MN 80
Vekhanasa sutta: वेखणस-सत्तुन्त
Vekhanasasutta
Paribbājakavagga
Übersetzungen
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।
तब वेखणस (=वैखानस) परिब्राजक जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया; जाकर भगवान् के साथ…संमोदन कर एक ओर खडा हुआ। एक ओर खडे वेखणस परिब्राजक ने भगवान् के पास यह उदान (=आनंदोल्लास में निकली वाक्यावली) उदाना—“यह परम (=उत्तम) वर्ण है।”
“क्या है, वह परम वर्ण?”
“भो गौतम! जिस वर्ण से अधिक अच्छा=प्रणीततर दूसरा वर्ण नहीं है, वह परम-वर्ण है।”
“कात्यायन! वह कौनसा वर्ण है, जिस वर्ण से अधिक अच्छा=प्रणीततर दूसरा वर्ण नहीं है।”
“भो गौतम! जिस वण्र से अधिक अच्छा=प्रणीततर दूसरा वर्ण नहीं है, वह परम-वर्ण है।”
“कात्यायन! इस वचन को काहे लम्बा बढाता बोल रहा है—‘भो गौतम! जिस वर्ण से ॰ वह परमवर्ण है’; किन्तु उस वर्ण को नहीं बतलाता। जैसे कात्यायन! कोई पुरूष ऐसा कहे—इस जनपद (=देश) में जो जनपद-कल्याणी (=देश की सुन्दरतम स्त्री) है, मैं उसको चाहता हूँ, उसकी कामना करता हूँ। उसको यदि (लोग) ऐसा पूछें—‘हे पुरूष! जिस जनपद-कल्याणी को तू चाहता है, कामना करता है; जानता है, वह क्षत्रियवाणी है, ब्राह्मणी है, वैश्य-स्त्री है, या शूद्री हैं?—ऐसा पूछने पर ‘नहीं’ कहे। तब उससे पूछें—‘हे पुरूष! जिस जनपद-कल्याणी को तू चाहता है, (वह) अमुक नाम वाली, अमुक गौत्र वाली है; लम्बी, छोटी या मझाली, है; काली, श्यामा या मंगुर (मछली के) वर्ण की है; अमुक ग्राम, निगम या नगर में रहती है?’—ऐसा पूछने पर ‘नहीं’ कहे। तब उससे यह पूछे—‘हे पुरूष! जिसको तू नहीं जानता, जिसको तूने नहीं देखा; उसको तू चाहता है; उसकी तू कामना करता है?’—ऐसा पूछने पर ‘हाँ’ कहे। तो क्या मानता है, कात्यायन! ऐसा कहने पर क्या उस पुरूष का कथन अर्थहीन नहीं होता?”
“जरूर, भो गौतम! ऐसा कहने पर उस पुरूष का कथन अर्थहीन हो जाता है।”
“ऐसे ही कात्यायन! तू कहता है—‘भो गोतम! जिस वर्ण से ॰ वह परमवर्ण है’, किन्तु उस वर्ण को नहीं बतलाता।
“जैसे भो गोतम! शुभ्र उत्तम जाति की अठकोणी पालिश की हुई वैदूर्य-मणि (=हीरा) ॰।
“॰ और तू तो कात्यायन! जो यह जुगनू कीडे से भी हीनतर निकृष्टतर वर्ण है, उसी को परमवर्ण (कहता है), उसी की प्रशंसा करता है।
“कात्यायन! यह पाँच काम-गुण (=विषयभोग) हैं। कौन से पाँच?—(1) इष्ट, कान्त ॰ चक्षुद्वारा विज्ञेय रूप; (2) ॰ श्रोत्र-विज्ञेय शब्द, (3) ॰ घ्राण-विज्ञेय गंध; (4) ॰ जिह्वा-विज्ञेय रस; (5) ॰ काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्य।कात्यायन! यह पाँच काम-गुण हैं। कातयायन! इन पाँच काम-गुणों को लेकर जो सुख=सौमनस्य उत्पन्न होता है, वह काम-सुख कहा जाता है। इस प्रकार कामों से काम-सुख और काम-सुख से काम-अग्र (=श्रेष्ठ भोग) सुख श्रेष्ठ कहा जाता है।”
ऐसा कहने पर वेखणस परिब्राजक ने भगवान् से यह कहा—
“आश्चर्य! भो गोतम! अद्भूत!! भो गौतम! क्या सुभाषित (=ठीक कहा) आप गौतम का है—कामों से काम-सुख, और कामसुख से कामाग्र-सुख श्रेष्ठ कहा जाता है।”
“कात्यायन! अन्य दृष्टि (=दूसरा मत रखने वाले) =अन्य-क्षान्तिक=अन्य-रूचिक, अन्यत्र-आयेाग (=आसक्ति) वाले, अन्यत्र-आचार्यक (=दूसरा ज्ञान रखने वाले) तेरे लिये काम, काम-सुख, कामाग्र-सुख — यह जानना दुष्कर है। कात्यायन! जो वह भिक्ष अर्हत् ब्रह्मचर्य वास कर चुके, कृतकरणीय, भारमुक्त ॰ क्षीणास्रव हैं, वह इस — काम, काम-सुख, कामाग्र-सुख को जान सकते हैं।”
ऐसा कहने पर वेखणस परिब्राजक कुपित=असंतुष्ट-मना हो भगवान् को ही खुंसाते, भगवान् पर ही नाराज होते, भगवान् को—‘श्रमण गौतम ही (अज्ञता को) प्राप्त होगा’—(कह) भगवान् से यह बोला—
“इसी प्रकार यहाँ कोई कोई श्रमण-ब्राह्मण पूर्वान्त (=आरम्भ के छोर) को बिना जाने, पश्चिम-अन्त को बिना देखे, यह दावा करते हैं—‘जन्म क्षीण हो गया, ब्रह्मचर्य वास समाप्त हो गया, करना था सो कर लिया, अब यहाँ और करने को नहीं—यह हम जानते हैं।’ उनका यह कथन ह्रस्वक (छोटा) लामक रिक्त=तुच्छ ही होता है।”
“कात्यायन! जो श्रमण ब्राह्मण पूर्वान्त बिना जाने ॰ यह दावा करते हैं—‘जन्म क्षीण हो गया॰ यह हम जानते हैं’ उनका यह धार्मिक निग्रह होता है। कात्यायन! रहे पूर्वान्त, रहे पश्चिमान्त; कोई सरल, अ-शठ=अ-मायावी विज्ञ पुरूष आवे; मैं उसे अनुशासन करता हूँ, मैं (उसे) धर्मोपदेश करता हूँ। (मेरे) अनुशासन के अनुसार आचरण करते जल्दी ही स्वयं जानेगा, स्वयं देखेगा—‘इस प्रकार अविद्या (रूपी) बंधन से मुक्ति होती है। जैसे, कात्यायन! उतान सोने वाला, अबोध छोटे बच्चे के (दो हाथे-दो पैरो) और पाँचवें कंठ में सूत के बंधन बँधे हो; उसके होश सँभालने पर, इन्द्रियों (=ज्ञान) के परिपक्व होने पर वह बंधन छूट जाते हैं। वह ‘मैं मुक्त हूँ’ यही जानता है, बंधन को नहीं (जानता); ऐसे ही कात्यायन! ॰ कोई ॰ विज्ञ पुरूष आवे ॰ स्वयं देखेगा—‘इस प्रकार अविद्या-बंधन से मुक्ति होती हैं’।”
ऐसा कहने पर वेखणस परिब्राजक ने भगवान् से यह कहा—
“आश्चर्य! भो गौतम! आश्चर्य!! भो गौतम! जैसे औंधे को सीधा कर दे ॰ यह मैं भगवान् गौतम की शरण जाता हॅँ, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आप गौतम आज से मुझे अंजलिबद्ध शरणागत उपासक स्वीकार करें।”
Über diese Übersetzung
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Mögen alle Wesen glücklich sein