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MN 134

Lomasakaṅgiyabhaddekaratta sutta: लोमसकंगिय-भद्देकरत्त-सुत्तन्त

Lomasakaṅgiyabhaddekarattasutta

Vibhaṅgavagga

Traduzioni

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

उस समय आयुष्मान् लोमसकंगिय (=लोमसक-अंगिक) शाक्य (=देश) में, कपिलवस्तु के न्यग्रोधाराम में विहार करते थे। तब प्रकाशयुक्त रात्रि में, सारे न्यग्रोधाराम को प्रकाशित करता, प्रकाशमान वर्णवाला चन्दन देवपुत्र जहाँ आयुष्मान् लोमसकंगिय थे, वहाँ गया। जाकर एक ओर खडा हो हुआ। एक ओर खडे चन्दन देवपुत्र ने आयुष्मान् लोमसकंगित से यह कहा—

“भिक्षु! भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग तुम्हे याद हैं?”

“नहीं, आवुस ॰। क्या, आवुस! तुमको याद हैं ॰?”

“मुझे भी, भिक्षु! याद नहीं हैं ॰। क्या तुम्हे, भिक्षु! भद्दकरत्त की गाथायें याद है?”

“नहीं, आवुस! मुझे याद (नहीं) हैं ॰। क्या, आवुस! तुमको याद हैं ॰?”

“हाँ, भिक्षु! मुझे भद्देकरत्त की गाथाये याद हैं।”

“कैसे, आवुस! तुमने भद्देकरत्त की गाथायें याद कीं?”

“भिक्षु! एक समय भगवान् त्रयस्त्रिंश देव (लोक) में पारिछत्रक (वृक्ष) के नीचे पांडुकम्बल (=लाल दुशाले नाम की)-शिला पर विहार करते थे। वहाँ भगवान् ने त्रायस्त्रिंश देवों को भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग करहे—‘अतीत का ॰ भद्देकरत्त कहते हैं”। भिक्षु! इस प्रकार मैंने भद्देकरत्त की गाथाओं को याद किया। भिक्षु! भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग को सीखों ॰ आदि-ब्रह्मचर्यक हैं।”

चन्दन देवपुत्र यह कह कर वहीं अंतर्धान हो गया।

तब आयुष्मान् लोमसकंगिय उस रात के बीतरने पर, शयन-आसन सँभाल, पात्र-चीवर ले, जिधर श्रावस्ती है, उधर चारिका के लिये चल पडे। क्रमशः चारिका करते, जहाँ श्रावस्ती थी, जहाँ अनाथपिंडिक का आराम जेतवन था, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् लोमसकंगिय ने भगवान् ये यह कहा—

“भन्ते! एक समय मैं शाक्य (देश) में कपिलवस्ते के न्यग्रोधाराम में विहार करता था। तब ॰ कोई देवपुत्र जहाँ मैं था वहाँ आया। आकर एक ओर खडा हुआ ॰ मुझे यह बोला—‘भिक्षु! भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग तुम्हें याद हैं? ॰ भिक्षु! भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग को सीखो ॰ आदि-ब्रह्मचर्यक है।’ ॰ भन्ते! उस देवपुत्र ने यह कहा, यह कहकर वहीं अन्तर्धान हो गया। अच्छा हो, भन्ते! भगवान् मुझे भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग का उपदेश करें।”

“क्या तू, भिक्षु! उस देवपुत्र को जानता है?”

“नहीं, भन्ते! मैं उस देवपुत्र को (नहीं) जानता।”

“भिक्षु! वह चन्दन नामक देवपुत्र हैं। भिक्षु! चन्दन देवपुत्र मन लगा कर सबको चित्त से समन्वाहरण (=ठीक) कर, कान लगा धर्म को सुनता है। तो, भिक्षु! सुन अच्छी तरह मन में कर, कहता हूँ।”

“अच्छा! भन्ते!”—(कह) आयुष्मान् लोमसकंगिय ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—

“अतीत का ॰ भद्देकरत्त कहते हैं’।

“कैसे, भिक्षु! अतीत का अनुगमन करता है?—॰ इस प्रकार, भिक्षु! प्रत्युत्पन्न धर्म में आसक्त नहीं होता।—‘अतीत का ॰ भद्देकरत्त कहते हैं।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् लोमसकंगिय ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Che tutti gli esseri siano felici