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MN 81

Ghaṭikāra sutta: घटिकार-सुत्तन्त

Ghaṭikārasutta

Rājavagga

Übersetzungen

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् महान् भिक्षुसंघ के साथ कोसल (देश) में चारिका (=रामत, भ्रमण) कर रहे थे।

तब भगवान् ने मार्ग से हट कर एक स्थान पर स्मित (=मुस्कुराहट) प्रकाशित किया। तब आयुष्मान् आनंद को यह हुआ—‘क्या हेतु=क्या प्रत्यय है, भगवान् के स्म्ति करने का? तथागत बिना कारण के स्मित प्रकट नहीं किया करते।’ तब आयुष्मान् आनंद एक (बायें) कंधे पर उत्तरा सगको करके, जिधर भगवान् थे, उधर अंजलि जोडकर भगवान् से यह बोले—

“भन्ते! क्या हेतु=क्या प्रत्यय है भगवान् के स्मित प्रकट करने का? भन्ते! तथागत बिना कारण के स्मित प्रकट नहीं किया करते।”

“आनन्द! पूर्वकाल में इस प्रदेश में ऋद्ध (=समृद्ध)=स्फीत, बहुजनाकीर्ण वेहलिंग नाम ग्राम-निगम था। वेहलिंग के समीप भगवान् काश्यप अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध विहार किये थे। आनन्द! यहाँ भगवान् काश्यप अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध ने बैठकर भिक्षु संघ को उपदेश किया था।”

तब आयुष्मान् आनंद ने चैपेती संघाटी को बिछा कर, भगवान् से यह कहा—

“तो भन्ते! भगवान् बैठे, इस प्रकार यह स्थान दो अर्हतों से सेवित होगा।”

भगवान् बिछे आसन पर…बैठकर, आयुष्मान् आनंद से बोले—

“आनंद! पूर्वकाल में इस प्रदेश में ऋद्ध=स्फीत, बहुजनाकीर्ण वेहलिंग नामक ग्राम-निगम था। वेहलिंग के समीप भगवान् काश्यप अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध विहार किये थे। यहाँ आनंद! भगवान् कायश्प ॰ का आराम था। यहाँ आनंद! भगवान् काश्यप ॰ भिक्षु संघ को उपदेश करते थे।

“आनन्द! वेहलिंग ग्राम-निगम में घटिकार नामक कुम्भकार (=कुम्हार) भगवान् काश्यप ॰ का अग्र-उपस्थाक (=प्रधान सेवक) रहता था। घटिकार कुम्भकार का जोतिपाल नामक माणवक (=ब्राह्मण-तरूण) प्रियमित्र था। तब आनन्द! घटिकार कुम्भकार ने जोतिपाल माणवक को सम्बोधित किया—‘आओ चले सौम्य जोतिपाल! भगवान् काश्यप ॰ के दर्शन को। उन भगवान् अर्हत् सम्यक्-सम्बुद्ध का दर्शन साधु-सम्मत है।’ ऐसा कहने पर आनन्द! जोतिपाल माणवक ने घटिकार कुम्भकार से यह कहा—‘रहने दो सौम्य घटिकार! उस मुंडक श्रमण के देखने से क्या (फल)?’ दसूरी बार भी घटिकार ॰। तीसरी बार भी घटिकार कुम्भकार ने जातिपाल माणवक को सम्बोधित किया—‘आओ चलें सौम्य जोतिपाल! ॰ दर्शन साधु सम्मत है’। तीसरी बार भी आनंद! जोतिपाल माणवक ने घटिकार कुम्भकार से यह कहा—‘रहने दो सौम्य घटिकार! उस मुंडक श्रमण को देखने से क्य?’ ‘तो सौम्य जोतिपाल! स्नान-चूर्ण-पिंड (सोत्ति सिनाति) ले चलो नहाने के लिये नदी चलें।’ ‘अच्छा, सौम्य’—(कह) जोतिपाल माणवक ने घटिकार कुम्भकार को उत्तर दिया। तब आनन्द! घटिकार कुम्भकार और जोतिपाल माणवक सोत्ति-सिनातिको लेकर स्नान के लिये नदी गये। तब आनन्द घटिकार कुम्भकार ने जोतिपाल माणवक से कहा—‘सौम्य जोतिपाल! यह पास में भगवान् काश्यप ॰ का आराम है; आओ चलें सौम्य जोतिपाल! ॰ उन भगवान् ॰ का दर्शन साधु-सम्मत है।’ ऐसा कहने पर आनन्द! जोतिपाल माणवक ने घटिकार कुम्भकार से यह कहा—‘रहने दो सौम्य घटिकार!॰।’ दूसरी बार भी ॰। तीसरी बार भी ॰।

“तब आनन्द! घटिकार कुम्भकार ने जोतिपाल माणवक का कपडा पकडकर कहा—‘सौम्य जोतिपाल! यह पास में भगवान् काश्यप ॰ का आराम है; आओ च लें सौम्य जोतिपाल! ॰ उन भगवान् ॰ दर्शन साधु-सम्मत है’। तब आनन्द! जोतिपाल माणवक कपडा समेटकर घटिकार कुम्भकार से बोला—‘रहने दो सौम्य घटिकार!॰।’ तब आनन्द! घटिकार कुम्भकार ने शिर से नहाये जोतिपाल माणवक के केश पर हाथ फेरकर यह कहा—‘सौम्य जोतिपाल! यह पास में ॰ दर्शन साधु सम्मत है।’ तब आनन्द! जोतिपाल माणवक को यह हुआ — आश्चर्य भो! अद्भूत भो! जो कि यह घटिकार कुम्भकार इतरजाति (=नीच जाति) का होते भी शिर से नहाये हमारे केश को छू रहा है। यह छोटी बात न होगी; और घटिकार कुंभकार से बोला—‘अच्छा, सौम्य घटिकार!’ ‘अच्छा, सौम्य जोतिपाल! उन भगवान् ॰ का दर्शन वैसा साधु सम्मत है।’ ‘तो सौम्य घटिकार! छोडो चलूँगा।

“तब आनंद! घटिकार कुंभकार और जोतिपाल माणवक जहाँ भगवान् काश्यप अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध थे वहाँ गये। घटिकार कुम्भकार भगवान् काश्यप ॰ को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। जोतिपाल माणवक भी भगवान् काश्यप ॰ के साथ…सम्मोदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठै आनंद! घटिकार कुम्भकार ने भगवान् काश्यप ॰ से यह कहा—‘भन्ते! यह जोतिपाल माणवक मेरा प्रियमित्र है, इसे भगवान् धर्मोपदेश करें’। तब आंनंद! भगवान् काश्यप ॰ ने घटिकार कुम्भकार और जोतिपाल माणवक को धार्मिक कथा द्वारा संदर्शित=समपदपित, समुत्तेजित, संप्रशंसित किया। तब आनंद! घटिकार कुम्भकार और जोतिपाल माणवक भगवान् काश्यप ॰ की धार्मिक कथा द्वारा ॰ समुत्तेजित संप्रशंसित हो, भगवान् काश्यप ॰ के भाषण को अभिनंदित अनुमोदित कर, आसन से उठ, भगवान् काश्यप को अभिवादन कर प्रदक्षिणा कर चले गये।

“तब आनंद! जोतिपाल माणवक ने घटिकार कुम्भकार से यह कहा—‘अहो! सौम्य घटिकार! धर्म सुनते भी तो घर से बेघर हो प्रब्रजित नहीं होता।’ क्यों सौम्य जोतिपाल! तुम जानते हो, अंधे माता-पिता को मैं पोसता हूँ?’ ‘तो सौम्य घटिकार! मैं घर से बेघर हो प्रब्रजित होता हूँ?’

“तब आनंद! घटिकार कुम्भकार और जोतिपाल माणवक जहाँ भगवान् काश्यप ॰ थे, वहाँ गये। ॰ एक ओर बैठे घटिकार कुम्भकार ने भगवान् काश्यप ॰ से यह कहा—‘भन्ते! यह जोतिपाल माणवक मेरा प्रियमित्र है, इसे भगवान् प्रब्रजित करें।’ आनंद! जोतिपाल माणवक ने भगवान् काश्यप ॰ के पास प्रब्रज्या उपसम्पदा पाई।

“तब आनंद! जोतिपाल के उपसम्पन्न (=भिक्षु) होने के थोडे ही समय बाद, पन्द्र दिन बाद, भगवान् काश्यप ॰ वेहलिंग में इच्छार्वूक विहार कर वाराणसी की ओर चल दिये। क्रमशः चारिका करते जहाँ वाराणसी है, वहाँ पहूँचे। वहाँ आनन्द! भगवान् काश्यप ॰ वाराणसी में ऋषिपतन मृगदाव में विहार करते थे। आनन्द! काशिराज किकिने सुना—भगवान् काश्यप ॰ वाराणसी पहूँच…ऋषिपतन मृगवदा में विहार करते हैं। तब आनन्द! काशिराज काशिराज किकि उत्तमोत्तम यानों को जुडवाकर (एक) उत्तम यान (=रथ) पर (स्वयं) आरूढ हो उत्तमोत्तम यानों के साथ बडे ॰ राजसी ठाटबाट के साथ भगवान् काश्यप ॰ के दर्शनार्थ वाराणसी (=बनारस) से निकला। जितना यान का रास्ता था, उतना यान से जा (फिर) यान से उतर पैदल ही जहाँ भगवान् काश्यप ॰ थे, वहाँ जाकर…भगवान् काश्यप ॰ को अभिवादन कर एक बैठ गया। एक ओर बैठे काशिरात किकि ने भगवान् काश्यप ॰ ने धार्मिककथा से ॰ समुत्तेजित संप्रशसित किया। तब भगवान् काश्यप ॰ से ॰ संप्रशंसित हो काशिराज किकि भगवान् काश्यप ॰ से यह बोला—‘भन्ते! भगवानृ भिक्षु-संघ के साथ कल के लिये मेरा भोजन स्वीकार करें। भगवान् काश्यप ॰ ने मौन से स्वीकार किया। तब आनंद! काशिराज किकि ने भगवान् काश्यप ॰ की स्वीकृति को जान कर, आसन से उठ भगवान् काश्यप ॰ को अभिवादन कर प्रदक्षिणा कर चला गया।

“तब आनन्द! काशिराज किकि ने उस रात के बीतरने पर अपने मकान पर कालिमारहित पडुमुटिक (=लाल धान का भात), अनेक व्यंजनों (=तियँन) का उत्तम खाद्य-भोज्य तैयार करा, भगवान् काश्यप ॰ को काल की सूचना दी—’(भोजन का) काल है भन्ते! भात तैयार है’। तब आनंद! पूर्वाह्न के समय पहिन कर पात्र-चीवर ले भिक्षुसंघ के साथ भगवान् काश्यप ॰ जहाँ काशिराज किकि का घर था, वहाँ गये; जाकर भिक्षुसंघ के साथ बिछे आसन पर बैठे। तब आनंद! काशिराज किकि नक बुद्धप्रमुख भिक्षुसंघ को अपने हाथ से उत्तम खाद्य-भोज्य परोस सतर्षित=संप्रवारित किया।

“तब आनंद! भगवान् काश्यप ॰ के भोजनकर हाथ हटा लेने पर, काशिराज किकि एक नीचा आसन ले एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे काशिराज किकि भगवान् काश्यप ॰ से यह कहा—‘भन्ते! भगवान् वाराणसी में वर्षावास स्वीकार करें, इस प्रकार से संघ की सेवा होगी।’ ‘नहीं, महाराज! वर्षावास मेरा हो चुका’। दूसरी बार भी ॰। तीसरी बार भी ॰। तब आनंद! काशिराज किकि को ‘भगवान् ॰ वाराणसी में वर्षावास नहीं स्वीकार करते’—(सोच) दुःख हुआ, विमनता हुई। तब आनंद! काशिराज किकि ने भगवान् काश्यप ॰ से यह कहा—‘क्या भन्ते! आपका मुझसे भी अच्छा कोई उपस्थाक (=सेवक) है?’ ‘महाराज! वेहलिंग नामक ग्राम-निगम है, वहाँ घटिकार नामक कुंभकार है, वह मेरा अग्र उपस्थाक है। तुझे महाराज!” भगवान् वाराणसी में मेरा वर्षावास (निमंत्रण) स्वीकार नहीं करते—(यह सोचकर) दुःख हुआ, वेमतना हुई; घटिकार कुंभकार को यह नहीं होती, न होवेगी। महाराज! घटिकार कंुभकार बुद्ध की शरण गया है, धर्म की शरण गया है, संघ की शरण गया है। महाराज! घटिकार कुंभकार प्राणातिपात (=हिंसा) से विरत, अदत्तादान (=चोरी) से विरत, काम-मिथ्याचार से विरत, मृषावाद (=झूठ) से विरत, सुरा-मेरय-मद्य-प्रमादस्थान (=नशीली चीजों) से विरत है। महाराज! घटिकार कुंभकार बुद्ध में अतीव श्रद्धायुक्त, धर्म में ॰, संघ मंे अतीव श्रद्धायुक्त हैं, आर्यकान्त शीलों (=सुन्दर सदाचारों) युक्त है। महाराज! घटिकार कुंभकार दुःख में (सत्य) में संशय-रहित है, दुःख-समुदय में संशय-रहित, दुःख-निरोध में संशय-रहित, दुःखनिरोध गामिनी प्रतिपद् में संशयरहित है। महाराज! घटिकार कुंभकार एकाहारी, ब्रह्मचारी, शीलवान् कल्याणधर्मा (=पुण्यात्मा) है। महाराज! घटिकार कुम्भकार मणिसवर्ण-त्यागी, सोना-चाँदी-विरत है। महाराज! घटिकार कुम्भकार मूसल (आदि कूटने खोदने के हथियारों)-त्यागी है, अपने हाथ से पृथिवी को नहीं खोदता। उसके घर पर आने वाले चूहे कुक्करों को भी (भोजन) बाँट कर कहता है—यहाँ जो चावल, मूंग, या मटर जिस किसी भोजन को चाहता है, (बाकी को) छोड उसे ले जाये। महाराज! घटिकार कुम्भकार अंधे माता-पिता को पोसता है। महाराज! घटिकार कुम्भकार पाँच अवर-भागीय-संयोजनों के क्षय से उस (लोक) में औपपातिक (=देवता) हो निर्वाण पाने वाला है, उस लोक से लौटकर न आने वाला है।

“महाराज! एक समय मै वेहलिंग ग्राम-निगम में विहार करता था। तब महाराज! पूर्वाह्न समय पहिनकर पात्र-चीवर ले मैं जहाँ घटिकार कुम्भकार का घर है, वहाँ गया। जाकर घटिकार कुम्भकार के माता पिता से यह कहा—‘हन्त! यह भार्गव कहाँ गया?’ ‘भन्ते! आपका उपस्थाक बाहर गया हुआ है, इस हँडिया (=कुम्भी) से भात लेकर, बर्तन (=परियोग) से सूप (=दाल, व्यंजन) लेकर भोजन करें।’ तब महाराज! मैने कुम्भी से भात और परियोग से सूप ले भोजन कर, आसन से उठकर चल दियां तब महाराज! घटिकार कुम्भकार जहाँ (उसके) माता-पिता थे, वहाँ गया; जाकर माता-पिता से यह बोला—‘कौन कुम्भी से भात और परियोग से सूप ले भोजन कर आसन से उठक्र चला गया?’ ‘तात! भगवान् काश्यप ॰ कुम्भी से भात ले ॰ भोजनकर ॰ चले गये।’ तब महाराज! घटिकार कुम्भकार को यह हुआ—‘सुलाभ है हो! मेरा; (जो कि) मेरे ऊपर भगवान् काश्यप ॰ का इतना विश्वास है।’ तब महाराज! घटिकार कुम्भकार को उस प्रीतसुख (=प्रसन्नता के सुख) ने अर्ध मास तक नहीं छोडा, (और) माता-पिता को सप्ताह भर (नहीं छोडा)।

“महाराज! एक बार मैं उसी वेहलिंग ग्राम-निगम में विहार करता था। तब महाराज! मैं पूर्वाह्न समय पहिनकर पात्र-चीवर ले जहाँ घटिकार कुम्भकार के माता पिता थे, वहाँ गया। जाकर ॰ माता-पिता से बोला—‘हन्त! यह भार्गव कहाँ गया है? ॰ तब महाराज मैं कलोपी (=बर्तन) से कुल्माष (=कुलथी), परियोग से सूप ले, भोजनकर आसन से उठकर चला गया।’ ॰ माता-पिता को सप्ताह भर।

“महाराज! एक बार मैं उसी वेहलिंग ग्राम-निगम में विहार करता था। उस समय (मेरी) गंधकुटी चू रही थी। तब महाराज! मैंने भिक्षुओं से कहा—‘जाओ भिक्षुओ! घटिकार कुम्भकार के घर पर तृण ढूँढों।’ ऐसा कहने पर महाराज! भिक्षुओं ने मुझे कहा—‘भन्ते! घटिकार कुम्भकार के घर पर तृण नहीं है; (किन्तु) नया छाया हुआ है।’ ‘जाओ भिक्षुओ! घटिकार कुम्भकार के घर को तृण-बिना कर दो।’ तब महाराज! उन भिक्षुओं ने घटिकार कुम्भकार के घर को तृण-बिना कर दिया। तब महाराज! घटिकार कुम्भकार के माता-पिता ने भिक्षुओं से यह कहा—‘कौन घर को उजाड रहे हैं?’ ‘भिक्षु, भगिनी! भगवान् काश्यप ॰ की गंधकूटी चू रही है।’ ‘ले जाओ, भन्ते! ले जाओ भद्रमुखो! तब महाराज! घटिकार कुम्भकार जहाँ माता-पिता थे वहाँ गया। जाकर माता-पिता से बोला—‘किनने घर को उजाड दिया (=बेछानका कर दिया)?’ ‘भिक्षु, तात! भगवान् काश्यप ॰ की गंधकुटी चू रही थी।’ तब महाराजा! घटिकार कुम्भकार-पुत्र को ऐसा हुआ—‘सुलाभ है हो! ॰ माता-पिता को सप्ताह भर। तब महाराज! वह सारा घर तीन मास तक आकाश-छदन (=आकाश ही जिसकी छत है) रहा, किन्तु नहीं चुआ। महाराज! इस प्रकार का है घटिकार कुम्भकार।’ ‘भन्ते! घटिकार कुम्भकार को लाभ है, ॰ सुलाभ है, ॰ सु-लब्ध लाभ है, जिस पर भगवानृ का इतना अधिक विश्वास है।”

“तब आनन्द! काशिराज किकि ने घटिकार कुम्भकार के पास पाँच सौ गाडी पंडु-मुटिक, शाली का चावल, और उसके योग्य सूप की चीज भेजी। तब आनन्द! उन राज-पूरूषों ने घटिकार कुम्भकार के पास जाकर यह कहा—‘भन्ते! (=स्वामी)! यह पाँच सौ गाडी पंडु-मुटिक, शाली का चावल, और उसके योग्य सूप की चीजें आप के पास काशीराज किकि ने भेजी हैं, इन्हे भन्ते! स्वीकार करें।’ ‘राजा को बहुत कृत्य है, बहुत करणीय हैं; मेरे लिये जरूरत नहीं, राजा की ही (यह) हो।’

“शायद, आनन्द! तुझे ऐसा हो, वह जोतिपाल माणवक कोई और होगा। आनन्द! ऐसा नहीं ख्याल करना चाहिये; मैं ही उस समय जोतिपाल माणवक था।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् के भाषण को अभिनंदित किया।

Über diese Übersetzung

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Mögen alle Wesen glücklich sein