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MN 60

Apaṇṇaka sutta: अपण्णक-सुत्तन्त

Apaṇṇakasutta

Gahapativagga

Traduzioni

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् महान् भिक्षु-संघ के साथ कोसल (देश) में चारिका (= विचरण) करते, जहाँ शाला (= साला) नाम के कोसलों का ब्राह्मण-ग्राम था, वहाँ पहुँचे।

शाला के ब्राह्मण-गृहपतियों ने सुना—शाक्य कुल से प्रब्रजित ॰ एक ओर बैठे शाला के ब्राह्म-गृहपतियों से भगवान् ने यह कहा—

“गृहपतियों! क्या कोई तुम्हारा (ऐसा) मनाप (= मन को तुष्ट करने वाला) शास्ता (= उपदेशक) है जिसमें तुम्हे सहेतुक श्रद्धा हुई हो?”

“नहीं, भन्ते! कोई हमारा ऐसा मनाप शास्ता (नहीं) जिसमें हमारी सहेतुक श्रद्धा हुई हो।”

“गृहपतियों! मनाप शास्ता न मिलने पर तुम्हे इस अपर्णक (= अपण्णक) धर्म को ग्रहण कर रहना चाहिये। गृहपतियों! (वह) अपर्णक (= द्विविधा-रहित) धर्म क्या है?—गृहपतियों! (1) कोई कोई श्रमण-ब्राह्मण इस वाद वाले=इस दृष्टिवाले होते है—‘नहीं है दान (का फल), नहीं है यज्ञ (का फल), नहीं है हवन (का फल), नहीं है सुकृत दुष्कृत कर्मांे का फल=विपाक; यह लोक नहीं है, परलोक नहीं है; माता नहीं पिता नहीं; औपपातिक (= अयोनिज देव आदि) प्राणी नहीं हैं। लोक में (ऐसे) सत्य को प्राप्त, सत्यारूढ़ श्रमण ब्राह्मण नहीं है, जो कि इस लोक परलोक को स्वयं जानकर साक्षात्कार कर, (दूसरों को) जतलावेंगे।’ (2) गृहपतियो! उन्हीं श्रमण ब्राह्मणों के विरूद्ध (= ऋजु-प्रत्यनीक) वाद वाले दूसरे यह कहते हैं—है दान, है यज्ञ, है हवन, है सुकृत दुष्कृत कर्मो का फल=विपाक; है यह लोक, है परलोक, है माता, है पिता, है औपपातिक प्राणी; हैं लोक में सत्य को प्राप्त कर, सत्यारूढ श्रमण ब्राह्मण, जो कि इस लोक परलोक को ंस्वयं जानकर साक्षात्कार कर जतलाते हैं।’ तो क्या मानते हो, गृहपतियो! यह श्रमण ब्राह्मण एक दूसरे के विरोधी वाद वाले हैं न?”

“हाँ, भन्ते!”

(1) “वहाँ, गृहपतियों! जो श्रमण ब्राह्मण इस वाद वाले ॰ हैं—‘नहीं है दान ॰ साक्षात्कार जतलावेंगे’; उनसे यह आशा रखनी चाहिये—कि वह काय-सुचरित (= कायिक सुकर्म), वाचिक सुचरित, मनः-सुचरित इन तीनों कुशल-धर्मो (= सुकर्मो) को त्याग कर, काय-दुश्चरित (= कायिक दुष्कर्म), वचन-दुश्चरित, मनो-दुश्चरित इन तीनों अकुशल-धर्मो को ग्रहण करेंगे। सो किस हेतु?—क्योंकि वह आप श्रमण ब्राह्मण अकुशल धर्मों में दोष (= आदिनव), अपकार, संक्लेश (= पाप, मल) नहीं देखते, और कुशल धर्मो में, निष्कामता में, गुण (= आनृशंस्य) शुद्धता (= व्यवदानपक्ष) नहीं देखते। परलोक के होते भी—‘परलोक नहीं है’ यह उनकी दृष्टि (= सिद्धान्त) होती है, यह उनकी मिथ्या-दृष्टि है। परलोक के होते हुये—‘परलोक नहीं है’ यह वह संकल्प (= कल्पना) करते हैं, यह उनके मिथ्या-संकल्प हैं। ॰ ‘परलोक नहीं है’—यह वह वचन बोलते हैं, यह उनका मिथ्या-वाक् है। परलोक के होते हुये, —‘परलोक नहीं है’, और यह परलोक वेदी अर्हतों के (कथन के) विरूद्ध है। ॰—‘परलोक नहीं है’—यह दूसरों को समझाते हैं, यह उनका अ-सद्धर्म-संज्ञापन है। इस अ-सद्धर्म-संज्ञापन से वह अपना उत्कर्ष चाहते हैं, और दूसरों को निन्दते हैं इस प्रकार पहिले उनकी सुशीलता नष्ट हो गई रहती है, और दुःशीलता उपस्थित रहती है, मिथ्या-दृष्टि, मिथ्या-संकल्प, मिथ्या-वाफ्, आर्यो का विरोध, असद्धर्म-संज्ञापन, आत्मोकर्ष, पर-वम्भण (= दूसरों को निन्दना) यह अनेक पाप=अकुशल धर्म (= बुराइयाँ) होते हैं, मिथ्या दृष्टि के कारण।

“गृहपतियों! यहाँ विज्ञ पुरूष सोचता है—यदि ‘परलोक नहीं हैं’, तो इस प्रकार यह आप पुरूष=पुद्गल काया छोड मरने के बाद अपनी स्वस्ति (= कल्याण, सुरक्षा) करेगा; यदि परलोक है, तो यह पुरूष=पुद्गल काया छोड मरने के बाद अपाय=दुर्गति, विनिपात (= पतन), नरक में उत्पन्न होगा। चाहे परलोक न भी हो, चाहे इन आप श्रमण ब्राह्मणों का वचन सत्य भी हो, तो भी तो यह पुरूष=पुद्गल इसी जन्म में विज्ञो द्वारा निन्दित है—‘यह पुरूष=पुद्गल दुःशील, मिथ्या-दृष्टि, नास्तिकवादी है’। यदि परलोक है, तब तो इस आप पुरूष=पुद्गल की दोनों ओर से कलिग्रह है—इस जन्म में भी विज्ञों द्वारा निन्दा, और काया छोड मरने के बाद अपाय=दुर्गति, विनिपात, नरक में उत्पन्न होना। इस प्रकार इनके इस अपर्णक धर्म के दुराग्रह से, ग्रहण से एक ओर पूर्ण होना कुशल स्थान से वंचित होना है।

(2) “वहाँ गृहपतियो! जो श्रमण ब्राह्मण इस वाद वाले=इस दृष्टि वाले हैं—‘है दान ॰।’ उनके सम्बन्ध में यह आशा करती चाहिये, कि वह ॰ काय-दुश्चरित, वचन-दुश्चरित, मनो-दुश्चरित इन तीनो अकुशल-धर्मो को छोडकर, ॰ काय-सुचरित, वचन-सुचरित, मनः-सुचरित इन तीनों कुशल धर्मो को ग्रहण करेंगे। सो किस हेतु?—क्योंकि वह आप श्रमण ब्राह्मण अकुशल धर्मो में दोष ॰ को देखते हैं; और कुशल धर्मो में निष्कामता में गुण, शुद्धता देखते है। परलोक के सद्भाव में—‘परलोक है’ यह उनकी दृष्टि होती है, यह उनकी सम्यग्-संकल्प है। ॰ ‘परलोक है’ यह वह वचन कहते है, (और) यह उनका सम्यग्-वाक् है। ॰ ‘परलोक है’, यह दूसरे को संज्ञापन (= समझाना) करते हैं, यह उनका सद्धर्म-संज्ञापन है; इस सद्धर्म-संज्ञापन द्वारा न वह अपना उत्कर्ष (= आत्मोत्कर्ष) चाहते है, न दूसरे को निन्दते (= परवम्भन) हैं। इस प्रकार पहिले ही उनकी दुःशीलता नष्ट हो गई रहती है, और सुशीलता उपस्थित रहती है, और वह सम्यग्-दृष्टि, सम्यक्-संकल्प, सम्यग्-वाक् आर्य-अप्रत्यनीकता, सद्धर्म-संज्ञापन, न-आत्मोत्कर्षण, न-पर-वम्भन से युक्त होता है। यह अनेक कुशल-धर्म होते है, सम्यग्-दृष्टि के कारण।

“गृहपतियों! वहाँ विज्ञ पुरूष यह सोचता है—यदि परलोक है, तो यह आप पुरूष-पुद्गल काया छोड मरने के बाद ॰ स्वर्गलोक में उत्पन्न होंगे। चाहे परलोक मत हो, और इन श्रमण-ब्राह्मणों का वचन सच हो; तो भी तो यह आप पुरूष=पुद्गल इसी जन्म में विज्ञों द्वारा प्रशंसित हैं—यह पुरूष=पुद्गल शीलवान्, सम्यग्-दृष्टि, आस्तिकवादी हैं। यदि परलोक है, तब तो इस आप पुरूष=पुद्गल को दोनों ओर लाभ है—इस जन्म में विज्ञों द्वारा प्रशंसा, और काया छोड मरने के बाद सुगति, स्वर्गलोक में उत्पन्न होना। इस प्रकार इनके इस अपर्णक (= द्विविधा-रहित) धर्म के सुग्रहण=समादान से दोनों ओर पूर्ण होना है, अकुशल स्थान से ही वंचित होना है।

(3) “गृहपतियों! कोई कोई श्रमण ब्राह्मण इस वादवाले=इस दृष्टि वाले होते हैं—‘(पाप) करते-करवाते, काटते-कटवाते, पकाते-पकवाते, शोक कराते, परेशानी कराते, मथते-मथाते, प्राण मारते, चोरी करते, सेंध लगाते, गाँव लूटते, घर लूटते, रहजनी करते, पर-स्त्री गमन करते, झूठ बोलते भी पाप नहीं किया जाता। छूरे से (या) तेज चक्र-द्वारा यदि कोई इस पृथिवी के प्राणियों (को मार कर) माँस का एक खलियान, मांस का एक पुंज बना दे; तो इसके कारण उसे पाप नहीं होगा, पाप का आगम नहीं होगा। यदि घात करते-कराते, काटते-कटवाते, पकाते-पकवाते, (इधर से) गंगा के दाहिने तीर पर भी जाये; तो भी इसके कारण उसको पाप नहीं, पाप का आगम नहीं होगा। दान देते-दिलाते, यज्ञ करते-कराते, (दक्षिण से) गंगा के उत्तर तीर भी जाये, तो (भी) इसके कारण उसको पुण्य नहीं, पुण्य का आगम नहीं होगा। दान, दम (= इन्द्रिय-निग्रह) संयम, सत्य भाषण से पुण्य नहीं, पुण्य का आगम नहीं (होता)।’

(4) “गृहपतियो! इन्हीं श्रमण-ब्राह्मणों के विरूद्ध वादवाले दूसरे यह कहते हैं—‘(पाप) करते करवाते ॰ झूठ बोलते पाप होता है। ॰ मांस का एक पुंज बना दे, तो इसके कारण उसे पाप होगा, पाप का आगम होगा। ॰ गंगा के दाहिने तीन पर जाये, तो इसके कारण उसको पाप होगा ॰। दान देते-दिलाते ॰ उसको पुण्य होगा ॰। दान, दम, संयम, सत्यभाषण से पुण्य होता है, पुण्य का आगम होता है’। तो क्या मानते हो, गृहपतियों! यह श्रमण-ब्राह्मण एक दूसरें के विरोधी वादवाले हैं न?”

“हाँ, भन्ते!”

(5) “गृहपतियो! वहाँ जो श्रमण-ब्राह्मण इस वाद वाले हैं—‘(पाप) करते करवाते ॰ सत्यभाषण से पुण्य नहीं, पुण्य का आगम नहीं’; उनसे यह आशा रखनी चाहिये—कि वह कायिक सुचरित ॰ को त्याग कर, ॰ अकुशल-धर्मों को ग्रहण करेंगे। सो किस हेतु?—क्योंकि वह आप श्रमण ब्राह्मण ॰ नहीं देखते। क्रिया (= कर्म) के होते भी—‘क्रिया नहीं है’ यह उनकी दृष्टि होती है; यह उनकी मिथ्या-दृष्टि है ॰ यह अनेक पाप=अकुशल धर्म होते हैं मिथ्या दृष्टि के कारण।

“गृहपतियो! वहाँ विज्ञ पुरूष यह सोचता है—‘यदि क्रिया नहीं है ॰ कुशल स्थान (= भले काम) से वंचित होता है।’

(6) “गृहपतियों! वहाँ जो श्रमण-ब्राह्मण इस वादवाले=इस दृष्टि वाले हैं—‘करते-करवाते ॰ पुण्य का आगम होता है’, उनके सम्बंध में यह आशा करती चाहिये—‘ ॰ कुशल-धर्मो को ग्रहा करेंगे। सो किस हेतु? ॰ ‘क्रिया है’—यह उनकी दृष्टि होती हैं, यह उनकी सम्यग्-दृष्टि है॰ यह अनेक कुशल-धर्म होते हैं, सम्यग्-दृष्टि के कारण।

“गृहपतियों! वहाँ विज्ञ पुरूष यह सोचता है—‘यदि क्रिया है’ ॰ अकुशल स्थान से ही वंचित होता है।

(7) “गृहपतियो! कोई कोई श्रमण-ब्राह्मण इस वाद वाले=इस दृष्टि वाले होते है—‘सत्वों (= प्राणियों) के संक्लेश (= चित्त की मलिनता) का कोई हेतु नहीं=कोई प्रत्यय नहीं; बिना हेतु, बिना प्रत्यय के प्राणी संक्लेश को प्राप्त होते है। प्राणियों की (चित्त) विशुद्धि का कोई हेतु=प्रत्यय नहीं; बिना हेतु=प्रत्यय प्राणी विशुद्धि को प्राप्त होते है। बल नहीं (चाहिये), वीर्य नहीं, पुरूष का स्थाम (= दृढ़ता) नहीं, पुरूष-पराक्रम नहीं (चाहिये), सभी सत्व=प्राणी=भूत=जीव, अ-वश=अ-बल=अ-वीर्य (हो) नियति (= भवितव्यता) के वश में हो, छःओं अभिजातियों (= जन्मों) में सुख दुःख अनुभव करते हैं।’

(8) इन्हीं श्रमण-ब्राह्मणों के विरूद्ध वाद वाले दूसरे यह कहते हैं—‘है हेतु सत्वों के संक्लेश का, है प्रत्यय; हेतु से, प्रत्यय से प्राणी संक्लेश को प्राप्त होते है। है हेतु, है प्रत्यय प्राणियों की विशुद्धि का; हेतु से=प्रत्यय से प्राणी विशुद्धि को प्राप्त होते हैं; हैं (उपयोगी) बल, वीर्य, पुरूष का स्थाम, पुरूष-पराक्रम; और नहीं सभी सत्व ॰ अवश, अ-बल, अ-वीर्य नियति के वश में हो छःओं अभिजातियों में सुख दुःख अनुभव करते हैं।’ तो क्या मानते हो, गृहपतियों! यह श्रमण ब्राह्मण एक दूसरे के विरोधी वादवाले हैं न?”

“हाँ, भन्ते!”

(9) “वहाँ, गृहपतियों! जो श्रमण ब्राह्मण इस वाद वाले हैं—‘सत्वों के संक्लेश कोई हेतु नहीं ॰ छःओं अभिजातियों में सुख-दुःख अनुभव करते हैं’ उनसे यही आशा करनी चाहिये, कि वह ॰ अकुशल धर्मो को ग्रहण करेंगे। सो किस हेतु?—॰ ‘हेतु नहीं है’, यह उनकी दृष्टि होती है; यह उनकी मिथ्या-दृष्टि है ॰। यह अनेक पाप=अकुशल धर्म होते हैं, मिथ्या-दृष्टि के कारण।

“गृहपतियों! यहाँ विज्ञ पुरूष यह सोचता है—‘यदि हेतु नहीं है ॰ कुशल स्थान से वंचित होता है।

(10) “वहात्र गृहपतियों! जो श्रमण ब्राह्मण इस वादवाले हैं—‘है हेतु सत्वों के संक्लेश का ॰ नहीं छःओ अभिजातियों में सुख दुःख अनुभव करते’; उनसे यह आशा करनी चाहिये, कि वह ॰ कुशल-धर्मो को ग्रहण करेंगे। सो किस हेतु?—॰ ‘है हेतु’ यह उनकी दृष्टि होती है; (और) यह उनकी सम्यग्-दृष्टि है ॰ यह अनेक कुशल धर्म होते हैं, सम्यग्-दृष्टि के कारण।

“गृहपतियो! यहाँ विज्ञ पुरूष यह सोचता है—‘यदि हेतु है ॰ अकुशल स्थान से ही वंचित होता है।

(11) “गृहपतियो! कोई कोई श्रमण ब्राह्मणों के विरूद्ध इस वादवाले=इस दृष्टि वाले होते हैं—‘आरूप्य (= रूप-रहित देवताओं के लोक) सर्वथा नहीं है’।

(12) गृहपतियो! उन्हीं श्रमण-ब्राह्मणों के विरूद्ध वादवाले दूसरे कहते हैं—‘आरूप्रू सर्वथा हैं’। तो क्या मानते हो, गृहपतियो! यह श्रमण ब्राह्मण एक दूसरे के विरोधी वादवाले हैं न?”

“हाँ, भन्ते!”

“वहाँ गृहपतियो! विज्ञ पुरूष यह सोचता है—जो श्रमण-ब्राह्मण इस वाद वाले ॰ हैं—‘आरूप्य सर्वथा नहीं है’, यह मेरा देखा नहीं है। और जो वह श्रमण ब्राह्मण इस वादवाले ॰ हें—‘आरूप्य सर्वथा है’, यह मुझे ज्ञात नहीं। यदि मैं बिना जानते, बिना देखते, एकतरफा कहने लगूँ—‘यही सच है, और झूठ है’ तो यह मेरे योग्य नहीं। जो आप श्रमण ब्राह्मण इस वाद वाले ॰ हैं—‘आरूप्य सर्वथा नहीं है’, यदि उन…का यह वचन सच है, तो हो सकता है, कि जो वह देवता रूपमान् मनोमय हैं, उनमें मेरी अपर्णक (= द्विविधारहित) उत्पत्ति हो। और जो आप श्रमण-ब्राह्मण इस वादवाले ॰ हैं—‘आरूप्य सर्वथा हैं’, यदि उन…का यह वचन सच है, तो हो सकता हैं, कि जो वह देवता रूप-रहित संज्ञामय हैं, उनमें मेरी अपर्णक उत्पत्ति हो। भो! रूप के कारण (लडने के लिये) दंड-प्रहण, शस्त्र-ग्रहण, कलह, विग्रह, विवाद, तूँ सूँ (मैं मैं), चुगली, मृषावाद देखा जाता है, किन्तु आरूप्रू (लोक) में यह नहीं है; यह सोच यह रूपों से निर्वेद=वैराग्य, निरोध के लिये तत्पर होगा ।

(13) “गृहपतियो! कोई कोई श्रमण-ब्राह्मण इस वादवाले ॰ होते हैं—‘भव-निरोध (= जन्म मरण का अन्त) सर्वथा नहीं होता’।

(14) गृहपतियो! उन्हीं श्रमण-ब्राह्मणों के विरूद्ध वादवाले दूसरे कहते हैं—‘भव-निरोध सर्वथा (= अवश्य) होता है’। तो क्या मानते हो, गृहपतियो! यह श्रमण ब्राह्मण एक दूसरे के विरोधी वादवाले हैं न?”

“हाँ, भन्ते!”

“वहाँ, गृहपतियों! विज्ञ पुरूष यह सोचता है—॰—‘भव-निरोध सर्वथा नहीं होता’—यह मेरा देखा नहीं है। ॰—‘भव-निरोध सर्वथा होता है’—यह मुझे ज्ञात नहीं ॰। ॰—‘भव-निरोध सर्वथा नहीं होता’—यदि यह…वचन सच है, तो हो सकता है, कि जो वह देवता रूप-रहित संज्ञा-मय (संज्ञा=होश ही जिनका शरीर है) है उनमें मेरी अपर्णक उत्पत्ति होवे। ॰—‘भव-निरोध सर्वथा होता है’—यदि वह…वचन सच है, तो हो सकता है, कि मैं इसी जन्म में परिनिर्वाण को प्राप्त हो जाऊँ। जो वह श्रमण ब्राह्मण इस वादवाले ॰ हैं—‘भव-निरोध सर्वथा नहीं होता’, उनकी यह दृष्टि सरागता के पास (ले जाने वाली है), संयोग, अभिनंदन (= लिप्सा), अध्यवसान=उपादान (= ग्रहण) के पास (ले जाने वाली है)। किन्तु जो आप श्रमण ब्राह्मण इस वादवाले ॰ हैं—‘भव-निरोध सर्वथा होता है’, उनकी यह दृष्टि अ-सरागता (= वैराग्य), अ-संयोग, अन्-अभिनन्दन, अन्-अध्यावसान, अन्-उपादान के पास (ले जाने वाली है)। वह यह सोच भवो (= जन्ममरणों) के ही निर्वेद=वैराग्य, निरोध के लिये तत्पर होता है।

“गृहपतियो! लोक में यह चार (प्रकार के) पुरूष (= पुद्गल) होते है। कौन से चार? ॰ ब्रह्मभूत आत्मा से विहरता है।

“गृहपतियों! कौनसा पुद्गल आत्मंतप=अपने को संताप देने वाले कामों में लग्न है?—॰। ॰ परंतप ॰ । ॰ आत्मंतप-परंतप ॰। ॰ अन्-आत्मंतप-अ-परंतप ॰।

“सो वह इस प्रकार चित्त के एकाग्र, परिशुद्ध ॰ अब यहाँ करने के लिये कुछ नहीं है— .यह जान लेता है। गृहपतियो! यह कहा जाता है अन्-आत्मंतप-अ-परंतप, ॰ पुद्गल ॰। ब्रह्मभूत आत्मा से विहरता है।”

ऐसा कहने पर शाला-निवासी ब्राह्मण गृहस्थों ने भगवान् से यह कहा—

“आश्चर्य भो गौतम! अद्भूत भो गौतम! जैसे औंधे को सीधा कर ॰! आज से आप हमें अंजलिबद्ध शरणागत उपासक स्वीकार करें।”

6—इति गहपति वग्ग 2।1

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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Che tutti gli esseri siano felici