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МН 88

Bāhitika sutta: बाहीतिय-सुत्तन्त

Bāhitikasutta

Rājavagga

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ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती ॰ जेतवन में विहार करते थे।

तब आयुष्मान् आनन्द पूर्वाह्न समय (चीवर) पहिन कर, पात्र-चीवर ले, श्रावस्ती में…पिंड-चार करके…दिन के विहार के लिये जहाँ मृगार-माता का प्रासाद पूर्वाराम था, वहाँ चले। उस समय राजा प्रसेनजित् ॰ एकपुंडरीक नाग (=हाथी) पर चढ़कर, मध्याह्न में श्रावस्ती से बाहर जा रहा था। राजा प्रसेनजित् ॰ ने दूर से आयुष्मान् आनन्द को आते देखा। देखकर सिरिबड्ढ (श्रीवर्द्ध) महामात्य को आमंत्रित किया—

“सौमय सिरिवड्ढ! यह आयुष्मान् आनंद हैं न?”

“हाँ महाराज!…”…

तब राजा ॰ ने एक आदमी को आमंत्रित किया—

“आओ, हे पुरूष! जहाँ आयुष्मान् आनन्द हैं, वहाँ जाओ, जाकर मेरे वचन से आयुष्मान् आनन्द के पैरों में वंदना करना…, और यह भी कहना—‘भन्ते! यदि आयुष्मान् आनन्द को कोई बहुत जरूरी काम न हो, तो भन्ते! आयुष्मान् आनन्द कृपाकर एक मिनट (=मुहूर्त) ठहर जायें।’”

“अच्छा देव!”

आयुष्मान् आनन्द ने मौन से स्वीकार किया।

तब राजा प्रसेनजित् जितना नाग का रास्ता था, उतना नाग से जाकर, नाग से उतर पैदल ही जाकर…अभिवादन कर एक ओर खडा हो, आयुष्मान् आनन्द से बोला—

“भन्ते! यदि आयुष्मान् आनन्द को कोई अत्यावश्यक काम न हो, तो अच्छा हो भन्ते! आयुष्मान् आनन्द जहाँ अचिरवती नदी का तीन है, कृपा कर वहाँ चलें।”

आयुष्मान् आनन्द ने मौन से स्वीकार किया।

तब आयुष्मान् आनन्द, जहाँ चिरवती नदी का तट था, वहाँ गये। जाकर एक वृक्ष के नीचे बिछे आसन पर बैठे। तब राजा प्रसेनजित् ॰ जाकर, नाग से उतर पैदल ही…जाकर…अभिवादन कर एक ओर खडा हुआ। एक ओर खडे हुये राजा ॰ ने…यह कहा—

“भन्ते! आयुष्मान् आनन्द यहाँ कालीन पर बैठें।”

“नहीं महाराज! तुम बैठो, मैं अपने आसन पर बैठा हूँ।”

राजा प्रसेनजित् ॰ बिछे आसन पर बैठा। बैठ कर…बोला—

“भन्ते! क्या वह भगवान् ऐसा कायिक आचरण कर सकते हैं, जो कायिक आचरण, श्रमणों, ब्राह्मणें और विज्ञों से निन्दित (=उपारम्भ) है?”

“नहीं महाराज! वह भगवान् ॰!”

“क्या भन्ते! ॰ वाचिक आचरण कर सकते हैं ॰?” “नहीं महाराज!”

“आश्चर्य! भन्ते!! अद्भूत! भन्ते!! जो हम (दूसरे) श्रमणों से नहीं पूरा कर (जान) सके, वह भन्ते! आयुष्मान् आनन्द ने प्रश्न का उत्तर दे पूरा कर दिया। भन्ते! जो वह बाल=अव्यक्त (=मूर्ख) बिना सोचे, बिना थाल लगाये, दूसरों का वर्ण (प्रशंसा) या अ-वर्ण भाषण करते हैं, उसे हम सार मानकर नहीं स्वीकार करते। और भन्ते! जो वह पंडित=व्यक्त=मेधावी (=पुरूष) सोचकर, थाल लगाकर दूसरों कावर्ण या अवर्ण भाषण करते हैं, उसे हम सार मानकर स्वीकार करते है। भन्ते! आनन्द! कौन कायिक आचरण श्रमणों, ब्राह्मणों, विज्ञो से निदित है?”

“महाराज! जो कायिक-आचरण अ-कुशल (=बुरा) है।”

“भन्ते! अकुशल कायिक आचरण क्या है।” “महाराज! जो कायिक आचरण स-अवद्य (=सदोष) है।” ”॰ सावद्य क्या है?” “जो ॰ स-व्यापाद्य (=हिंसायुक्त) है।” ”॰ स-व्यापाद्य क्या है?” “जो ॰ दुःख विपाक (=अन्त में दुःख देने वाला) है।”

“॰ दुःख-विपाक क्या है?”

“महाराज! जो कायिक आचरण अपनी पीडा के लिये होता है, पर-पीडा के लिये होता है; दोनों की पीडा के लिये होता है। उससे अ-कुशल-धर्म (=पाप) बढते हैं, कुशल-धर्म नाश होते है। इस प्रकार का कायिक आचरण महाराज! ॰ निन्दित है।”

“भन्ते आनन्द! कौन वाचिक-आचरण श्रमणों-ब्राह्मणों-विज्ञों से निन्दित है?” ॰। “महाराज! जो वाचिक-आचरण अपनी पीडा के लिये है ॰।”

“॰ कौन मानसिक आचरण ॰?” ॰।

“भन्ते! आनन्द! क्या वह भगवान् सभी अकुशल धर्मो (=बुराइयों) का विनाश वर्णन करते हैं?”

“महाराज! तथागत सभी अकुशल धर्मो से रहित हैं, सभी कुशल-धर्मो से युक्त है।”

“भन्ते आनन्द! कौन कायिक आचरण (=काय-समाचार) श्रमणों-ब्राह्मणों-विज्ञों से अनिन्दित है?”

“महाराज! जो कायिक आचरण कुशल है। ॰। ॰ अनवद्य ॰। ॰। ॰ अव्यापाद्य ॰। ॰। ॰ सुख विपाक ॰। ॰। जो ॰ न अपनी पीडा के लिये होता है, न पर-पीडा के लिये; न दोनों की पीडा के लिये होता है। उससे अकुशल-धर्म नाश होते हैं, कुशल-धर्म बढते हैं। ॰।

॰ वाचिक आचरण कुलश हैं? ॰ मानसिक आचरण कुशल है? ॰।

“भन्ते आनन्द! क्या वह भगवान् सभी कुशल धर्मो की प्राप्ति को वर्णन करते हैं?”

“महाराज! तथागत सभी अकुशल-धर्मो से रहित हे, सभी कुशल-धर्मो से युक्त हैं।”

“आश्चर्य! भन्ते!! अद्भूत! भन्ते!! कितना सुन्दर कथन (=सुभाषित) हैं, भन्ते! आयुष्मान् आनन्द का!!! भन्ते! आयुष्मान् आनन्द के इस सुभाषित से हम परम प्रसन्न हैं। भन्ते! आयुष्मान् आनन्द के सुभाषित से इस प्रकार प्रसन्न हुये, हम हाथी-रत्न भी आयुष्मान् को देते, यदि वह आयुष्मान् आनन्द को विहित (=ग्राह्य=कल्प्य) होता, ॰ अश्व-रत्न (=श्रेष्ठ घोडा) भी ॰, ॰ अच्छा गाँव भी ॰। किन्तु भन्ते! आनन्द! हम इसे जानते हैं, यह आयुष्मान् को ग्राह्य नहीं है। मेरे पास राजा मागध अजातशत्रु, वैदेही-पुत्र की भेजी…यह सोलह हाथ लम्बी, आठ हाथ चैडी वाहीतिक है, उसे आयुष्मान् आनन्द कृपा-करके स्वीकार करें।”

“नही महाराज! मेरे तीनों चीवर पूरे है।”

“भन्ते! यह अचिरवती नदी आयुष्मान् आनन्द ने देखी हैं, और हमने भी। जब ऊपर पर्वत पर महामेघ बरसता है, तब यह अचिरवती, दोनों तटों को भर कर बहती है। ऐसे ही भन्ते! इस वाहीतिय से आयुष्मान् आनन्द अपना त्रिचीवर बनावेंगे, जो आयुष्मान् आनन्द के चीवर हैं, उन्हे सब्रह्मचारी बाँट लेंगे। इस प्रकार हमारी दक्षिणा (=दान) मानों भर कर बहती हूई (=संविस्यन्दन्ती) होगी। भन्ते! आयुष्मान् आनन्द मेरी वाहीतिक को स्वीकार करें।”

आयुष्मान् आनन्द ने वाहीतिक को स्वीकार किया। तब राजा ॰ ने कहा—

“अच्छा भन्ते! अब हम जाते हैं, (=हम) बहु-कृत्य, बहु-करणीय हैं।”

“जिसका महाराज! तुम काल समझते हो।”

तब राजा प्रसेनजित् ॰ आयुष्मान् आनन्द के भाषण को अभिनन्दन कर, अनुमोदन कर, आसन से उठ, ॰ अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर चला गया।

राजा ॰ के जाने के थोडी देर बाद, आयुष्मान् आनन्द जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। एक ओर बैठ आयुष्मान् आनन्द ने जो कुछ राजा प्रसेनजित् ॰ के साथ कथा-संलाप हुआ था, वह सब भगवान् को सुना दिया, और वह वाहीतिक भी भगवान् को अर्पण कर दी। तब भगवान् ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया—

“भिक्षुओ! राजा प्रसेनजित् ॰ को लाभ है, ॰ सुलाभ मिला है, जो राजा ॰ आनन्द का दर्शन सेवन पाता है।”

यह भगवान् ने कहा, संतुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Нехай усі істоти будуть щасливі