Uposatha

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MN 148

Chachakka sutta: छः-छक्कक-सुत्तन्त

Chachakkasutta

Saḷāyatanavagga

Übersetzungen

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओं!”

“भदन्त!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।”

भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओं! तुम्हे आदि कल्याण, मध्य-कल्याण पर्यवसान (=अन्त) कल्याण, सार्थक=स-व्यंजन धर्म को कहता हूँ; केवल, परिपूर्ण, परिशुद्ध ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करता हूँ; जो कि यह छःछक्क हैं, उसे सुनों, अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ।”

“अच्छा, भन्ते!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—”(1) छ आध्यात्मिक आयतनों को जानना चाहिये। (2) छ बाह्य आयतनों को जानना चाहिये। (3) छः विज्ञान-कायों को जानना चाहिये। (4) छः स्पर्श-कायों को जानना चाहिये। (5) छः वेदना-कायों को जानना चाहिये। (6) छः तृष्णा-कायों को जानना चाहिये।

(1) “यह जो कहा—‘छः आध्यात्मिक आयतनों को जानना चाहिये’—सो किसके लिये कहा?—(1) चक्षु-आयतन, (2) श्रोत्र ॰, (3) घ्राण ॰, (4) जिह्वा ॰, (5) काय ॰, (6) मन-आयतन…इन्हीं के लिये कहा। यह प्रथम छक्क है।

(2) “यह जो कहा—‘छः बाह्य आयतनों को जानना चाहिये’—सो किस लिये कहा?—(1) रूप-आयतन, (2) शब्द ॰, (3) गंध ॰, (4) रस ॰, (5) स्प्रष्टव्य ॰, (6) धर्म-आयतन;…इन्हीं के लिये कहा। यह द्वितीय छक्क है।

(3) ”॰—‘छ‘विज्ञान-काय ॰’ ॰?—(1) चक्षु द्वारा रूप में चक्षुर्विज्ञान उत्पन्न होता है; (2) श्रोत्र ॰, (3) घ्राण ॰, (4) जिह्वा ॰, (5) काय ॰, (6) मनो-विज्ञान।…इन्हीं के लिये कहा। वह तृतीय छक्क है

(4) ”॰—‘छः स्पर्श-काय ॰’ ॰?—(1) चक्षुद्वारा रूप में चक्षुर्विज्ञान उत्पन्न होता है; (चक्षु, रूप और चक्षुर्विज्ञान) इन तीनों का संगम (चक्षु) स्पर्श है। (2) श्रोत्र ॰। (3) घ्राण ॰। (4) जिह्वा ॰। (5) काय ॰। मनः ॰।…इन्हीं के लिये कहा। यह चतुर्थ वक्क है।

(5) ”॰—‘छ वेदना-काय ॰’ ॰?—(1) चक्षु द्वारा रूप में चक्षु र्विज्ञान उत्पन्न होता हैं; तीनों का संगम स्पर्श है; स्पर्श के कारण वेदना होती है। (2) श्रोत्र ॰। (3) घ्राण ॰। (4) जिहवा ॰। (5) काय ॰। (6) मन ॰।…इन्हीं के लिये कहा। यह पंचम छक्क (=षट्क) हैं।

,(6) ”॰—‘छः तृष्णाकायो को जानना चाहिये’—॰?—(1) चक्षु द्वारा रूप में चक्षुविज्ञान उत्पन्न होता है; तीनों का संगम स्पर्श है; स्पर्श के कारण वेदना होती है। (2) श्रोत्र ॰। (3) घ्राण ॰। (4) जिह्वा ॰। (5) काय ॰। (6) मन द्वारा धर्म में मनोविज्ञान उत्पन्न होता है; तीनों का संगम स्पर्श है; स्पर्श के कारण वेदना होती है; वेदना के कारण तृष्णा होती है। यह जो कहा—‘छः तृष्णा-कायों को जानना चाहिये’—सो इसीलिये कहा। यह षष्इ छक्क हैं।

(इन्द्रिय आत्मा नहीं)

(1) “जो कहे—‘चक्षु आत्मा है’, उसे (ख्याल) नहीं पैदा होता, चक्षु की उत्पत्ति या विनाश (=व्यय) भी दिखाई देता है। किन्तु जिसे उत्पत्ति भी, विनाश भी दिखाई देता है—‘मेरा आत्मा उत्पन्न होता है, नाश होता है’—ऐसा उसे (ख्याल) आता है; इसलिये उसे (यह ख्याल) नहीं उत्पन्न होता। जो कहे—“चक्षु आत्मा है’; (सो नहीं) चक्षु अनात्मा (=नहीं आत्मा) है। (2) ॰ रूप ॰। रूप अनात्मा है। इस प्रकार चक्षु अनात्मा है, रूप अनात्मा है। (3) ॰ चक्षु-र्विज्ञान ॰; चक्षुर्विज्ञान अनात्मा है। इस प्रकार चक्षु अनात्मा है, रूप अनात्मा है, चक्षुर्विज्ञान अनात्मा है। (4) ॰ चक्षु-संस्पर्श ॰; चक्षु-संस्पर्श अनात्मा है। इस प्रकार चक्षु अनात्मा है, रूप अनात्मा है, चक्षुर्विज्ञान अनात्मा है, चक्षु संस्पर्श अनात्मा है। (5) ॰ वेदना ॰; वेदना अनात्मा है। इस प्रकार चक्षु अनात्मा है, रूप अनात्मा है, चक्षुर्विज्ञान अनात्मा है, चक्षु-संस्पर्श अनात्मा है, वेदना अनात्मा है। (6) ॰ तृष्णा ॰; तृष्णा अनात्मा है। इस प्रकार चक्षु-अनात्मा है, रूप अनात्मा है, चक्षुर्विज्ञान अनात्मा हैं, चक्षु-संस्पर्श अनात्मा है, वेदना अनात्मा है, तृष्णा अनात्मा है।

(2) “जो कहे—‘श्रोत्र आत्मा है’, ॰। ॰। इस प्रकार श्रोत्र-अनात्मा है, शब्द ॰, श्रोत्र-विज्ञान ॰, श्रोत्र-संस्पर्श ॰, वेदना ॰, तृष्णा अनात्मा है।

(3) ” ॰—‘घ्राण आत्मा है’, ॰। ॰। ॰।

(4) ” ॰—‘जिह्वा आत्मा है’, ॰। ॰। ॰।

(5) ” ॰—‘काय आत्मा है’, ॰। ॰। ॰।

(6) ” ॰—‘मन आत्मा है’, ॰। ॰। इस प्रकार मन अनात्मा है, धर्म अनात्मा है, मनोविज्ञान अनात्मा है, मन-संस्पर्श अनात्मा है, वेदना अनात्मा है, तृष्णा अनात्मा है।

(सत्काय-वाद)

(1) “भिक्षुओं! यह सत्काय (=आत्म-नित्यतावाद) के समुदय (=उत्पत्ति) की ओर ले जाने वाली प्रतिपदा (=मार्ग) है—

“चक्षु को समझता है—‘यह मेरा है’, ‘यह (=चक्षु) मैं हूँ’, ‘यह मेरा आत्मा हैं’। रूप को ॰। चक्षुर्विज्ञान को ॰। चक्षु-संस्पर्श को ॰। वेदना को ॰। तृष्णा को ॰।

(2) “श्रोत्र को ॰। ॰। ॰, ‘यह मेरा आत्मा है’।

(3) “घ्राण को ॰। ॰। ॰, ‘यह मेरा आत्मा है’।

(4) “जिह्वा को ॰। ॰। ॰, ‘यह मेरा आत्मा है’।

(5) “काय को ॰। ॰। ॰, ‘यह मेरा आत्मा है’।

(6) “मन को समझता है—‘यह (मन) मेरा है’, ‘यह मैं हूँ’, ‘यह मेरा आत्मा है’। धर्म को ॰। मनो विज्ञान को ॰। मन-संस्पर्श को ॰। वेदना को ॰। तृष्णा को ॰।

(सत्काय-वाद-खंडन)

“भिक्षुओ! यह सत्काय के निरोध (=विनाश) की ओर ले जाने वाली प्रतिपदा है—

(1) “चक्षु को समझता है—‘यह (=चक्षु) मेरा नहीं’, ‘यह मैं नहीं’, ‘यह मेरा आत्मा नहीं’। रूप को ॰। चक्षुर्विज्ञान को ॰। चक्षु-संस्पर्श को ॰। वेदना को ॰। तृष्णा को ॰।

(2) “श्रोत्र को ॰। ॰। ॰, ‘यह मेरा आत्मा नहीं’।

(3) “घ्राण को ॰। ॰। ॰, ‘यह मेरा आत्मा नहीं’।

(4) “जिह्वा को ॰। ॰। ॰, ‘यह मेरा आत्मा नहीं’।

(5) “काय को ॰। ॰। ॰, ‘यह मेरा आत्मा नहीं’।

(6) “मन को समझता है—‘यह मेरा नहीं’, ‘यह मैं नही’, ‘यह मेरा आत्मा नहीं’। धर्म को ॰। मनो-विज्ञान को ॰। मन-संस्पर्श को ॰। वेदना को ॰। तृष्णा को ॰।

(अनुशयों की उत्पत्ति)

(1) “भिक्षुओं! चक्षुद्वारा, रूप में, चक्षुर्विज्ञान उत्पन्न होता है; तीनों का संगम स्पर्श हैं; स्पर्श से, सुखा, दुःखा या अदुःख-असुखा वेदना (=अनुभव) उत्पन्न होता है। वह (अनुभव करने वाला व्यक्ति) सुखा वेदना से संयुक्त होने पर अभिनंदन=अभिवंदन करता है, आसक्त हो ठहरता है। उसे (मन से) राग-अनुशय चिपटता है। वह दुःखा वेदना से संयुक्त होने पर, शोक करता है, कलपता है, विलाप करता है, छाती पीट कर रोता है, मूर्छित होता है। उसे प्रतिघ अनुशय चिपटता है। वह अदुःखा-असुखा वेदना से संयुक्त होने पर उस वेदना के समुदय (=उत्पन्न), विनाश (=अस्तगमन), आस्वाद, दुष्परिणाम (=आदिनव), और निस्सरण (=निकलने का रास्ता) को यथार्थ से नहीं जानता। उसे अवद्यिा-अनुशय चिपटता है (=अनुशेते)। वह, सुखा वेदना वाले राग-अनुशय को बिना छोडे, दुःखा वेदना वाले प्रतिघ-अनुशय को बिना हटाये, अदुःख-असुखा वेदनावाले अ-विद्या-अनुशय को बिना मारे, अ-विद्या को बिना छोडे, विद्या को बिना उत्पादित किये, इसी जन्म मंें (संसार) दुःख का अन्त करने वाला होगा, यह स्थान (=संभव) नहीं।

(2) ” ॰ श्रोत्र ॰। ॰। ॰।; यह स्थान नहीं।

(3) ” ॰ घ्राण ॰। ॰। ॰।; यह स्थान नहीं।

(4) ” ॰ जिह्वा ॰। ॰। ॰।; यह स्थान नहीं।

(5) ” ॰ काय ॰। ॰। ॰।; यह स्थान नहीं।

(6) ” ॰ मन ॰। ॰। ॰।; यह स्थान नहीं।

(अनुशयों का विनाश, दुःख का विनाश)

(1) “भिक्षुओं! चक्षुद्वारा, रूप में, चक्षु-र्विज्ञान उत्पन्न होता है; तीनांे का संगम स्पर्श है; स्पर्श से सुखा, दुःखा, अदुःख-असुखा वेदना उत्पन्न होती है। वह सुखा वेदना से संयुक्त होने पर अभिनंदन=अभिवंदन नहीं करा, न आसक्त हो ठहरता है। उसे राग-अनुशय नहीं चिपटता। दुःख वेदना से संयुक्त होने पर न शोक करता है, न कलपता है, न विलाप (=परिवेदन) करता है, न छाती पीट कर रोता है, न मूर्छित होता है। उसे प्रतिघ-अनुशय नहीं चिपटता। वह अदुःख-असुखा वेदना से संयुक्त होने पर, उस वेदना के समुदय, विनाश, आस्वाद, दुष्परिणाम और निस्सरण यथार्थ से जानता है। उसे अ-विद्या-अनुशय नहीं चिपटता। वह सुखा वेदनावाले राग-अनुशय को छोड, दुःखा वेदना वाले प्रतिघानुशय को हटा, अदुःख-असुखा वेदना वाले अविद्यानुशय को मार, अ-विद्या को छोड, विद्या को उत्पादित कर, इसी जन्म में दुःख का अन्त करने वाला होगा; यह स्थान (=संभव) है।

(2) ” ॰ श्रोत्र ॰। ॰। ॰।; यह स्थान है।

(3) ” ॰ घ्राण ॰। ॰। ॰।; यह स्थान है।

(4) ” ॰ जिह्वा ॰। ॰। ॰।; यह स्थान है।

(5) ” ॰ काय ॰। ॰। ॰।; यह स्थान है।

(6) ” ॰ मन ॰। ॰। ॰।; यह स्थान है।

(निर्वाण-प्राप्ति)

“भिक्षुओ! इस प्रकार देखते, श्रुतवान् आर्यश्रावक चक्षु में निर्वेद (=उदासीनता) को प्राप्त होता है, रूप ॰। चक्षुर्विज्ञान व, चक्षुसंस्पर्श ॰, वेदना ॰, तृष्णा ॰। श्रोत्र ॰, शब्द ॰, श्रोत्र-विज्ञान ॰, श्रोत्रसंस्पर्श ॰, वेदना ॰, तृष्णा ॰। घ्राण ॰, गंध ॰, घ्राण विज्ञान ॰, घ्राण-संस्पर्श ॰, वेदना ॰, तृष्णा ॰। जिह्वा ॰, रस॰, जिह्वा विज्ञान ॰, जिह्वा-संस्पर्श ॰, वेदना ॰, तृष्णा ॰। काय ॰, स्प्रष्टव्य ॰, काय-विज्ञान ॰, काय-संस्पर्श ॰, वेदना ॰, तृष्णा ॰। मन ॰, धर्म ॰, मनो-विज्ञान ने ॰, मनःसंस्पर्श ॰, वेदना, तृष्णा में निर्वेद को प्राप्त होता है। निर्वेद को प्राप्त हो विरक्त होता है। ॰; और कुछ करने को यहाँ (शेष) नहीं’—यह जानता है।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनंदन किया।

इस व्याकरण (=उपदेश) के कहे जाते समय साठ भिक्षुओं का उपादान न कर, आस्रवों से चित्त मुक्त हो गया।

Über diese Übersetzung

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Mögen alle Wesen glücklich sein