Uposatha

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MN 79

Cūḷasakuludāyi sutta: चूल-सकुलुदायि-सुत्तन्त

Cūḷasakuludāyisutta

Paribbājakavagga

Übersetzungen

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् राजगृह में वेणुवन कलन्दक-निवाप में विहार करते थे। उस समय सकुल-उदायी परिब्राजक महती परिषद् के साथ परिब्राजकाराम में वास करता था।

भगवान् पूर्वाह्न समय ॰। ॰ जहाँ सकुल-उदायी परिब्राजक था, वहाँ गये। तब सकुल-उदायी परिब्राजक ने भगवान् से कहा—“आइये भन्ते ॰।”

“जाने दीजिये भन्ते! इस कथा को ॰। जय मैं भन्ते! इस परिषद् के पास नहीं होता, तब यह परिषद् अनेक प्रकार की व्यर्थ कथायें (= तिरच्छाण-कथा) कहती बैठती है। और जब भन्ते! मैं इस परिषद् के पास होता हूँ , तब यह परिषद् मेरा ही मुख देखती बैठी रहती है—‘हमें श्रमण उदायी जो कहेगा, उसे सुनेंगे।ः जब भन्ते! भगवान् इस परिषद् के पास होते हैं, तब मैं और यह परिषद् भगवान् का मुख ताकती बैठी रहती है—‘भगवान् हमें जो धर्म उपदेश करेंगे, उसे हम सुनेंगे’।”

“उदायी! तुझे ही जो मालूम पडे, मुझे कह।”

“पिछले दिनों भन्ते! (जो वह) सर्वज्ञ=सर्वदर्शी, निखिल-ज्ञान-दर्शन (= ज्ञाता) होने का दावा करते हैं—‘चलते, खडे, सोते-जागते भी (मुझे) निरन्तर ज्ञान-दर्शन उपस्थित रहता है।’ वह मेरे शुरू से लेकर प्रश्न पूछने पर, इधर उधर जाने लगे, बाहर की कथा में जाने लगे। उन्होंने कोप, द्वेष और अविश्वास प्रकट किया। तब भन्ते! मुझे भगवान् के ही प्रति प्रीति उत्पन्न हुई—‘अहो! निश्चय भगवान् (हैं), अहो! निश्चय सुगत (हैं), जो इन धर्मो में पंडित (= कुशल) हैं।”

“कौन हैं यह उदायी! सर्वज्ञ=सर्वदर्शी ॰, जो कि तेरे शुरू से लेकर प्रश्न पूछने पर इधर उधर जाने लगे ॰ अविश्वास प्रकट किये?”

“भन्ते! निगंठ नाथ-पुत्त।”

“उदायी! जो अनेक प्रकार के पूर्व-जन्मों को जानता है ॰, वह मुझे आरम्भ (= पूर्व-अत) के विषय में प्रश्न पूछे, और उसको मैं पूर्वान्त के विषय में प्रश्न पूछूँ। वह मेरे पूर्वान्त-विषयक प्रश्न का उत्तर देकर, मेरे चित्त को प्रसन्न करे; और मैं उसके पूर्वान्त-विषयक प्रश्न का उत्तर देकर, उसके चित्त को प्रसन्न करूँ। जो उदायी! दिव्य ॰ चक्षु से ॰ सत्वों को च्युत होते, उत्पन्न होते देखता है। वह मुझे दूसरे छोर (= अपर-अन्त) के विषय में प्रश्न पूछे। मैं उसे दूसरे छोर के विषय में प्रश्न पूछूँ। वह मेरे ॰ प्रश्न का उत्तर दे, मेरे चित्त को प्रसन्न करें; और ॰ मैं उसको चित्त को ॰ या उदायी! जाने दो पूर्व-अन्त, जाने दो अपर-अन्त। तुझे धर्म बतलाता हूँ—‘ऐसा होने पर, यह होता है, इसके उत्पन्न होने से, यह उत्पन्न होता है। इसके न होने पर यह नहीं होता। इसके निरोध (= विनाश) होने पर यह निरूद्ध होता है।’

“भन्ते! मैं, जो कुछ कि इसी शरीर में अनुभव किया है, उसे भी आकार-उद्देश-सहित स्मरण नहीं कर सकता, कहाँ से भन्तेे! मैं अनेक-विहित पूर्व-निवासों (= पूर्व जन्मों) को स्मरण करूँगा—॰, जैसे कि भगवान्? भन्ते! मैं इस वक्त पांसु-पिशाचक (= चुडैल) को भी नहीं देखता, कहाँ से फिर मैं दिव्य ॰ चक्षु से ॰ सत्वों को च्युत ॰ उत्पन्न होते ॰ देखूँगा ॰, जैसे कि भगवान्? भन्ते! भगवान् ने जो मुझे कहा—‘उदायी! जाने दो पूर्वान्त ॰ इसके निरोध होने पर यह निरूद्ध होता है।’ यह मेरे लिये अधिक पसन्द जान पडता है। क्या भन्ते! मैं अपने मत (= आचार्यक) के अनुसार प्रश्नोत्तर दे, भगवान् के चित्त को प्रसन्न करूँ?”

“उदायी! तेरे (अपने) मत में क्या होता है?”

“हमारे मत (= आचार्यक) में भन्ते! ऐसा होता है—‘यह परम-वर्ण (है), यह परम-वर्ण (है)।’

“उदायी! जो यह तेरे आचार्यक में ऐसा होता है—‘यह परम-वर्ण, यह परम-वर्ण’ वह कौनसा परम-वर्ण है?”

“भन्ते! जिस वर्ण से उत्तर-तर=या प्रणीततर (= उत्तमतर) दूसरा वर्ण नहीं है, वह परम-वर्ण है।”

“कौन है उदायी! वह वर्ण; जिससे ॰ प्रणीततर दूसरा वर्ण नहीं है?”

“भन्ते! जिस वर्ण (= रंग) से ॰ प्रणीततर (= अधिक, उत्तम) दूसरा वर्ण नहीं है; वह परम-वर्ण है।”

“उदायी! यह तेरी (बात) दीर्घ-(काल तक) भी चले—‘जिस वर्ण से ॰ प्रणीततर दूसरा वर्ण नहीं ॰’ तो भी तू उस वर्ण को नहीं बतला सकता। जैसे कि उदायी! (कोई) पुरूष ऐसा कहे—मैं जो इस जनपद (= देश) में जनपद-कल्याणी (= सुन्दरियों की रानी) है, उसको चाहता हूँ ॰ तो क्या मानते हो उदायी! क्या ऐसा होने पर उस पुरूष का कथन अ-प्रामाणिक नहीं होता?”

“अवश्य भन्ते! ऐसा होने पर उस पुरूष का कथन अ-प्रामाणिक होता है।”

“इसी प्रकार तू उदायी!—‘जिस वर्ण से ॰ प्रणीततर दूसरा वर्ण नहीं, वह परम-वण है’ कहता है, और उस वर्ण को नही बतलाता।”

“जैसे भन्ते! शुभ्र, उत्तम जाति की अठकोणी, पालिश की हुई वैदूर्य-मणि (= हीरा), पांडु-कंबल (= लाल-दोशाले) मे रखी, भासित होती है, चमकती है, विरोचित होती है; मरने के बाद भी आत्मा इसी प्रकार के वर्णवाला हो, अरोग (= अ-विनाशी) होता है।”

“तो क्या मानते हो, उदायी! शुभ्र ॰ वैदूर्य-मणि ॰ विरोचित होती है, और जो वह रात के अन्धकार में जुगनू कीडा है, इन दोनों वर्णो (= रंगो) में अधिक चमकीला (= अभिक्रांततर) और प्रणीत-तर है?”

“जो यह भन्ते! रात के अन्धकार में जुगनू कीडा है, यही इन दोनों वर्णों में अधिक चमकीला ॰ है।”

“तो क्या मातने हो, उदायी! जो वह रात के अंधकार में जुगनू कीडा है और जो वह रात के अंधकर में तेल का प्रदीप (है); इन दोनों वर्णों में कौनसा अधिक चमकीला या प्रणीत-तर है?”

“भन्ते! यह जो रात के अंधकार में तेल’—प्रदीप है ॰।”

“तो क्या मानते हो उदायी! जो वह रात के अंधकार में तेल-प्रदीप है, और जो वह रात के अंधकार में महान् अग्नि-स्कंध (= आग का ढेर) है। इन दोनों वर्णो में कौनसा अधिक चमकीला ॰ है?”

“भन्ते जो यह ॰ अग्नि

Über diese Übersetzung

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Mögen alle Wesen glücklich sein