MN 110
Cūḷapuṇṇama sutta: चूल-पुण्णम-सुत्तन्त
Cūḷapuṇṇamasutta
Devadahavagga
Traduzioni
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में मृगारमाता के प्रासाद पूर्वाराम में विहार करते थे।
उस समय भगवान् उस दिन के उपोसथ की पंचदशी=पूर्णिमा की रात को भिक्षुसंघ से घिरे, खुली जगह में बैठे थे। तब भगवान् ने चुपचाप (बैठे) भिक्षु-संघ को देखकर, भिक्षुओं को संबोधित किया—
“भिक्षुओं! क्या अ-सत्पुरूष अ-सत्पुरूष को जान सकता है—‘यह आप अ-सत्पुरूष हैं’—?”
“नहीं, भन्ते!”
“साधु, भिक्षुओं! इसकी गुंजाइश (=अवकाश) नहीं, कि अ-सत्पुरूष अ-सत्पुरूष को जान सके—‘यह ॰’। भिक्षुओं! क्या अ-सत्पुरूष सत्पुरूष को जान सकता है—‘यह आप सत्पुरूष है’?”
“नहीं, भन्ते!”
“साधु, भिक्षुओं! इसकी गुंजाइश नहीं ॰। भिक्षुओं! अ-सत्पुरूष अ-सद्धर्म से युक्त है। अ-सत्पुरूषों का भक्त, अ-सत्पुरूष-चिन्ती, अ-सत्पुरूष-मन्त्री, अ-सत्पुरूष-भाषी, अ-सत्पुरूष-कर्मान्त (=॰ कामवाला), अ-सत्पुरूष-दृष्अि होता है, अ-सत्पुरूषों को दान देने वाला होता है। कैसे ॰ अ-सद्धर्म युक्त होता है?—भिक्षुओं! यहाँ अ-सत्पुरूष अ-श्रद्धालु, निर्लज्ज, संकोच रहित, अल्प-श्रुत (=अज्ञ), कुसीदी (=आलसी), भुषित-स्मृति (=बेहोश), दुष्प्रज्ञ…होता है। भिक्षुओं! इस प्रकार अ-सत्पुरूष अ-सद्धर्म से युक्त होता है।
“कैसे, भिक्षुओ! असत्पुरूष अ-सत्पुरूषों का भक्त होता है?—भिक्षुओं! अ-सत्पुरूष के मित्र=सहाय होते हैं, वह श्रमण-ब्राह्मण, जो कि अश्रद्धालु ॰ दुष्प्रज्ञ होते है।
“कैसे भिक्षुओं! ॰ अ-सत्पुरूषों-चिन्ती होता है?—भिक्षुओं! अ-सत्पुरूष आत्म-पीड़ा का भी चिन्तन करता है, पर-पीडा ॰, उभय-पीडा का भी चिंतन करता है। इस प्रकार ॰।
“॰ अ-सत्पुरूष-मन्त्री होता है?—भिक्षुओं! अ-सत्पुरूष आत्म-पीडा की भी मंत्रणा करता है, ॰ पर-पीडा ॰, उभय-पीडा ॰।
“कैसे ॰ अ-सत्पुरूष-वाची होता है?—भिक्षुओ! अ-सत्पुरूष मृषावादी (=झूठा) होता, चुगुलखोर, कटुभाषी, प्रलापी होता है। इस प्रकार ॰।
“कैसे ॰ अ-सत्पुरूष-कर्मान्त होता है?—भिक्षुओं! अ-सत्पुरूष हिंसक होता है, चोर, व्यभिचारी होता है। इस प्रकार ॰।
“कैसे ॰ अ-सत्पुरूष-दृष्टि होता है?—भिक्षुओ! अ-सत्पुरूष इस प्रकार की दृष्टि (=धारणा) वाला होता है—‘दान नहीं, यज्ञ नहीं ॰। इस प्रकार ॰।
“कैसे ॰ अ-सत्पुरूष-दान देता है?—भिक्षुओं! अ-सत्पुरूष अ-सत्कार-पूर्वक दान देता है, अपने हाथ से दान नहीं देता, बेख्याल किये दान देता है, निकृष्ट (द्रव्य का) दान देता है, (प्रतिफल के) न-लौटकर आने की दृष्टि से दान देता है। इस प्रकार ॰।
“भिक्षुओं! वह असत्पुरूष इस प्रकार अ-सद्धर्म से युक्त हो .॰। असत्पुरूषों को दान दे, काया छोड मरने के बाद जो अ-सत्पुरूषों की गति होती है, उसमें उत्पन्न होता है। भिक्षुओ! क्या है, अ-सत्पुरूषों की गति? नरक और तिर्यक् (=पशु) योनि।
“भिक्षुओं! क्या सत्पुरूष सत्पुरूष को जानेगा—‘यह आप सत्पुरूष है’?”
‘हाँ, भन्ते।”
“साधु, भिक्षुओं! इसकी गुंजाइश है, कि सत्पुरूष सत्पुरूष को जाने—॰। भिक्षुओं! क्या सत्पुरूष अ-सत्पुरूष को जानेगा—‘यह आप अ-सत्पुरूष हैः?”
“हाँ, भन्ते!”
“साधु, भिक्षुओं!” इसकी गुंजाइश है ॰।
“भिक्षुओं! सत्पुरूष सद्धर्म से युक्त होता है, सत्पुरूष-भक्त, सत्पुरूष-चिन्ती, सत्पुरूष-मंत्री, सत्पुरूष-वाची, सत्पुरूष-कर्मान्त, सत्पुरूष-दृष्टि होता है, सत्पुरूषों को दान देने वाला होता है।
“भिक्षुओं! कैसे सत्पुरूष सद्धर्म से युक्त होता है?—भिक्षुओं! सत्पुरूष श्रद्धालु, लज्जाशील, संकोची, बहुश्रुत आरब्धवीर्य (=उद्योगी), उपस्थित-स्मृति (=बाहोश) प्रज्ञावान् होता है। इस प्रकार भिक्षुओं! सत्पुरूष सद्धर्म से युक्त होता है।
‘कैसे ॰ सत्पुरूष-भक्त ॰?—सत्पुरूष के मित्र=सहाय होते हैं, यह श्रमण-ब्राह्मण, जो कि श्रद्धालु ॰ प्रज्ञावान् होते हैं। इस प्रकार ॰।
“कैसे ॰ सत्पुरूष-चिन्ती ॰?—॰ न आत्म-पीडा का चिंतन करता है, न पर-पीडा का ॰, न उभय पीडा का ॰।
“कैसे ॰ सत्पुरूष-मंत्री ॰?—॰ न आत्म-पीडा का चिंतन करता है, न पर-पीडा का ॰, न उभय पीडा का ॰।
“कैसे ॰ सत्पुरूष वाची ॰?—॰ झूठ से विरत होता है, चुगली से ॰, कठोर वचन से ॰, वकवाद से विरत होता है। इस प्रकार ॰।
“कैसे ॰ सत्पुरूष कर्मान्त ॰?—॰ हिंसा से विरत होता है, चोरी से ॰, व्यभिचार से विरत होता है। इस प्रकार ॰।
“कैसे ॰ सत्पुरूष दृष्टि ॰?—॰ दान है, यज्ञ है ॰। इस प्रकार ॰।
“कैसे ॰ सत्पुरूष दान देता है?—॰ सत्कार-पूर्वक दान देता है, अपने हाथ से देता है, ख्याल करके देता है, परिशुद्ध (वस्तु का) दान देता है। (फल के) लौट कर आने की दृष्टि से दान देता है। इस प्रकार ॰।
“भिक्षुओं! सत्पुरूष इस प्रकार सद्धर्म से युक्त हो। ॰। सत्पुरूषों को दान दे, काया छोड़ मरने के बाद, जो सत्पुरूषों की गति होती है, उसमें उत्पन्न होता है। भिक्षुओं! क्या है, सत्पुरूषों की गति? देवताओं का महत्व और मनुष्यों का महा महत्व।”
भवागन् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।
Su questa traduzione
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Che tutti gli esseri siano felici