौन्दर्य को देखोगे। वह तुम्हारे ऐसा कहने , पर स्वस्ति पूर्वक राजगृह चला जाये। ब्राम्हण ! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है जो राजगृह के रहते राजगृह गामी मार्ग के रहते तुम जैसे (मार्ग) देष्टा के रहते, तुम्हारे द्वारा इस प्रकार उपदेशित, अनुशासित होने पर भी एक पुरूष कुरास्ता पकड पीछे की ओर चला जाता है, और दूसरा स्वस्ति पूर्वक राजगृह पहूँच जाता है।”

О переводе

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Пусть все существа будут счастливы