Упосатха

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МН 99

Subha sutta: सुभ-सुत्तन्त

Subhasutta

Brāhmaṇavagga

Переводы

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथ-पिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

उस समय तौदेप्य-पुत्र शुभ माणवक किसी काम से श्रावस्ती में (आकर) एक गृहपति के घर में रहता था। तब तौदेप्य-पुत्र शुभ माणवक ने, जिस गृहपति के धर में रहता था, उससे पूछा—

“गृहपति! मैंने सुना है कि श्रावस्ती अहंतो से रहित नहीं है। आज किस श्रमण या ब्राह्मण की पर्युपासना (=संत्संग) करूँ?”

“भन्ते! यह भगवान् श्रावस्ती में अनाथ-पिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते हैं। भन्ते! उन भगवान् की पर्युपासना करो।”

तब शुभ माणवक उस गृहपति की (बात) सुनकर, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया, जाकर भगवान् के साथ…सम्मोदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे शुभ माणवक ने भगवान् से यह कहा—

“भो गौतम! ब्राह्मण ऐसा कहते हैं—गृहस्थ ही न्याय-कुशल-धर्म (=निर्वाण) का आराधक होता है, प्रब्रजित (=संन्यासी) नहीं…। यहाँ आप गौतम क्या कहते हैं?”

“माणव! मैं यहाँ विभज्यवादी (=विभज्जवाद) हूँ। एकांशवादी नहीं। गृही के लिये भी और प्रब्रजित के लिये भी मैं मिथ्या-प्रतिपत्ति (=झूठे विश्वास) की प्रशंसा नहीं करता। चाहे गृही हो, चाहे प्रब्रजित, मिथ्या प्रतिज्ञावाला होने पर मिथ्या प्रतिपत्ति के कारण वह न्याय-कुशल-धर्म का आराधक नहीं होगा। माणव! गृही के लिये भी और प्रब्रजित के लिये भी, मैं सम्यग्-प्रतिपत्ति (=ठीक विश्वास) की प्रशंसा करता हूँ। चाहे गृही हो, चाहे प्रब्रजित, सम्यक्-प्रतिपत्ति वाला होने पर सम्यक् प्रतिपत्ति के कारण न्याय-कुशल-धर्म का आराधक होगा।”

“भो गौतम! ब्राह्मण ऐसा कहते हैं—(यह) गृह-वास (=गृहस्थी) का कर्मस्थान (=कर्म, पेशा) महा-अर्थ, महा-कृत्य, महा-अधिकरण, महा-समारम्भवाला हैं, (इसलियें) यह महाफल (दायी) है। यह प्रब्रज्या-कर्म-स्थान अल्पार्थ, अल्क-कृत्य, अल्प-अधिकरण, अल्प-समारम्भवाला हैं, (इसलिये) यह अल्पफल (दायी) है। यहाँ आप गौतम क्या कहते हैं?”

“माणव! यहाँ भी मैं विभज्यवादी हूँ, एकांशवादी नहीं। (1) हे माणव! ऐसा महार्थ, महाकृत्य, महाधिकरण, महासमारम्भवाला कर्म-स्थान, (जो) पूरा न उतरने पर अल्प-फल (दायी) होता है। (2) है माणव ऐसा (भो) महार्थ ॰ कर्मस्थान, (जो) पूरा उतरने पर अल्प-फल (दायी) होता है। (3) है माणव! ऐसा अल्पार्थ, अल्प-कृत्य, अल्पाधिकरण, अल्पारम्भवाला कर्मस्थान (जो) न पूरा उतरने पर अल्प-फल होता है। (4) है माणव! ऐसा (भी) अल्पार्थ ॰. कर्मस्थान, (जो) पूरा उतरने पर महाफल होता है।

“क्या है, माणव! (वह) कर्मस्थान (1) जो महार्थ, महाकृत्य, महाधिकरण, महासमारम्भवाला है, (किन्तु) और न पूरा उतरने पर अल्प-फल होता है?—माणव! कृषि (ऐसा) कर्मस्थान है, जो कि महार्थ ॰ महासमारम्भवाला है, किन्तु न पूरा उतरने पर अल्प-फल (=कम-फल, अ-फल) होता है। (2) क्या है ॰ महासमारम्भवाला ॰, (और) पूरा उतरने पर महाफल होता है?—माणव! कृषि ही ॰। (3) क्या है ॰ ॰ अल्पारम्भवाला ॰, (और) न पूरा उतरने पर अल्प-फल होता है?—माणव! वाणिज्य ॰। (4) क्या है ॰ अल्पारम्भवाला ॰, (किन्तु) पूरा उतरन पर महाफल होता है?—माणव! वाणिज्य ही ॰। जैसे माणव! कृषि कर्मस्थान ॰ महासमारम्भवाला है, (किन्त) न पूरा उतरने पर अल्प-फल होता है; ऐसे ही माणव! गृह-वास (=गृहस्थ) कर्मस्थान ॰ महासमारम्भवाला है, (किन्तु) न पूरा उतरने पर अल्प-फल होता है। जैसे, माणव कृषि कर्मस्थान ही ॰ महासमारम्भवाला है; (और) पूरा उतरने पर महाफल होता है; ऐसे ही ॰ गृहवास कर्मस्थान ॰। जैसे ॰ वाणिज्य कर्मस्थान .॰ अल्प-समारम्भवाला है; और न पूरा उतरने पर अल्पफल होता है; वैसे ही माणव! प्रब्रज्या-कर्म-स्थान ॰। जैसे ॰ वाणिज्य कर्मस्थान ॰ अल्पसमारम्भवाला है; (किन्तु) पूरा उतरने पर महाफल होता है; वैसे ही माणव! प्रब्रज्या कर्मस्थान ॰।”

“भो गौतम! ब्राह्मण पुण्य के करने, तथा कुशल (=पुण्य) के आराधन के लिये पाँ धर्म प्रज्ञापन करते हैं ॰?”

“माणव! ब्राह्मण पुण्य के करने ॰ के लिये, जिन पाँच धर्मो को प्रज्ञापन करते हैं, यदि तुझे भारी न हो, तो उन्हें इस परिषद् में कहो।—

“नहीं है मुझे भारी, भो गौतम! जहाँ कि आप या आप जैसे बैठे हों।”

“तो माणव! कहो।—

“भो गौतम! (1) पुण्य के करने, तथा कुशल के आराधन के लिये सत्य, यह प्रथम धर्म ब्राह्मण प्रज्ञापन करते है। (2) ॰ तप, यह द्वितीय धर्म ॰ (3) ॰ ब्रह्मचर्य ॰, यह तृतीय धर्म ॰। (4) ॰ अध्ययन यह चतुर्थ धर्म ॰। (5) ॰ त्याग यह पंचम धर्म ॰। भो गौतम! ब्राह्मण पुण्य करने के लिये, तथा कुशल के आराधन के लिये इन पाँच धर्मो को प्रज्ञापन करते है।”

“माणव! क्या ब्राह्मणों में कोई भी ब्राह्मण है, जो यह कहे—‘मैं इन पाँच धर्मो को स्वयं जानकर, साक्षात्कार कर, (इनके) विपाक को जतलाता हूँ’?”

“नहीं, भो गौतम!”

“माणव! क्या ब्राह्मणों का एक आचार्य भी, एक आचार्य-प्राचार्य भी सात पीढ़ी तक महाचार्य-युगल भी ऐसा है; जो यह कहे—‘मैं ॰ जतलाता हूँ’?”

“नहीं, भो गौतम!”

“माणव! जो वह मंत्रों (=वेदों) के कर्ता, मंत्रों के प्रवक्ता (=अध्यापक) ब्राह्मणों के पूर्वज ऋषि थे, जिनके गीत (=गाये) संगीत, प्रोक्त पुराने मंत्र-पद (=वेदवचन) को, आज भी ब्राह्मण उनके अनुसार जाते है, उनके अनुसार भाषण करते हैं, (पूर्वज ऋषियों के) भाषण के अनुसार भाषण करते हैं, वाचन के अनुसार वाचन करते हैं, (वह पूर्वज ऋषि) जैसे कि-अट्टक (=अष्टक), धामक, वामदेव, विश्वामित्र, यमदग्नि, अंगिरा, भारद्वाज, वशिष्ट, कश्यप, भृगु, (क्या) उन्होंने भी ऐसा कहा है-

“हम इन पाँच धर्मों को स्वयं जान कर साक्षात्कार कर (इनके) विपाकको जतलाते हैं।”

“नहीं भो गौतम!”

“इस प्रकार माणव! ब्राह्मणों में कोई एक ब्राह्मण भी नहीं है, जो यह कहे-“मैं ॰ जतलाता हँ”। ब्राह्मणों का ॰ सात पीढी तक महाचार्य युगल भी नहीं है॰। ब्राह्मणों के ॰ पूर्वज ऋषियों ने ॰ भी नहीं कहा था- “हम॰ जतलाते हैं।”

“नहीं भो गौतम!”

“जैसे माणव! अंध-वेणि-परंपरा (=लगातार अंधों की पाँती) जुडी हो, अगला भी नहीं देखता, पिछला भी नहीं देखता, ऐसा ही माणव! अन्ध-वेणि-परंपरा-सदृश ब्राह्मणों का कहना जान पडता है,-पहिला भी नहीं देखता, बिचला भी नहीं देखता, पिछला भी नहीं देखता।”

ऐसा कहने पर ॰ शुभ माणव भगवान् के अंध-वेणि-परंपरा कहने से कुपित, असन्तुष्ट हो भगवान को ही खुंसाते, भगवान् को ही नाराज होते, भगवान् को-“श्रमण गौतम खराब हैं”-कहते जैसे, भगवान से यह बोला-

“भो गौतम ! सुभग-वनिक औपमन्यव सुभग-वनिक (=सुभगवन-निवासी) औपमन्यव पौष्करसाति ब्राह्मण ऐसा कहता है — यह कोई कोई श्रमण-ब्राह्मण उत्तर-मनुष्य-धर्म (=अलौकिक शक्ति)=अलमार्य ज्ञान-दर्शन- विशेष का ऐसेही (.फजूल) दावा करते हैं। उनका यह कथन छोटा, नामक”, रिक्त=तुच्छही होता है। कैसे मनुष्य होकर कोई उत्तर-मनुष्य-धर्म अलमार्य-ज्ञान-दर्शन-विशेषको जानेगा, साक्षात्कार करेगा? यह संभव नहीं।”

“तो क्या माणव! ॰ पौष्करसाति ब्राह्मण सभी श्रमण ब्राह्मणों के चित्त की बात को जानता है?”

“भो गौतम! अपनी पूर्णिका दासी के चित्त की बात को भी सुभग-वनिक औपमन्यव पौष्कर साति ब्राह्मण नहीं जानता, कहाँ से सारे श्रमण ब्राह्मणों के चित्त की बात जानेगा?”

“जैसे माणव! जन्मांध पुरूष कृष्ण-शुक्ल रूपों को न देखे, नीले रूपों को न देखे, पीले रूपों को न देखे, लाल रूपों को न देखे, मजीठी रूपों को न देखे, सम-विषम (भूमि) को न देखे, तारों के रूप को न देखे, चन्द्र-सूर्य को न देखे। वह यह बोले- नहीं हैं कृष्ण-शुक्ल रूपों के देखने वाले, ॰, नहीं है चन्द्र-सूर्य के देखने वाले। मैं इसे नहीं जानता, मैं इसे नहीं देखता, इसलिये नहीं हैं। माणव! वह वैसा कहते वह न कहेगा?”

“नहीं, भो गौतम! है कृष्ण-शुक्ल रूप, ॰, हैं चन्द्र-सूर्य के देखने वाले। “मैं इसे नहीं जानता, मैं इसे नहीं देखता, इसलिये नहीं हैं”- ऐसा कहते, वह ठीक नहीं कहेगा।”

“ऐसे ही माणव! ॰ पौष्करसाति ब्राह्मण अंधा, नेत्रहीन है, वह उत्तर-मनुष्य-धर्म अहमार्य-ज्ञान दर्शन-विशेष को जानेगा-देखेगा, यह संभव नहीं।

“तो क्या मानते हो, माणव ! जो वह कौसल (वासी) ब्राह्मण महाशाल हैं, जैसे कि-चंकि ब्राह्मण, तारूक्ष ब्राह्मण, जानुश्रोणि ब्राह्मण, या तुम्हारा पिता तौदेथ्य। कौनसा उनका वचन अच्छा है, जो वह संवृति (=लोक सम्मति)-अनुसार बोलें, या जो वह संवृत्ति-विरूद्ध बोलें?”

“संवृत्ति-अनुसार, भो गौतम!”

“कौनसा उनका वचन अच्छा है, जो वह मंत्र अनुसार बोलें, या जो वह मंत्र-विरूद्ध बोलें?”

“मंत्रानुसार, हो गौतम!”

“॰ जो वह प्रतिसंख्यान (=सोच-समझ) कर बोलें, या जो न-प्रतिसंख्यान कर बोलें!”

“प्रतिसंख्यान कर, भो गौतम!”

“॰ जो वह सार्थक बोलें, या जो वह निरर्थक बोलें!”

“सार्थक, भो गौतम!”

“तो क्या मानते हो, माणव! ऐसा होने पर ॰ पौष्करसाति ब्राह्मणने संवृत्ति-अनुसार बात कहीं, था संवृत्ति विरूद्ध?”

“संवृत्ति विरूद्ध, भो गौतम!”

“॰ मंत्रानुसार या मंत्र-विरूद्ध?” — ” मंत्र-विरूद्ध ॰।”

“॰ प्रतिसंख्यान करके, या न प्रतिसंख्यान करके !” —“न प्रतिसंख्यान करके ॰।”

“॰ सार्थक या निरर्थक?” — “निरर्थक ॰।”

“माणव! यह पाँच नीवरण (=आवरण) हैं। कौनसे पाँच?-(1) कामच्छन्द (=विषयों का राग)-नीवरण, (2) व्यापाद (=द्वेष)-नीवरण, (3) स्त्यान-मृद्ध (=शरीर-मन का आलस्य)-नीवरण, (4) औद्धत्त्य-कौकृत्त्य (=उद्धत्तपन-हिचकिचाहट )-नीवरण, (5) विचिकित्सा (=संशय)-नीवरण। माणव ! यह पाँच नीवरण हैं। ॰ पौष्करसाति ब्राह्मण पाँच नीवरणों से आवृत्त = निवृत्त (=ढँका) = अनवृत्त, पर्यवनद्ध (=चारों ओर से बंधा) है, वह अहो ! उत्तर मनुष्यधर्म, अलमार्यज्ञानदर्शन-विशेष को जानेगा, देखेगा, यह सम्भव नहीं।

“माणव यह पाँच काम-गुण (=विषयभोग) हैं। कौनसे पाँच?- (1) इष्ट=कान्त, मनाप-प्रिय, कमनीय, रंजनीय, चक्षु-विज्ञेय (=आँख से ज्ञेय) रूप, (2) ॰ श्रोत्र-विज्ञेय शब्द, (3) ॰ घ्राण-विज्ञेय गंध, (4) ॰ जिह्ना-विज्ञेय रस, (5) ॰ काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्य। माणव! यह पाँच काम-गुण हैं। ॰ पौष्करसाति ब्राह्मण इन पाँच गुणों को, ग्रथित (=गुँथा), मूर्छित (=बेहोश), अध्यापन्न, अदोष-दर्शी, निकलने की-बुद्धि-न-रखने वाला ही भोगता है, वह अहो! ॰।

“तो क्या मानते हो माणव! जो आग तृण, काष्ठ के उपादान को लेकर जलाई जाती है, और जो तृण-काष्ठ के उपादान को बिना लिया जले, ( दोनों में) कौन आग (अधिक) अर्चिमान, वर्णवान् और प्रभास्वर होगी?”

“यदि, भो गौतम! तृण-काष्ठ-उपादान के बिना आग जलाई जा सके, तो वह आग (अधिक) अर्चिमान्, वर्णवान् और प्रभास्वर होगी।”

“माणव! इसका स्थान नहीं, इसका अवकाश नहीं, कि ऋद्धि को छोड़, तृण-काष्ठ-उपादान के बिना आग जले। जैसे माणव ! तृण-काष्ठ-उपादान से आग जलती है, उसी के समान माणव! मैं इस प्रीति (=आनन्द) को कहता हूँ, जो प्रीति कि पाँच काम-गुणों (=विषयों) को लेकर (होती है) जैसे माणव ! तृण-काष्ठ-उपादान के बिना आग जले, उसी के समान माणव! मैं इस प्रीति को कहता हूँ, जो प्रीति कि कामों के बिना, अकुशल-धर्मों (=पापों) के बिना (उत्पन्न होती है)।

“माणव! कौनसी प्रीति कामों के बिना, अकुशल धर्मों के बिना (उत्पन्न होती है)।—यहाँ, माणव! भिक्षु कामों से विरहित ॰ प्रथम ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। माणव ! यह भी प्रीति कामों के बिना, अकुशल धर्मों के बिना (उत्पन्न होती है)। और फिर माणव! भिक्षु वितर्क और विचार के शांत होने पर ॰ द्वितीय ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। माणव! यह भी ॰।

“माणव! पुण्य के करने, तथा कुशल के आराधन के लिये जिन पाँच धर्मों को ब्राह्मण प्रज्ञापन करते हैं, उनमें से किसको यह पुण्य के करने, तथा कुशल के आराधन के लिये सबसे अधिक फलदायी कहते हैं?”

“तो क्या मानते हो, माणव! यहाँ किसी ब्राह्मण के यहाँ महायज्ञ उपस्थित हो। तब दो ब्राह्मण आवें-अमुक ब्राह्मण के यज्ञ को अनुभव (=उपभोग) करें। उनमें से एक ब्राह्मण को यह हो-भोजन के समय प्रथम-आसन, प्रथम-जल, तथा प्रथम पिंड मैं ही पाऊँ, दूसरा ब्राह्मण न पावे-भोजन के समय प्रथम-आसन, प्रथम-जल, प्रथम पिंड मैं ही पाऊँ, दूसरा ब्राह्मण न पावे-भोजन के समय प्रथम-आसन, प्रथम-जल, प्रथम-पिंड। हो सकता है, माणव! कि दूसरा ही ब्राह्मण ॰ प्रथम-पिंड पावे, और वह ब्राह्मण न पावे ॰। तब-मुझे ॰ प्रथम पिंड नहीं मिला-(यह सोच) वह कुपित, असन्तुष्ट होवे। माणव! ब्राह्मण इसका क्या विपाक बतलाते हैं ?”

“भो गौतम! ब्राह्मण इसलिये ऐसा दान नहीं देते, कि उससे दूसरा कुपित, असन्तुष्ट होने, बल्कि ब्राह्मण अनुकम्पा के ख्याल से (=अनुकम्पा-जातिक) ही दान देते हैं।”

“ऐसा होने पर माणव! ब्राह्मणों के लिए यह अनुकम्पा-जातिक छठीं पुण्य-क्रिया-वस्तु हुई।”

“ऐसा होने पर, भो गौतम! ॰ अनुकम्पा-जातिक छठीं पुण्य-क्रिया-वस्तु हुई।”

“माणव! पुण्य के करने (=पुण्य क्रिया) ॰ के लिये जिन पाँच धर्मों को ब्राह्मण प्रज्ञापन करते (=बतलाते) हैं, उन पाँच धर्मों को तुम किनमें अधिक पाते हो, गृहस्थों में या प्रव्रजितों में?”

“॰ जिन पाँच धर्मों को ब्राह्मण प्रज्ञापन करते हैं, उन पाँच धर्मों को प्रव्रजितों में अधिक पाता हूँ, गृहस्थों में कम।” “गृहस्थ महार्थ=महाकृत्य, महाधिकरण, महासमारंभ हैं, (वह) सदा, निरंतर सत्यवादी नहीं हो सकता।” “प्रव्रजित अल्पार्थ=अल्पकृत्य, अल्पाधिकरण, अल्पारंभ होता है, ( वह) सदा, निरन्तर सत्यावादी हो सकता है।” “गृहस्थ ॰ महासमारम्भ है, (वह) सदा, निरन्तर तपस्वी नहीं हो सकता। ॰ । ॰ ब्रह्मचारी नहीं हो सकता ॰ । ॰ स्वाध्याय-बहुल नहीं हो सकता।” “प्रव्रजित ॰ अल्पारम्भ होता है, ( वह) सदा, निरन्तर स्वाध्याय-बहुल हो सकता है। पुण्य क्रिया ॰ के लिये जिन पाँच धर्मों को ब्राह्मण प्रज्ञापन करते हैं, उन पाँच धर्मों को मैं प्रव्रजितों में अधिक पाता हूँ, गृहस्थों में कम।”

“माणव! पुण्य क्रिया ॰ के लिये ब्राह्मण जिन पाँच धर्मों को प्रज्ञापन करते हैं, मैं उन्हें पैर रहित=व्यापाद रहित चित्त की भावना के लिये परिष्कार (=सहायक सामग्री ) कहता हूँ।

“यहाँ, माणव ! भिक्षु सत्यवादी होता है, यह मैं सत्यवादी हूँ—(यह सोच) अर्थवेद को पाता है, धर्म-वेद (=धर्मज्ञान) को पाता है, और धर्म सम्बन्धी प्रमोद को पाता है। कुशल-उपसंहित (=पुण्यमय) प्रमोद को मैं पैर-रहित=व्यापाद रहित चित्त की भावना के लिये परिष्कार कहता हूँ।”

ऐसा कहने पर ॰ शुभ माणव ने भगवान् से यह कहा —

“मैंने यह सुना है, भो गौतम! कि श्रमण गौतम ब्रह्मों की सहव्यता (=सरूपता) का मार्ग उपदेशता है।”

“तो क्या मानते हो, माणव! नलकार-गाम (=नलकार-ग्राम) यहाँ से समीप है, नलकार-ग्राम यहाँ से दूर नहीं है।”

“हाँ, भो गौतम! नलकार-ग्राम यहाँ से समीप है, ॰ यहाँ से दूर नहीं।”

“तो क्या मानते हो, माणव! यहाँ कोई पुरूष, नलकार-ग्राम में जन्मे-बढें (वहीं) रहते पुरूष से नलकार-ग्राम का मार्ग पूछें, तो माणव! क्या नलकार-ग्राम में जन्मे-बढे पुरूष को नलकार-ग्राम का मार्ग पूछने पर दुविधा या जड़ता होगी?”

“नहीं, भो गौतम!”

“सो क्यों?”

“भो गौतम! वह पुरूष नलकार-ग्राम में जन्मा-बढ़ा है, उसको नलकार-ग्राम के सभी मार्ग सुविदित हैं।”

“माणव! नलकार-ग्राम में जन्मे-बढे़ उस पुरूष को नलकार-ग्राम का मार्ग पूछने पर दुविधा, जब्ता हो सकती है, किन्तु तथागत को ब्रह्मलोक या ब्रह्मलोक-गामी मार्ग पूछने पर दुविधा, जब्ता नहीं हो सकती। माणव! मैं ब्रह्मों को जानता हूँ। ब्रह्मलोक को, और ब्रह्मलोक-गामी मार्ग (=प्रतिपद्) को, और जैसे प्रतिपल (=मार्गारूढ) होने पर ब्रह्मलोक में उत्पन्न (होगा) उसे भी जानता हूँ।”

“सुना है मैंने, भो गौतम! श्रमण गौतम ब्रह्मों की सहव्यता का मार्ग देखता है, अच्छा हो, आप गौतम मुझे ब्रह्मों की सहव्यता का ही मार्ग उपदेशें।”

“तो, माणव! सुनो, अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ ।”

“अच्छा, भो!” — ( कह) ॰ शुभ माणव ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान ने यह कहा-“क्या है माणव! ब्रह्मों की सहव्यता का मार्ग?- यहाँ माणव! भिक्षु मैत्रीपूर्ण चित्त से ॰ सारे लोक को पूर्ण कर विहरता है। माणव! इस प्रकार मैत्री-चेतोविमुक्ति (=मैत्री भावना) के भावित करने पर जितने प्रमाण में काम किया जाता हैं, वह वहीं तक नहीं रह जाता, वहीं तक अवस्थित नहीं रहता है। जैसे माणव! बलवान् शंख-बजानेवाला थोड़े प्रयास से चारों दिशाओं को गुँजा दे, ऐसे ही माणव! मैत्री, चेतोविमुक्ति के साथ जितने प्रमाण में ॰ अवस्थित नहीं रहता। यह भी माणव ! ब्रह्मों की सहव्यता का मार्ग है।

“और फिर माणव! भिक्षु करूणा-पूर्ण चित्त से ॰ सारे लोक को पूर्ण कर विहरता है ॰ । ॰ मुदिता-पूर्ण चित्त से ॰ । ॰ उपेक्षा पूर्ण चित्त से सारे लोक को पूर्ण कर विहरता हैं। माणव! इस प्रकार उपेक्षा-चेतोविमुक्ति के भावित करने पर ॰ वहीं तक अवस्थित नहीं रहता। यह भी माणव! ब्रह्मों की सहव्यता का मार्ग है।”

ऐसा कहने पर तैदेव्य-पुत्र शुभ माणव ने भगवान् से यह कहा —

“आश्चर्य! भो गौतम! आश्चर्य!! भो गौतम! जैसे औंधे को सीधा कर दे ॰ यह मैं भगवान् गौतम की शरण जाता हूँ, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आप गौतम आज से मुझे अंजलिरत शरणागत उपासक स्वीकार करें।”

तब ॰ शुभ माणव भगवान के भाषण को अभिनंदित कर, अनुमोदित कर, आसन से उठ भगवान् को अभिवादन कर प्रदक्षिणा कर चला गया।

उस समय जानुश्रोणि ब्राह्मण दिन-दिन को (दोपहर को) सारे श्वेत वर्ण के घोडी के रथ पर सवार हो श्रावस्ती से बाहर जा रहा था। तब जानुश्रोणि ब्राह्मण ने ॰ शुभ माणव को दूर से ही आते देखा। देख कर ॰ शुभ माणव से यह बोला —

“हन्त! कहाँ से आप भारद्वाज दिन-दिन को आ रहे हैं?”

“यहाँ से, भो! मैं श्रमण गौतम के पास से आ रहा हूँ।”

“आप भारद्वाज श्रमण गौतम की प्रज्ञा=व्यक्तता के बारे में क्या समझते हैं, पंडित जान पड़ता है?”

“भो! कहाँ मैं और कहाँ श्रमण गौतम की प्रज्ञा=व्यक्तता को जानूँगा। जो वैसा ही हो, वही श्रमण गौतम की प्रज्ञा=व्यक्तता को जाने ।”

“आप भारद्वाज! बड़ी उदार प्रशंसा से श्रमण गौतम को प्रशंसते हैं।”

“भो! क्या मैं, और क्या श्रमण गौतम को प्रशंसूँगा। वह आप गौतम प्रशंसित हैं, देव-मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं। ब्राह्मण पुण्य-क्रिया=कुशलाराधन के लिये जिन पाँच धर्मों को बतलाते हैं, उन्हें श्रमण गौतम वैर-रहित=व्यापाद्-रहित चित्त की भावना करने के लिये चित्त का परिष्कार (=सहायक सामग्री) बतलाते हैं।”

ऐसा कहने पर जानुश्रोणि ब्राह्मण सर्व श्वेत वड़वा-रथ से उतर कर उत्तरासंग (=उपरने) को (जनेऊ की भाँति) एक (दाहिने) कंधे पर कर, जिधर भगवान् थे, उधर अंजलि जोड उदान (=चित्तोल्लास से निकला शब्द) कहा —

“लाभ है, राजा प्रसेनजित् कोसल को, सुंदर लाभ मिले हैं राजा प्रसेनजित् कोसल को, जिसके राज्य (=विजित) में तथागत अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध विहर रहे हैं।”

О переводе

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Пусть все существа будут счастливы