Uposatha

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ม. 126

Bhūmija sutta: भूमिज-सुत्तन्त

Bhūmijasutta

Suññatavagga

คำแปล

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् राजगृह में वेणुवन कलंदक-निवाप में विहार करते थे।

तब आयुष्मान् भूमिज पूर्वाह्न समय पहिनकर पात्र-चीवर जहाँ आयुष्मान् भूमिज थे, वहाँ गया; जाकर आयुष्मान् भूमिज के साथ संमोदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर आयुष्मान् भूमिज से यह बोला—

“भो भूमिज! कोई कोई श्रमण ब्राह्मण इस वाद=इस दृष्टि वाले हैं—‘आशा करके भी यदि ब्रह्मचर्य वास करते हैं, (तो) भी वह फल पाने के अयोग्य है। आशा न करके भी यदि ॰। आशा और अन्-आशा करके भी यदि ॰। न आशा-न-अनाशा करके भी यदि ॰। यहाँ, आप भूमिज के शास्ता किस वाद=किस दृष्टि वाले, क्या कहने वाले है?”

“राजकुमार! मैंने भगवान् के मुख से यह नहीं सुना है, मुख से न ग्रहण किया है; (किन्तु) सम्भव है, कि भगवानृ इस प्रकार व्याख्यान करें—‘आशा करके भी यदि अ-योनिशः (=कार्य-कारण का मन में ध्यान न रख) ब्रह्मचर्य वास करते हैं, (तो) वह फल पाने के अयोग्य हैं। आशा करके भी यदि अयोनिशः ॰। आशा और अनाशा करके भी ॰। न-आशा-न-अनाशा करके भी यदि ॰। आशा करके भी यदि योनिशः ब्रह्मचर्य-वास करते हैं, (तो) वह फल पाने के योग्य है। अनाशा करके भी ॰। आशा-अनाशा करके भी ॰। न-आशा-न-अनाशा करके भी ॰। राजकुमार! मैंने भगवान् के मुख से यह नहीं सुना है ॰।”

“यदि आप भूमिज के शास्ता इस वाद=दृष्टि=आख्यान वाले हैं; तो मैं समझता हूँ, वह सारे ही दूसरे श्रमण-ब्राह्मण, बुद्धों को मातकर स्थित हैं।”

जब जयसेन राजकुमार ने आयुष्मान् भूमिज को अपने स्थालीपाक (=भोजन) से परोसा। तब आयुष्मान् भूमिज भिक्षा से निवृत हो भोजनोपरांत जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये; जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् भूमिज ने भगवान् से यह कहा—

“भन्ते! (आज) मैं पूर्वाह्न समय पहिनकर ॰ जहाँ जयसेन राजकुमार का घर था, वहाँ गया ॰ तो मैं समझता हूँ, वह सारे दूसरे श्रमण-ब्राह्मण-बुद्धों को मातकर स्थित है। क्या भन्ते! वैसा पूछने पर यह उत्तर दे मैं भगवान् के लिये युक्त कहने वाला हूँ; भगवान् पर असत्य का आरोप तो नहीं करता? धर्म के अनुसार कहनेवाला हूँ न; कोई धर्मानुसारी वाद=अनुवाद (मेरे इस कथन से) निन्दित तो नहीं होता?”

“हाँ, भूमिज! वैसा पूछने पर यह उत्तर दे तू मेरे लिये युक्त कहने वाला है ॰ कोई धर्मानुसारी वाद=अनवुाद निन्दित नहीं होता। भूमिज! जो श्रमण या ब्राह्मण मिथ्या-दृष्टि, मिथ्या-संकल्प, मिथ्या-वचन, मिथ्या-कर्मान्त, मिथ्या-आजीव, मिथ्या-व्यायाम, मिथ्या-स्मृति, मिथ्या-समाधि (वाले) हैं, (वही कहते हैं)—‘आशा करके भी यदि ब्रह्मचर्य वास करते है, (तो) भी वह फल पाने के अयोग्य है। ॰। न-आशा-न-अनाशा करे भी ॰, सो किस हेतु? अ-योनिशः होने से, भूमिज! वह फल पाने के अयोग्य है।

“जैसे भूमिज! पुरूष तेल-अर्थी=तेल-गवेषी, तेल की खोज करते, द्रोणी में बालू डालकर पानी का छींटा दे दे पेले (पीडित करे)। यदि आशा करके भी बालू को द्रोणी में डालकर, पानी का छींटा दे दे पेले; तो (वह) तेल पाने के योग्य नहीं है। यदि अनाशा करके भी ॰। यदि आशा-अनाशा करके भी ॰। यदि न-आशा-न-अनाशा करके भी ॰। सो किस हेतु?—भूमिज! वह तेल पाने का (प्रयत्न) अयोनिशः (=कार्य-कारण का ख्याल किये बिना) है। इसी प्रकार भूमिज! जो कोई श्रमण ब्राह्मण मिथ्या दृष्टि (=झूठी धारणा वाले) ॰ मिथ्या समाधि (वाले) हैं; यदि वह आशा करके भी ब्रह्मचर्य-वास करें तो भी वह फल पाने के अयोग्य है। ॰। न-आशा-न-अनाशा करके भी ॰। सो किस हेतु?—भूमिज! वह फल पाने का (प्रयत्न) अयोनिशः है।

“जैसे, भूमिज! पुरूष क्षीर-अर्थी=क्षीर-गवेषी क्षीर की खोज करते, तरूण-त्वचा (=धेनु) गाय को सींग से पकडकर आविजन (=दूहन) करे; (तो) वह क्षीर पाने के अयोग्य है। अनाशा करके भी ॰। आशा-अनाशा करके भी ॰। न-आशा-न-अनाशा करके भी ॰। सो किस हेतु?—भूमिज! वह दूध पाने का (प्रयत्न) अयोनिशः है। ऐसे ही भूमिज! जो कोई श्रमण ब्राह्मण मिथ्या दृष्टि॰।

“जैसे, भूमिज! पुरूष नवनीत (=मक्खन)-अर्थी, नवनीत-गवेषी, नवनीत की खोज करते, कलशे में पानी डालकर मथानी से मथे; (तो वह) नवनीत पाने के योग्य नहीं है। आशा करके भी ॰। ॰। सो किस हेतु?—॰ अयोनिशः है। ऐसे ही भूमिज! जो श्रमण-ब्राह्मण ॰।

‘जैसे, भूमिज! पुरूष अग्नि-अर्थी, अग्नि-गवेषी, अग्नि का खोज करते हरे गीले काष्ठ को ले उत्तरारणी से मंथन करे। आशा करके भी ॰। ॰। ॰।

“जैसे, भूमिज! पुरूष तेल-अर्थी ॰ द्रोणी में तिल-पिष्ट को डालकर पानी का छींटा दे दे पेले, यदि आशा करके तिल-पिष्ट (=तिल की लुगदी) द्रोणी में डाल पानी का छींटा दे दे पेले; (तो वह) तेल के पाने के योग्य है। अन्-आशा करके ॰। आशा-अनाशा करके ॰। न-आशा-न-अनाशा करके ॰। सो कि हेतु?—भूमिज! तेल के पाने का (यह प्रयत्न) योनिशः है। ऐसे ही, भूमिज! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण सम्यग्-दृष्टि (=ठीक से धारणा वाले), सम्यक्-संकल्प, सम्यग्-वचन, सम्यक्-कर्मान्त, सम्यग्-आजीव, सम्यग्-व्यायाम, सम्यक्-स्मृति, सम्यक्-समाधि (वाले) हैं। वह यदि आशा करके भी ब्रह्मचर्य वास करते है, फल पाने के योग्य हैं। ॰। न-आशा-न-अनाशा करके भी ॰। सो किस हेतु?—भूमिज! फल के पाने का (वह प्रयत्न) योनिशः है।

“जैसे, भूमिज! पुरूष क्षीर-अर्थी ॰ तरूण-वत्सा गाय को स्तन से दूहे ॰। ॰।

“जैसे, भूमिज! पुरूष नवनीत-अर्थी ॰ कलशे में दधि डाल कर मथानी से मथे ॰। ॰।

“जैसे, भूमिज! पुरूष अग्नि-अर्थी ॰ सूखे कडे काष्ठ को ले उत्तरारणी से मंथन करे। आशा करके भी ॰। ॰।

“भूमिज! यदि तू जयसेन राजकुमार को यह चार उपमायें बतलाता, आश्चर्य नहीं जयसेन राजकुमार प्रसन्न होता; और प्रसन्न हो प्रसन्नाकार क्रिया तेरे लिये करता।”

“कहाँ से, भन्ते! मैं जयसेन राजकुमार को अश्रुतपूर्ण ये चार उपमायें बतलाता, जैसे कि भगवान् ने बतलाया?”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् भूमिज ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

เกี่ยวกับคำแปลนี้

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

ขอให้สรรพสัตว์ทั้งหลายจงเป็นสุข