MN 149
Mahāsaḷāyatanika sutta: महा-सलायतन-सुत्तन्त
Mahāsaḷāyatanikasutta
Saḷāyatanavagga
Übersetzungen
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् ने श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।
वहाँ भगवान् भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओ!”
“भदंत!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओं महा-सलायतन (=॰ छः आयतन) तुम्हें उपदेशता हूँ, सुनों अच्छी तरह मन में करो। कहता हूँ।”
“अच्छा, भन्ते!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—(1) “भिक्षुओ! चक्षु को यथार्थतया न जाने, न देखे, रूपो को ॰, चक्षुर्विज्ञान को ॰, चक्षुःसंस्पर्श को ॰, और चक्षु-संस्पर्श से जो सुखा, दुःखा, अदुःख-असुखा वेदना उत्पन्न होती है, उसे भी यथार्थतया न जाने, न देखे, चक्षु में रक्त होता है, रूप में ॰, चक्षु-र्विज्ञान में ॰, चक्षु-संस्पर्श में ॰, और चक्षु-संस्पर्श से जो सुखा, दुःखा, अदुःख-असुखा वेदना उत्पन्न होती है, उसमें रक्त होता है। रक्त, संयुक्त, समूढ (=मोह प्राप्त), आस्वाद देखने वाले हो विहरते उस (=पुरूष के लिये, भविष्य में पाँच उपादान-स्कंध संचित हो जाते है। और वहाँ वहाँ अभिनंदन करने वाली, राग-युक्त, पुनर्जन्म देने वाली उसकी नन्दनी=तृष्णा बढती है। उसके कायिक दरथ (=डर, खेद) भी बढते हैं, चेतसिक (=मानस) दरथ भी बढते है, कायिक सन्ताप भी ॰, चेतसिक सन्ताप ॰, कायिक परिदाह (=जलन) भी ॰, चेतसिक परिदाह भी ॰,। यह कायिक दुःख को भी, चेतसिक दुःख को भी अनुभव करता है।
(2) ”॰ श्रोत्र को ॰। ॰। ॰, चेतसिक दुःख को अनुभव करता है।
(3) ”॰ घ्राण को ॰। ॰। ॰, ॰।
(4) ”॰ जिह्वा को ॰। ॰। ॰, ॰।
(5) ”॰ काय को ॰। ॰। ॰, ॰।
(6) ”॰ मन को ॰। ॰। ॰, ॰।
(1) “भिक्षुओं! चक्षु को यथार्थतया जानते देखते, ॰ चक्षु में रक्त नहीं होतां ॰ न रक्त हो ॰ विहरते, उसके लिये भविष्य ममें पाँच उपादान-स्कंध अप-चित्त (विलग) होते हैं। और ॰ तृष्णा नष्ट होती है। उसके कायिक दरथ भी नष्ट होते है, ॰। वह कायिक सुख को भी, चेतसिक सुख को भी अनुभव करता है।
“ऐसे की जो दृष्टि होती है, वह इसकी (1) सम्यक्दृष्टि होती है। ऐसे का जो संकल्प होता है, वह इसका (2) सम्यक्-संकल्प होता है। (3) सम्यग्-व्यायाम ॰। ॰ (4) सम्यक्-स्मृति ॰। ॰ (5) सम्यक्-समाधि होती है। पहिले ही इसका (6) काय-कर्म, (7) वचन-कर्म, (8) आजीव (=जीव का) सुपरिशुद्ध होती है। इस प्रकार उसके आर्य अष्टांगिक मार्ग भावना द्वारा परिपूर्ण हुये होते हैं। उसके इस प्रकार आर्य-अष्टांगिक-मार्ग की भावना करते चारों स्मृति प्रस्थान भावना द्वारा परिपूर्ण होते है। ॰ चारो सम्यक्-प्रधान ॰। ॰ चारों ॰। ऋद्धिपाद ॰। ॰ पाँचों इन्द्रियाँ ॰। ॰ पाँचों बल ॰। ॰ सातो बैध्यंग ॰। ॰ उसके यह दोनो धर्म-शपथ (=समाधि) और विपश्ना (=प्रज्ञा युगबद्ध (जुडे) रहते है) वह अभिज्ञा द्वारा जानने लायक धर्मो को अभिज्ञा से जानता है; जो धर्म अभिज्ञा द्वारा त्याज्य (=प्रहातव्य) है, उन्हें अभिज्ञा से त्यागता है; ॰ भावना करने योग्य है, उन्हें अभिज्ञा से भावना करता है; जो धर्म अभिज्ञा द्वारा साक्षात्कार करने योग्य है, उन्हें अभिज्ञा द्वारा साक्षात्कार करता है।
“भिक्षुओ! कौन से धर्म अभिज्ञा द्वारा परिज्ञेय (=जानने योग्य) हैं?—पाँच उपादान स्कंध कहने चाहिये; जैसे कि रूप-उपादान-स्कंध, वेदना ॰। संज्ञा, संस्कार ॰ विज्ञान स्कंध।
“॰ कौन से धर्म अभिज्ञाद्वारा प्रहातव्य हैं?—अ-विद्या, और भव-तृष्णा=लोकतर में आवागमन का लोभ।…
“॰ कौन से धर्म अभिज्ञाद्वारा भावना करने योग्य है?—शमथ, और विपश्यना।”
“॰ कौन से धर्म अभिज्ञाद्वारा साक्षात्कार करने योग्य है?—विद्या और विमुक्ति।”
(2) “भिक्षुओ! श्रोत्रको ॰। ॰। ॰, ॰ ।
(3) ”॰ घ्राण को ॰। ॰। ॰, ॰।
(4) ”॰ जिह्वा को ॰। ॰। ॰, ॰।
(5) ”॰ काय को ॰। ॰। ॰, ॰।
(6) ”॰ मन को ॰। ॰। ॰—विद्या और विमुक्ति यह धर्म अभिज्ञा द्वारा साक्षात्कार करने योग्य है।”
भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनंदन किया।
Über diese Übersetzung
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Mögen alle Wesen glücklich sein