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MN 85

Bodhirājakumāra sutta: बोधि-राजकुमार-सुत्तन्त

Bodhirājakumārasutta

Rājavagga

Traduzioni

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् भर्ग (जनपद) में सुंसुमारगिरि के भेसकला-वन, मृगदाव में विहार करते थे । उस समय बोधि-राजकुमार ने श्रमण या ब्राह्मण या किसी भी मनुष्य से न भोगे कोकनद नामक प्रासाद में हाल ही में बनवाया था। तब बोधि-राजकुमार ने संजिका-पुत्र माणवक को संबोधित किया—

“आओ तुम सौम्य! संजिका-पुत्र! जहाँ भगवान् हैं, वहाँ जाओ। जाकर मेरे वचन से, भगवान् के चरणों में शिर से वन्दनाकर, आरोग्य, अन्-आतंक, लघु-उत्थान (=शरीर की कार्य-क्षमता) बल, अनुकूल विहार, पूछो—‘भन्ते! बोधि-राजकुमार भगवान् के चरणों में शिर से वन्दना कर आरोग्य ॰ पूछता है’। और यह भी कहो—‘भन्ते! भिक्षु-संघ सहित भगवान्, बोधि-राजकुमासर का कल का भोजन स्वीकार करं।’”

“‘अच्छा हो (=भो)’ कह संजिका-पुत्र माणवक जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान् से…(कुशल प्रश्न)…पूछ, एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर संजिका-पुत्र माणवक ने भगवान् से कहा—‘भो गौतम! बोधि-राजकुमार आपके चरणों में ॰। ॰ बोधिराज-कुमार का कल का भोजन स्वीकार करें।”

भगवान् मौन द्वारा स्वीकार किया। तब संजिका-पुत्र माणवक भगवान् की स्वीकृति जान, आसन से उठ जहाँ बोधि-राजकुमार था, वहाँ गया। जाकर बोधि-राजकुमार से बोला—

“आपके वचन से मैंने उन गौतम से कहा—‘भो गौतम! बोधि-राजकुमार ॰। श्रमण गौतम ने स्वीकार किया।”

तब बोधि-राजकुमार ने उस रात के बीतने पर अपने घर में उत्तम खादनीय-भोजनीय (पदार्थ) तैयार करवा, कोकनद-प्रासाद को सफेद (=अवदात) धुस्सों से सीढी के नीचे तक बिछवा, संजिका-पुत्र माणवक को संबोधित किया—

“आओ सौम्य! संजिका-पुत्र! जहाँ भगवान् है, वहाँ जाकर भगवान् से काल कहो—‘भन्ते! काल है, भात (=भोजन) तैयार हो गया।”

“अच्छा भो!”…काल कहा…।

तब भगवान् पूर्वाह्न समय पहिन कर पात्र चीवर ले, जहाँ बोधि-राजकुमार का घर (=निवेसन) था, वहाँ गये। उस समय बोधि-राजकुमार भगवान् की प्रतीक्षा करता हुआ, द्वार-कोष्ठक (=नौबतखाना) के बाहर खड़ा था। बोधि-राजकुमार दूर से भगवान् को आते देखा। देखते ही अगवानी कर भगवान् की वन्दना कर, आगे आगे करके जहाँ कोकनद-प्रासाद था, वहाँ ले गया। तब भगवान् निचली सीढी के पास खडे हो गये। बोधि-राजकुमार ने भगवान् से कहा—“भन्ते! भगवान् धुस्सों पर चलें। सुगत! धुस्सों पर चली, ताकि (यह) चिरकाल तक मेरे हित और सुख के लिये हो।”

ऐसा कहने पर भगवान् चुप रहे।

दूसरी बार भी बोधि-राजकुमार ने ॰। तीसरी बार भी ॰।

तब भगवान् ने आयुष्मान् आनन्द की ओर देखा। आयुष्मान् आनन्द ने बोधि-राजकुमार से कहा—“राजकुमार! धुस्सों को समेट लो। भगवान् पांवडे (=चैल-पंक्ति) पर न चढेंगे। तथागत आने वाली जनता का ख्याल कर रहे है।”

बोधि-राजकुमार ने धुस्सों को समेटवा कर, कोकनद-प्रासाद के ऊपर आसन बिछवाये। भगवान् कोकनद-प्रासाद पर चढ, संघ के साथ बिछे आसन पर बैठे। तब बोधि-राजकुमार ने बुद्धप्रमुख भिक्षु संघ को अपने हाथ से उत्तम खादनीय भोजनीय (पदार्थों) से संतर्पित किया, संतुष्ट किया। भगवान् के भोजन कर पात्र से हाथ खींच लेने पर, बोधि-राजकुमार एक नीचा आसन ले, एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुये बोधि-राजकुमार ने भगवान् से कहा—

“भन्ते! मुझे ऐसा होता है, कि सुख में सुख प्राप्य नहीं, दुःख में सुख प्राप्त है।”

“राजकुमार! बोधि से पहिले=बुद्ध न हो बोधि-सत्व होते समय, मुझे भी यही होता था—‘सुख में सुख प्राप्य नहीं है, दुःख में सुख प्राप्य है।’ इसलिये राजकुमार! मैं उस समय दहर (=नव-वयस्क) ही, बहुत काले काले केशवाला सुन्दर (भद्र) यौवन के साथ ही, प्रथम वयस में, माता-पिता के अश्रुमुख होते, घर से बेघर हो प्रब्रजित हुआ। इस प्रकार प्रब्रजित हो, जहाँ आलार-कालाम था, वहाँ गया। जाकर आलार-कालाम से कहा—‘आवुस कालाम! इस धर्मविनय में मैं ब्रह्मचर्य-वास करना चाहता हूँ।’ ऐसा कहने पर राजकुमार! आलार-कालाम ने मुझे कहा—‘विहरो आयुष्मान्! यह ऐसा धर्म है, जसमे विज्ञ (=जानकार) पुरूष जल्द ही अपने आचार्यत्व को स्वयं जान कर=साक्षात् कर=प्राप्त कर विहार करेगा।’ सो मैंने जल्द ही=क्षिप्र ही उस धर्म (=बात) को पूरा कर लिया। तब मैं उतने ही ओठ-छुये मात्र=कहने कहाने मात्र से, ज्ञानवाद और स्थविरवाद (=वृद्धों का सिद्धान्त) कहने लगा—‘मैं जानता हूँ, देखता हूँ…’। तब मेरे मन में ऐसा हुआ — आलार-कालाम ‘इस धर्म को केवल श्रद्धा से स्वयं जानकर=साक्षात् कर=प्राप्त कर, मैं विहरता हूँ’ यह मुझे नहीं बतलाया। जरूर आलार-कालाम इस धर्म को जानता देखता विहरता होगा। तब मैं जहाँ आलार-कालाम था, वहाँ गया। जाकर आलार-कालाम से पूछा—‘आवुस कालाम! तुम इस धर्म को स्वयं जान कर=साक्षात् कर=प्राप्त कर (=उपसंपद्य) कहाँ पर्यन्त बतलाते हो?’ ऐसा कहने पर राजकुमार! आलार-कालाम ने ‘आकिंचन्यायतन’ बतलाया।

तब मुझे ऐसा हुआ—‘आलार-कालाम ही के पास श्रद्धा नहीं है, मेरे पास भी श्रद्धा है। आलार-कलाम ही के पास वीर्य नहीं ॰। ॰ स्मृति ॰। ॰ समाधि ॰। ॰ प्रज्ञा ॰.। क्यों न, जिस धर्म को आलार-कालाम—‘स्वयं जान कर=साक्षात् कर=प्राप्त कर विहरता हूँ’ कहता है; उस धर्म को साक्षात्कार करने के लिये मैं भी उद्योग करूँ। सो मैं बिना देर किये=क्षिप्र ही उस धर्म को स्वयं जान कर=साक्षात् कर=प्राप्त कर विहरने लगा। तब मैंने राजकुमार!…आलार-कालाम से कहा—‘आवुसा कालाम! तुम इतना ही इस धर्म को स्वयं जान कर ॰ हम लोगों को बतलाते हो?’—‘आवुस! मे। इतना ही इस धर्म को स्वयं जान कर ॰ बतलाता हूँ।’ आवुस! इतना तो ‘मैं भी इस धर्म को स्वयं जान कर ॰ विहरता हूँ।’ आवुस! हमें लाभ! हमें सुलाभ मिला, जो हम आयुष्मान् जैसे स-ब्रह्मचारी (=गुरू-भाई) को देखते हैं।…मैं जिस धर्म को स्वयं जान कर ॰ बतलाता (=उपदेश करता) हूँ; तुम भी उसी धर्म को स्वयं जान ॰ विहरते हो, तुम जिस धर्म को स्वयं ॰; मैं भी उसी धर्म को ॰। इस प्रकार मैं जिस धर्म को जानता हूँ उस धर्म को तुम जानते हो। जिस धर्म को तुम जानते हो, उस धर्म को मैं जानता हूँ। इस प्रकार जैसे तुम, वैसा मैं; जैसा मैं, वैसे तुम हो। आवुस! आओ अब दोनों ही इस गण (=जमात) को धारण करें।’ इस तरह मेरा आचार्य होते हुये भी, आलार-कालाम ने मुझ अन्तेवासी (=शिष्य) को अपने बराबर के स्थान पर स्थापित किया; पडे़ सत्कार (=पूजा) से सत्कृत किया। तब मुझे यासें हुआ—‘यह धर्म न निर्वेद (=उदासीनता) के लिये है, न वैराग्य के लिये, न निरोध के लिये, न उपशम (=शांति) के लिये, न अभिज्ञा (=दिव्य-शक्ति) के लिये, न सम्बोधि (=परमज्ञान) के लिये, न निर्वाण के लिये है; ‘आकिंचन्यायतन’ तक उत्पन्न होने ही के लिय (यह) है। सो मैं राजकुमार! उस धर्म को अपर्याप्त मान, उस धर्म से उदास हो चल दिया।

“सो राजकुमार! मैं ‘क्या कुशल (=अच्छा) हैं’ की गवेषणा करता, सर्वोत्तम श्रेष्ठ शांतिपद को खोजता, जहाँ उद्दक राम-पुत्त था, वहाँ गया। जाकर उद्दक (=उद्रक) राम-पुत्र से बोला—‘आवुस! इस धर्म-विनय में मैं ब्रह्मचर्य पालन करना चाहता हूँ।’ ऐसा कहने पर राजकुमार! उद्रक राम-पुत्र मुझसे बोला—

“विहरो आयुष्मान्! यह वैसा धर्म है, जिसमें विज्ञ पुरूष जल्द ही अपने आचार्यख को, स्वयं जान कर=साक्षात् कर=प्राप्त कर विहार करेगा’। सो मैंने तुरन्त क्षिप्र ही उस धर्म को पूरा कर लिया। सो मैं उतने ही ओठ-छुये-मात्र=कहने कहाने मात्र से ज्ञानवाद, और स्थविर-वाद कहने लगा—‘मैं जानता हूँ, देखता हूँ…’। तब मुझे ऐसा हुआ — राम ने मुझे यह न बतलाया ‘मैं इस धर्म को केवल श्रद्धा से, स्वयं जान कर=साक्षात् कर=प्राप्त कर विहरता हूँ”। जरूर राम इस धर्म को जानते देखते विहरता होगा। तब…उद्रक रामपुत्र से मैंने पूछा—‘आवुस रामपुत्र! इस धर्म को स्वयं जान ॰ ॰ बतलाते हो?’ ऐसा कहने पर! उद्रक राम-पुत्र ने ‘नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन’ बतलाया। तब मेरे (मन) में हुआ—‘उद्रक रामपुत्र के पास ही श्रद्धा नहीं है, मेरे पास भी श्रद्धा है ॰। क्यों न ॰। इस तरह मेरा आयार्य होते हुये उद्रक रामपुत्र ने मुझ अन्तेवासी को अपने बराबर के स्थान पर स्थापित किया ॰। ॰ सो मै! उस धर्म से उदास हो चल दिया।

“राजकुमार! ‘क्या अच्छा है’ की गवेषणा करता (=किकुसल-गवेसी), सर्वोत्तम, श्रेष्ठ शांतिपद को खोजते हूए, मगध में क्रमशः चारिका करते, जहाँ उरूबेला सेनानी-निगम (=कस्बा) था, वहाँ पहुँचां वहाँ मैंने रमणीय-भूमि-भाग, सुन्दर वन-खंड, बहती नदी श्वेत…सुप्रतिष्ठित, चारों ओर रमणीय गोचर-ग्राम देखां तब मुझे राजकुमार! ऐसा हुआ—‘रमणीय है, हो! यह भूमि-भाग ॰। प्रधान-इच्छुक कुल-पुत्र के प्रधान के लिये यह बहुत ठीक (स्थान) है’। सो मैं ‘प्रधान के लिये यह अलं (=ठीक) है, (सोच), वहीं बैठ गया। मुझे (उस समय) अद्भूत, अ-श्रुत-पूर्व, तीन उपमायें भान हुई।—

(1) ‘जैसे! गीला काष्ठ भीगे (=सस्नेह) पानी में डाला जाये। (कोई) पुरूष ‘आग बनाऊँगा,’ ‘तेज प्रादुर्भूत करूँगा’ (सोच), उत्तरारणी लेकर आये। तो क्या वह पुरूष गीले पानी में पडी गीली काष्ठ की उत्तरारणी को लेकर, मथ कर अग्नि बना सकेगा, तेज प्रादुर्भूत कर सकेगा?”

“नहीं भन्ते!”

“सो किस लिये?” ”(एक तो वह) स्नेह-युक्त गीला काष्ठ है, फिर वह पानी में डाला है।…ऐसा करने वाला वह पुरूष सिर्फ थकावट, पीडा का ही भागी होगा।”

“ऐसे ही राजकुमार! जो ब्राह्मण काया द्वारा काम वासनाओं में लग्न हो विचरते हैं। जो कुछ भी इनका काम (=वासनाओं) में काम-रूचि=काम-स्नेह=काम-मूर्छा=काम-पिपासा=काम-परिदाह है, वह यदि भीतर से नहीं छूटा हैं, नहीं शमित हुआ है तो प्रयतशील होने पर भी यह श्रमण-ब्राह्मण दुःख(-द) तीव्र, कटु, वेदना (मात्र) सह रहे हैं। वह ज्ञान-दर्शन अनुत्तर-सबोध (=परम-ज्ञान) के अयोग्य है।

“राजकुमार! यह मुझे पहिली अद्भूत, अश्रुत-पूर्व उपमा मान हुई ।

(2) “और भी राजकुमार! मुझे दूसरी अद्भूत अ-श्रुत-पूर्व उपमा मान हुई। राजकुमार! जैसे स्नेह-युक्त गीला काष्ठ जल के पास स्थल पर फेंका हो। और कोई पुरूष उत्तरारणी लेकर आये—‘अग्नि बनाऊँगा’ ‘तेज प्रादुर्भूत करूँगा’। तो क्या समझते हो राजकुमार! क्या वह पुरूष अग्नि बना सकेगा, तेज प्रादुभूत कर सकेगा?”

“नही भन्ते!”

“सो किस लिये?”

“(एक तो) वह काष्ठ स्नेह-युक्त है, और पानी के पास स्थल पर फंेंका हुआ भी है।…वह पुरूष सिर्फ थकावट, पीडा (मात्र) का ही भागी होगा।”

“ऐसे ही, राजकुमार! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण काया के द्वारा वासनाओं से लग्न हो विहरते है। ॰ अयोग्य हैं। राजकुमार! मुझे यह दूसरी ॰।

(3) “और भी राजकुमार! तीसरी अद्भूत अ-श्रुत-पूर्व उपमा मान हुई।—जैसे नीरस शुष्क काष्ठ जल से दूर स्थल पर फेंका है। और कोई पुरूष उत्तरारणी लेकर आये—‘आग बनाऊँगा’, ‘तेज प्रादुर्भूत करूँगा। तो क्या वह पुरूष नीरस-शुष्क, जल से दूर फेंक काष्ठ को, उत्तरारणी से मंथन करके अग्नि बनला सकेगा, तेज प्रादुर्भूत कर सकेगा?

“हाँ भन्ते!”

“सो किस लिये?”

“भन्ते! वह नीरस सूखा काष्ठ है, और पानी से दूर स्थल पर फेंका है।”

“ऐसे ही राजकुमार! जो कोई श्रमण ब्राह्मण, काया द्वारा काम-वासनाओं से अलग हो विहरते है। और जो उनका काम-वासनाओं में ॰ काम-परिदाह है; वह भीतर से भी सुप्रहीण (=अच्छी तरह छूट गया) है, सुशमित है। तो वह प्रयत्नशील श्रमण ब्राह्मण दुःख (-द), तीव्र, कटु वेदना नहीं भोगते। वह ज्ञान-दर्शन=अनुत्तर-सबोध के पात्र है। यदि यह प्रयत्नशील श्रमण ब्राह्मण दुःख, तीव्र कटु वेदनला को भोगें भी, (तो भी) वह ज्ञान-दश्रन=अनुत्तर-सबोध के पात्र हैं। यह राजकुमार तीसरी ॰।

“तब राजकुमार! मेरे (मन में) हुआ—“क्यों न मैं दाँतो के ऊपर दाँत रख, जिह्वा द्वारा तालू को दवा, मन से मन को निग्रह करूँ, दबाऊँ, संतापित करूँ। तब मेरे दाँत पर दाँत रखने, जिह्वा से तालू दबाने, मन से मन को पकडने, दबाने, तपाने में; काँख से पसीना निकलता था; जैसे कि राजकुमार! बलवान् पुरूष सीस से पकडकर, कंधे से पकडकर, दुर्बल-तर पुरूष को पकडे, दबाये, तपाये; ऐसे ही राजकुमार! मेरे दाँत पर दाँत ॰ काँख से पसीना निकलता था। उस समय मैंने न दबने वाला वीर्य (=उद्योग) आरम्भ किया हुआ था, न भूली स्मृति बनी थी, काया भी तत्पर थी।

“तब मुझे यह हुआ — क्यों न मैं श्वासरहित ध्यान धरूँ? सो मैंने राजकुमार! मुख और नासिका से श्वास का आना जाना रोक दिया। तब राजकुमार! मेरे मुख और नासिका से आश्वास-प्रश्वास के रूक जाने पर, कान के छिद्रों से निकलते बातों (=हवाओं) का बहुत अधिक शब्द होने लगा। जैसे कि-लोहार की धौंकनी से धौकने से बहुत अधिक शब्द होत है; ऐसे ही ॰। ॰ न दबने वाला वीर्य आरम्भ किया हुआ था ॰।”

“तब मुझे यह हुआ — क्यों न मैं श्वास-रहित ध्यान धरूँ? सो मैंने राजकुमार! मुख से ॰। तब मेरे मुख नासा और कर्ण से आश्वास-प्रश्वास के रूक जाने से, मूर्धा में बहुत अधिक बात टकराते। जैसे बलवान् पुरूष तीक्ष्ण शिखर से मूर्धा (=शिर) को मथे, ऐसे ही राजकुमार! मेरे ॰।

“तब मुझे यह हुआ — क्यों न श्वास-रहित ध्यान धरूँ?—सो मैंने मुख, नासा, कर्ण से आश्वास-प्रश्वास को रोक दिया। तब मुझे मुख, नासा, कर्ण से आश्वास-प्रश्वास के रूक जाने से सीस में बहुत अधिक सीस-वेदना (=शिर-दर्द) होती थी। ॰ न दबाने वाला ॰।…

“तब राजकुमार! मुझे यह हुआ — क्यों न श्वास-रहित ही ध्यान धरूँ?—सो मैंने ॰। ॰ रूक जाने पर बहुत अधिक बात पेट (=कुक्षि) को छेदते थे। जैसे कि दक्ष (=चतुर गो-घातक) या गो-घातक का अन्तेवासी तेज गो-विकत्र्तन (=छुरा) से पेट को काटे; ऐसे ही ॰। न दबने वाला ॰।

“तब मुझे यह हुआ—‘क्यों न श्वास-रहित ही ध्यान (फिर) धरूँ’ ॰। राजकुमार ॰। ॰ काया में अत्यधिक दाह होता था। जैसे कि दो बलवान् पुरूष दुर्बलतर पुरूष को अनेक बाहों में पकडकर अंगारों पर तपावें; चारों ओर तपावें; ऐसे ही ॰। न दबते ॰।

“देवता भी मुझे कहते थे—‘श्रमण गौतम मर गया।’ कोई काई देवता यों कहते थे—‘श्रमण गौतम नहीं मरा, न मरेगा; श्रमण गौतम अर्हत् है। अर्हत् तो इस प्रकार का विहार होता ही है।

“…मुझे यह हुआ—“क्यों न आहार को बिल्कल ही छोड देना स्वीकार करूँ। तब देवताओं ने मेरे पास आकर कहा—मार्ष! तुम आहार का बिल्कुल छोडना स्वीकार करो। हम तुम्हारे रोम-कूपों द्वारा दिव्य-ओज डाल देंगें; उसी से तुम निर्वाह करोगे।…। तब मुझे यह हुआ — मैं (अपने को) सब तरह से निराहारी जानूँगा और यह देवता रोमकूपों द्वारा दिव्य ओज मेरे रोम-कूपों के भीतर डालेंगे; मैं उसी से निर्वाह करूँगा। यह मेरा (तप) मृष होगा। सो मैंने उन देवताओं का प्रत्याख्यान किया—‘रहने दो’।

“तब मुझे यह हुआ — क्यों न मैं थोडा थोडा आहार ग्रहण करूँ—पसर भर मूँग का जूस, या कुलथी का जूस या मटर का जूस, या अरहर का जूस — । सो मैं थोडा थोडा पसर पसर मूँग का जूस ॰ ग्रहण करने लगा। थोडा थोडा पसर पसर भर मूँग का जूस ॰ ग्रहण करते हुये, मेरा शरीर (दुर्बलता की) चरम सीमा को पहुँच गया। जैसे आसीतिक (=वनस्पति विशेष) की गाँठ…वैसे ही उस अल्प आहार से मेरे अंग प्रत्यंग हो गये। उस अल्प आहार से जैसे ऊँट का पैर, वैसे ही मेरा कूल्हा (=आनिसद) हो गया, ॰ जैसे सुओं की पाँती (=वट्टनावली) वैसे ही ऊँचे-नीचे मेरे पीठ के काँटे हो गये। ॰ जैसे पुरानी शाला की कडियाँ (=टोडे=गोपानसी) अहँण-बहँण (=ओलुग्ग-विलुग्गा) होती हैं, ऐसे ही मेरी पंसुलिया हो गई थीं। जैसे गहरे कुयें (=उदपान) में पानी का तारा (=उदक-तारा) गहराई में, बहुत दूर दिखाई देता है, उसी ॰। जैसे कथा तोड़ा कड़वा लौका हवा-धूप से चिचु (=संपुटित) जाता है मुर्झा जाता है; ऐसे ही मेरे शिर की खाल चिचुक गई थी, मुर्झा गई थी।…राजकुमार! यदि मैं पेट की खाल को मसलता, तो पीठ के काँटों को पकड लेता था, पीठ के काँटों को मसलता तो पेट की खाल को पकड लेता था। उस अल्पाहार से मेरे पीठ के काँटे और पेट की खाल बिल्कुल सट गई थी।…यदि मैं पाखाना या मूत्र करता, वहीं भहराकर (=उपकुज्ज) गिर पडता था। जब मैं काया को सहराते (=अस्सासेन्तो) हुये, हाथ से गात्र को मसलता था; तो हाथ से गात्र मसलते वक्त, काया से सडी जड वाले (=पूति-मूल) रोम झड पडते थे।…मनुष्य भी मुझे देखकर कहते थे—‘श्रमण गौतम काला है’। कोई कोई मनुष्य कहते थे—“श्रमण गौतम काला नहीं है, श्याम है।” कोई कोई मनुष्य यो कहते थे “श्रमण गौतम काला नहीं हे, न श्याम ही हैं, भंगुर-वर्ण (=मंगुरच्छवि) है’। राजकुमार! मेरा वैसा परि-शुद्ध परि-अवदात (=सफेद, गोरा) छवि-वर्ण (=चमडे का रंग) नष्ट हो गया था।

“तब मुझे यों हुआ — अतीत काल में जिन किन्हीं श्रमणों ब्राह्मणें ने घोर दुःख, तीव्र और कटु वेदनायें सहीं, इतने ही पर्यन्त, (सही होंगी) इससे अधिक नहीं; भविष्य काल में जो कोई श्रमण ब्राह्मण घोर दुःख, तीव्र और कटु वेदनायें सहेंगे, इतने ही पर्यन्त, इससे अधिक नहीं। आजकल भी जो कोई श्रमण ब्राह्मण घोर दुःख, तीव्र और कटु वेदना सह रहे हैं ॰। लेकिन राजकुमार! मैने उस दुष्कर कारिका से उत्तर-मनुष्य-धर्म अलमार्य-ज्ञान-दर्शन-विशेष न पाया। (विचार हुआ) बोध के लिये क्या कोई दूसरा मार्ग है?

“तब राजकुमार! मुझे यों हुआ—“मालूम हैं मैंने पिता (शुद्धोदन) शाकय के खेत पर जामुन की ठंडी छाया के नीचे, बैठ, काम और अकुशल-धर्मो को हटाकर प्रथम ध्यान को प्राप्त हो, विहार किया था। शायद वह मार्ग बोधिका हो। तब राजकुमार! मुझे यह हुआ — क्या मैं उस सख से डरता हूँ, जो सुख काम और अकुशल-धर्मो से भिन्न में है। फिर मुझे, राजकुमार यह हुआ — मैं उस सुख से नहीं डरता हूँ जो सुख ॰। तब मुझे, राजकुमार! यह हुआ — इस प्रकार अत्यन्त कृश, पतले काया से वह सुख मिलना सुकर नहीं, क्यों न मैं स्थूल आहार — भात-दाल (=कुल्माष) ग्रहण करूँ। सो मैं राजकुमार! स्थूल आहार ओदन-कुल्माष ग्रहण करने लगा। उस समय राजकुमार! मेरे पास पाँच भिक्षु (इस आशा से) रहा करते थे; कि श्रमण गौतम जिस धर्म को प्राप्त करेगा, उसे हम लोगों को (भी) बतलायेगा। लेकिन जब मैं स्थूल आहार ओदन कुल्माष ग्रहण करने लगा; तब वह पाँचों, भिक्षु, ‘श्रमण गौतम बाहुलिक, (=बहुत संग्रह करने वाला) प्रधान से विमुख, बाहुल्य परायण हो गया’ (समझ)-उदासीन हो, चले गये।

“तब राजकुमार! मैं स्थूल आहार ग्रहण कर, सबल हो काम और अकुशल-धर्मो से वर्जित, वितर्क तथा विचार सहित, एकान्तवास से उत्पन्न (=विवेकज), प्रीति-सुख वाले प्रथम ध्यान को प्राप्त हो विहरने लगा। वितर्क और विहार के उपशमित होने पर, भीतर के संप्रसादन (=प्रसन्नता) =चित्त की एकाग्रता-युक्त, वितर्क-विचार-रहित, समाधि से उत्पन्न प्रीति-सुखवाले द्वितीय ध्यान को प्राप्त हो विहरने लगा।…प्रीति और विराग की उपेक्षा कर, स्मृति और संप्रजन्य के साथ, काया से सुख को अनुभव (=प्रतिसवेदन) करता हुआ, विहरने लगा। जिसको कि आर्यजन उपेक्षम स्मृतिमान् और सुखविहारी कहते है; ऐसे तृतीय ध्यान को प्राप्त हो विहार करने लगा।…।

“सुख और दुःख के विनाश (=प्रहाण) से, पहिले ही सौमनस्य और दौर्मनस्य के पहिले अस्त हो जाने से, दुःख-रहित, सुख-रहित अपेक्षक हो, स्मृति की परिशुद्धता से युक्त चतुर्थ ध्यान को प्राप्त हो विहार करने लगा।

(1) “तब इस प्रकार चित्त के परिशुद्ध=परि-अवदात,=अंगणरहित=उपक्लेश-रहित, मृदु हुये, काम-लायक, स्थिर=अचलता-प्राप्त=समाधिप्राप्त हो जाने पर, पूर्वजन्मों की स्मृति के ज्ञान (=पूर्व-निवासानुस्मृति-ज्ञान) के लिये चित्त को मैंने झुकाया। फिर मैं पूर्वकृत अनेक पूर्व-निवासों (=जन्मों) को स्मरण करने लगा—जैसे एक जन्म भी, दो जन्म भी,। आकार-सहित उद्देश-सहित पूर्वकृत अनेक पूर्व-निवासों को स्मरण करने लगा। इस प्रकार प्रमाद-रहित, तत्पर हो आत्म-संयमयुक्त विहरते हुये, मुझे रात के पहिले याम में यह प्रथम विद्या प्राप्त हुई; अविद्या गई, विद्या आई; तम नष्ट हुआ, आलोक उत्पन्न हुआ।

(2) “सो इस प्रकार चित्त के परिशुद्ध ॰ समाहित होने पर, प्राणियों के जन्म-मरण के ज्ञान (=च्युति-उत्पादन-ज्ञान) के लिये मैंने चित्त को झुकाया। सो मनुष्य (के नेत्रों) से परे की विशुद्ध दिव्य चक्षु से, मैं अच्छे, बुरे, सुवर्ण, दुर्वर्ण, सु-गत, दुर्गत, मरते, उत्पन्न होते, प्राणियों को देखने लगां सो॰…कर्मानुसार जन्म को प्राप्त प्राणियों को जानने लगा। रात के बिचले पहर (=याम) में यह द्वितीय विद्या उत्पन्न हुई। अविद्या गई ॰।

(3) “सो इस प्रकार चित्त के ॰। आस्रवों (=चित्त-मल) के क्षय के ज्ञान के लिये मैंने चित्त को झुकाया—सो ‘यह दुःख है’ इसे यथार्थ से जान लिया; ‘यह दुःख समुदय है’ इसे यथार्थ से जान लिया; ‘यह दुःख-निरोध है’ इसे यथार्थ से जान लिया, ‘यह दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपद् है’ इसे यथार्थ से जान लिया। ‘यह आस्रव हैं’ इन्हें यथार्थ से जान लिया; ‘यह आस्रव-समुदाय है’ इसे ॰, ‘यह आस्रव-निरोध ॰’ ‘यह आस्रव-निरोध=गामिनी-प्रतिपद् है’ इसे ॰। सो इस प्रकार जानते, इस प्रकार देखते, मेरा चित्त कामास्रवों से मुक्त हो गया, भवास्रवों से मुक्त हो गया, अविद्यास्रव से भी विमुक्त हो गया। छूट (=विमुक्त) जाने पर ‘छूट गया (विमुक्त)’ ऐसा ज्ञान हुा। ‘जन्म खतम हो गया, ब्रह्मचर्य पूरा हो गया, करना था सो कर लिया, अब यहाँ के लिये कुछ (करणीय) नहीं’ इसे जाना। राजकुमार! रात के पिछले याम में यह तृतीय विद्या प्राप्त ॰ अविद्या चली गई ॰। ॰।

“तब राजकुमार! पंचवर्गीय भिक्षु मेरे द्वारा इस प्रकार उपदेशित हो=अनुशासित हो, अचिरही में जिसके लिये कुल-पुत्र घर से बेघर हो प्रब्रजित होते हैं, उस उत्तम ब्रह्मचर्य फल को, इसी जन्म में स्वयं जानकर=साक्षात् कर=उपलाभकर, विहरने लगे।”

ऐसा कहने पर बोधि-राजकुमार ने भगवान् से कहा—

“भन्ते! कितनी देर में तथागत (को) विनायक (=नेता) पा, भिक्षु जिसके लिये कुल-पुत्र घर से बेघर हो प्रब्रजित होते हैं, उस उत्तम ब्रह्म-चर्य-फल को इसी जन्म में स्वयं जान कर=साक्षात् कर=उपलाभकर, विहरने लगेगा?”

“राजकुमार! तुझसे ही यहाँ पूछता हूँ, जैसा तुझे ठीक लगे, वैसा बतला। हाथीवानी=अंकुश ग्रहण शिलप (=कला) में तू चतुर है न?”

“भन्ते! हाँ मैं हाथीवानी ॰ में चतुर हूँ।”

“तो राजकुमार! यदि कोई पुरूष—‘बोधि-राजकुमार हाथीवानी=अंकुश-ग्रहण-शिल्प जानता है, उसके पास से हाथीवानी=अंकुश-ग्रहण शिल्क को सीखूँगा’ (सोचकर) आवे। और वह हो-श्रद्धारहित, (तो क्या) जितना श्रद्धा-सहित (मनुष्य) द्वारा पाया जा सकता हैं, (उतना) वह पावेगा? वह हो बहुत-रोगी, (तो क्या) जितना अल्प-रोगी द्वारा पाया जा सकता है, (उतना) वह पावेगा। ॰ शठ मायावी ॰, अशठ अमायावी ॰, आलसी ॰, ॰ निरालस ॰। दुष्प्रज्ञ ॰, प्रज्ञावान् ॰ तो राजकुमार! क्या वह पुरूष तेरे पास हाथीवानी=अंकुश-ग्रहण शिल्प को सीखेगा?”

“एक दोष से भी युक्त पुरूष मेरे पास हाथीवानी=अंकुश-ग्रहण शिल्प नहीं सीख सकता, पाँचों दोषों से युक्त के लिये तो कहना ही क्या?”

“तो राजकुमार! यदि कोई मनुष्य ‘बोधि-राजकुमार हाथीवानी ॰ जानता है ॰ शिल्प को सीखूँगा’ (सोचकर) आवे। वह हो श्रद्धावान् ॰; अल्प-रोगी ॰; ॰ अशठ=अमायावी ॰; निरालस ॰। तो राजकुमार! क्या वह पुरूष तेरे पास हाथीवानी=अंकुश-ग्रहण शिल्प सीख सकेगा?”

“भन्ते! एक बात से युक्त भी पुरूष मेरे पास ॰।”

“इसी प्रकार राजकुमार! निर्वाण-साधना (=प्रधान) के भी पाँच अंग हैं। कौन से पाँच?—(1) भिक्षु श्रद्धालु हो, तथागत की बोधि (=परमज्ञान) पर श्रद्धा करता हो—‘कि वह भगवान्, अर्हत्, सम्यक्-संबुद्ध, विद्या-आचरण-सम्पन्न, सुगत, लोक-विद्, अन्-उत्तरपुरूष-दम्य-सारथी, देव-मनुष्य के शास्ता, बुद्ध, भगवान् हैं। (2) अल्प-रोगी=अल्प-आतंकी, न बहुत शीत, न बहुत उष्ण, साधना योग्य, सम-विपाकवाली मध्यम प्रकृति (=ग्रहणी) से युक्त हो। (3) अ-शठ=अ-मायावी हो; शास्ता (=गुरू) और विज्ञ स-ब्रह्मचारिये में, कुशल धर्मो के उत्पादन में निरालय हो; (4) कुशल धर्मो से कंधे से जुआ न हटानेवाला, दृढ-पराक्रमी बलिष्ठ हो। (5) उदय-प्रज्ञावान् हो, उदय-अस्त-गामिनी, आर्यनिर्वेधिक सम्यक् दुःख-क्षय-गामिनी प्रज्ञा से युक्त हो। राजकुमार! प्रधान के यह पाँच अंग है।

“राजकुमार! इन पाँच प्रधानीय अंगो से युक्त भिक्षु, तथागत को विनायक (=नेता) पा, अनुत्तर ब्रह्मचर्य-फल को इसी जन्म से सात वर्षो में, स्वयं जानकर=साक्षात्कर=प्राप्त कर विहरेगा।”

“राजकुमार! छोडो सात वर्ष; इन पाँच प्रधानीय अंगो से युकत भिक्षु ॰, छः वर्षो में। ॰ पाँच वर्षो में। ॰ चार वर्षो में। ॰ तीन वर्षो में। ॰ दो वर्षो में। ॰ एक वर्ष में। ॰ सात मास में। ॰ छः मास में। ॰ पाँच मास में । ॰ चार मास में। ॰ तीन मास में। ॰ दो मास में। ॰ एक मास में। ॰ सात रात-दिन में। ॰ छः रात-दिन में। ॰ पाँच रात-दिन में। ॰ चार रात-दिन में। ॰ तीन रात-दिन में। ॰ दो रात-दिन में। ॰ एक रात-दिन में।

“छोडो राजकुार! एक रात-दिन; इन पाँच प्रधानीय अंगो से युक्त भिक्षु, तथागत को विनायक पा, सायंकाल को अनुशासन किया, प्रातः काल विशेष (=निर्वाणपद) को प्राप्त कर सकता है, प्रातः अनुशासित सायं विशेष प्राप्त कर सकता है।”

ऐसा कहने पर बोधि-राजकुमार बोला—“अहो! बुद्ध!! अहो! धर्म!! अहो! धर्म का स्वाख्यात-पन (=उत्तम वर्णन)!! जहाँ कि सायं अनुशासित प्रातः विशेषको पा जाये, प्रातः अनुशासित सायं विशेष को पा जाये।”

ऐसा बोलने पर सजिका-पुत्र ने बोधि-राजकुमार से कहा—“ऐसा ही है, हे भवान् बोधि!—‘अहो! बुद्ध!! अहो! धर्म!!, अहो! धर्म का स्वाख्यात-पन।’ (यह) तुम कहते हो; तो भी उस धर्म और भिक्षु-संक्ष की शरण नहीं जाते?”

“सौम्य! संजिका-पुत्र! ऐसा मत कहो। सौम्य! संजिका-पुत्र! ऐसा मत कहो। सौम्य संजिका-पुत्र! मैने अय्या (=आय्र्या) के मुँह से सुना, (उन्हीं के) मुख से ग्रहण किया है। सौम्य! संजिका-पुत्र एक बार भगवान् कौशाम्बी में घोषिताराम में विहार करते थे। तब मेरी गर्भवती अय्या जहाँ भगवान् थे, वहाँ गई, जाकर भगवान् से अभिवादन कर एक ओर बैठ गई। एक ओर बैठी मेरी अय्या ने भगवान् से यों कहा—“भन्ते! जो मेरे कोख में यह कुमारी या कुमार है, वह भगवान् की, धर्म की और भिक्षु-संघ की शरण जाता है। आज से भगवान् इसे सांजलि शरणागत उपासक धारण करें।

“सौम्य! संजिका-पुत्र! एक बार भगवान् यहीं भर्ग में सुंसुमार-गिरी के भेषकलावन मृगदाव में विहरते थे, तब मेरी घाई (=घाती) मुझे गोद में लेकर जहाँ भगवान् थे, वहाँ गई। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर खडी हो गई। एक ओर खडी हुई मेरी धाई ने भगवान् से कहा—भन्ते यह बोधि-राजकुमार भगवान् की, धर्म की, और भिक्षु-संघ की ॰

“सौम्य! संजिकापुत्र! यह मैं तीसरी बार भी भगवान् की, धर्म की और भिक्षु-संघ की शरण जाता हूँ। आज से भगवान् मुझे सांजलि शरणागत उपासक धारण करें।”

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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Che tutti gli esseri siano felici