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MN 144

Channovāda sutta: छन्नोवाद-सुत्तन्त

Channovādasutta

Saḷāyatanavagga

Vertalingen

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् राजगृह वेणुवन कलंदक निवाप में विहार करते थे।

उस समय आयुष्मान् सारिपुत्र, आयुष्मान महाचंुद, और आयुष्मान् महाछन्न, गृघ्रकूट पर्वत पर विहार करते थे। उस समय आयुष्मान् छन्न बहुत अधिक रूग्ण, दुःखी ॰ बीमार थे। तब आयुष्मान् सारिपुत्र सायंकाल, ध्यान से उठ जहाँ आयुष्मान् महाचुंद थे, वहाँ गये। जाकर आयुष्मान् महाचुन्द से यह कहा—

“चलो, आवुस चुन्द! बीमारी पूछने को जहाँ आयुष्मान् छन्न हैं, वहाँ चलें।”

“अच्छा, आवुस!”—(कह) आयुष्मान् महाचुन्द ने आयुष्मान् सारिपुत्र को उत्तर दिया।

तब आयुष्मान् सारिपुत्र और आयुष्मान् महाचुन्द जहाँ आयुष्मान छन्न थे वहाँ गये। जाकर आयुष्मान् छन्न के साथ…संमोदन कर एक ओर बैठे गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् सारिपुत्र ने आयुष्मान् छन्न से यह कहा—

“आवुस छन्न! ठीक तो हैं? (काल) यापन तो हो रहा है? ॰ लौटना तो नहीं मालूम हो रहा है?”

“आवुस सारिपुत्र! मुझे ठीक नहीं है; ॰ अत्यधिक दाह हो रहा है। आवुस सारिपुत्र! मुझे ठीक नहीं हैं ॰। आवुस सारिपुत्र! शस्त्रमार (आत्महत्या) करूँगा; मैं जीना नहीं चाहता।”

“मत आयुष्मान् छन्न! शस्त्रमार (आत्महत्या) करें। गुजार दे, आयुष्मान् छन्न! हम आयुष्मान् छन्न को गुजारते (देखना) चाहते है। यदि आयुष्मान् छन्न को अनुकूल (सप्पाय) भोजन नहीं (प्राप्त) हैं, (तो) मैं ॰ खोज लाऊँगा। यदि आयुष्मान् छन्न को अनुकूल औषध नहीं (प्राप्त) हैं, (तो) मैं आयुष्मान् छन्न को अनुकूल औषध खोज लाऊँगा। यदि आयुष्मान् छन्न को योग्य (प्रतिरूप) उपस्थाक (=सेवा करने वाला) नहीं है, तो मैं आयुष्मान् छन्न उपस्थान (=सेवा) करूँगा। मत आयुष्मान् छन्न शस्त्र-मार आत्महत्या करें ॰ गुजारते (देखना) चाहते है।”

“आवुसा सारिपुत्र! मुझे अनुकूल भोजन का अभाव नहीं है। मुझे अनुकूल औषध का अभाव नहीं है। मुझे योग्य उपस्थाक का अभाव नहीं है। बल्कि, आवुस सारिपुत्र! मैंने चिरकाल तक प्रेम के साथ शास्ता (=बुद्ध) का परिचरण (=सेवन) किया, अ-प्रेम (=अ-मनाप) से नहीं। आवुस सारिपुत्र! श्रावक के लिये यही योग्य है, जो कि वह शास्ता का प्रेम से परिचरण करें, अ-प्रेम से नहीं। ‘छन्न भिक्षु पुर्नजन्म-रहित हो शस्त्रमार (आत्महत्या) करेंगे—ऐसा ही, आवुस सारिपुत्र! तुम धारण करो।”

“हम आयुष्मान् छन्न से कुछ पूछें, यदि आयुष्मान् छन्न प्रश्न का उत्तर देने का अवकाश करें।”

“पूछो, आवुसा सारिपुत्र! सुनकर समझूँगा।”

“आवुस छन्न! चक्षु, चक्षु-र्विज्ञान, और चक्षुर्विज्ञान द्वारा (=विज्ञातव्य) जानने योग्य धर्मो को—‘यह मेरा है’, ‘यह मैं हूँ’, ‘यह मेरा आत्मा है’—समझते हो? श्रोत्र ॰? घ्राण ॰? जिह्वा ॰? काय ॰? मन ॰?”

“आवुस सारिपुत्र! चक्षु, चक्षुर्विज्ञान, और चक्षुर्विज्ञान द्वारा विज्ञातव्य धर्मों (=पदार्थो) को—‘यह मेरा नहीं हैं’ ‘यह मैं नही हूँ,’ ‘यह मेरा आत्मा नहीं है’—मैं समझता हूँ। श्रोत्र ॰। घ्राण ॰। जिह्वा ॰। काय ॰। मन ॰। ”

“आवुस छन्न! चक्षु में, चक्षुर्विज्ञान में, चक्षु र्विज्ञान द्वारा विज्ञातव्य धर्मों में क्या देख, क्या जान, चक्षु, चक्षुर्विज्ञान, चक्षुर्विज्ञान द्वारा विज्ञातव्य धर्मों को—‘यह मेरा नहीं है’—समझते हो? श्रोत्र ॰? घ्राण ॰? जिह्वा ॰? काय ॰? मन ॰त्र”

“आवुस सारपुत्र! चक्षु में ॰ धर्मो में निरोध (=विनश्वरता) को देख, निरोध को जान; चक्षु ॰ धर्मो को—‘यह मेरा नहीं है’ ॰—समझता हूँ। श्रोत्र ॰। घ्राण ॰। जिह्वा ॰। काय ॰। मन ॰।”

ऐसा कहने पर आयुष्मान् महाचुन्द ने आयुष्मान् छन्न से यह कहा—

“तो, आवुस छन्न! उन भगवान् के इस सनातन (=नित्यकल्प) शासन (=उपदेश) को भी मन में करना चाहिये—’(तृष्णा में) निश्रित (=बद्ध) का (चित्त) चलित होता है, अ-निश्रित का चलित नहीं होता। चलित (रागादि के पर्युत्थान) न होने पर प्रश्रब्धि (=एकाग्रता), प्रश्रब्धि होने पर नति (=तृष्णा) नहीं होती; नति के न होने पर आगति-गति (=आवागमन) नहीं होती। आगति-गति के न होने पर च्युति (=मृत्यु) उपपाद (=उत्पति) नहीं होती। च्युति-उपपाद न होने पर यहाँ (=इस लोक में) न वहाँ (परलोक मंे) न दोनों में होता है। यही दुःख का अंत है।”

तब आयुष्मान् सारिपुत्र और आयुष्मान् चुन्द इस अववाद (=उपदेश) से आयुष्मान् छन्न को उपदेश कर आसन से उठकर चले गये। तब आयुष्मान् सारिपुत्र और आयुष्मान् चुन्द के चले जाने के थोडे ही समय बाद, आयुष्मान् छन्न ने शस्त्रमार (आत्महत्या) कर ली। तब आयुष्मान् सारिपुत्र जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् सारिपुत्र ने भगवान् से यह कहा—

“भन्ते! आयुष्मान् छन्न ने शस्त्रमार (आत्महत्या) कर ली। उनकी क्या गति, क्या अभिसंपराय (=परलोक) होगा?”

“क्यों, सारिपुत्र! छन्न भिक्षु ने तेरे सामने ही पुनर्जन्म-रहित होने का व्याकारण (=कथन) किया था।”

“भन्ते! वज्जी (देश) में पब्बजित-ट्ठित गाँ है; वहाँ भन्ते! आयुष्मान् छन्न के मित्र-कुल, सुह्रद्-कुल उपगंतव्य (=जिनके पास जाया जाये) कुल हैं (रहते हैं)।”

“सारिपुत्र! मैं इतने से ‘उपब्रज्य’ (=जाने आने के संसर्ग वाला) नहीं कहता। सारिपुत्र! जो इस काया को छोडता है, और दूसरी काया को ग्रहण करता है उसे मैं ‘उप-ब्रज्य’ कहता हूँ। वह छन्न भिक्षु को नहीं था। ‘अन्-उप-ब्रज्य (=पुनर्जन्मरहित) हो छन्न भिक्षु ने शस्त्रमार (आत्म-हत्या) की’—इस प्रकार इसे सारिपुत्र! समझों (=धारण करों)।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् सारिपुत्र ने भगवान् के भाषण का अभिनंदन किया।

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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

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