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MN 66

Laṭukikopama sutta: लकुटिकोपम-सुत्तन्त

Laṭukikopamasutta

Bhikkhuvagga

Vertalingen

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् अंगुत्तराप (देश) में आपण नामक अंगुत्तराप (वासियों) के कसबे में विहार करते थे।

तब भगवान् पूर्वाह्न के समय पहिनकर पात्र-चीवर ले पिंड (= भिक्षा) के लिये आपण में प्रविष्ट हुये। आपण में पिंडचार (= मधूकरी माँगना) करके, पिंडपात (= भिक्षा) से निवृत्त हो दिन के विहार के लिये एक वन-खंड में गये। उस वन-खंड में प्रविष्ट हो एक वृक्ष के नीचे दिन के विहार के लिये बैठे। आयुष्मान् उदायी भी पूर्वाह्न समय पहिन कर ॰ एक वृक्ष के नीचे दिन के विहार के लिये बैठे।

तब एकान्त में ध्यानावस्थ हो बैठे आयुष्मान् उदायी के चित्त में यह वितर्क उत्पन्न हुआ—

“अहो! भगवान् हमारे बहुत से दुःखों के अपहर्ता हैं। अहो! भगवान् हामरे बहुत से सुखों (= सुख-धर्मो) के उपहर्ता (= लाने वाले) हैं। अहो! भगवान् हमारे बहुत से अकुशल-धर्मो (= बुराइयों) के अपहर्ता हैं। अहो! भगवान् हमारे बहुत से कुशल-कर्मो (= भलाइयों) के उपहर्ता है।”

तब आयुष्मान् उदायी सायंकाल प्रतिसँल्लयन (= ध्यान) से उठ कर, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये; जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् उदायी ने भगवान् से यह कहा—

“भन्ते! आज एकान्त में ध्यानावस्थ हो बैठे मेरे चित्त में यह वितर्क उत्पन्न हुआ—‘अहो ॰ उपहर्ता है।’ भन्ते! पहिले हम शाम को भी खाते थे, सवेरे को भी, दिया (= मध्याह्न) को भी विकाल (= अपराह्न) में भी। उस समय जब भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओ! तुम इस मध्याह्न-बाद दिन के भोजने को छोडो।’ उस समय भन्ते! मुझे बुरा लगा=दुर्मनता हुई—‘जो कि गृहपति श्रद्धा से हमें उत्तम खाद्य-भोज्य मध्याह्न-वाद दिन को देते हैं, उसका भी भगवान् हमें त्याग करना कहते हैं, उसके भी सुगत हमें छोडना कहते है।’ सो हमने भन्ते! भगवान् के प्रति पे्रम, गौरव, ही (= लज्जा), अपत्रता (= संकोच) का ख्याल कर उस विकाल भोजन को छोड दिया। सो हम भन्ते! शाम को खाते, सवेरे खाते थे। फिर वह भी समय आया जब भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—‘भिक्षुओ! तुम इस रात के विकाल भोजन को छोडो’। उस समय भन्ते! मुझे बुरा लगा; दुर्मनता हुई—‘जो कि गृहपति श्रद्धा से हमें उत्तम खाद्य-भोज्य रात को विकाल में देते हैं, उसका भी भगवान् हमें त्याग करना कहते हैं, उसका भी सुगत हमें छोडना कहते है’। पहिले (एक बार) भन्ते! कोई पुरूष दिन को नींद लेता बोला—‘हन्त! हमें रख दो, शाम को सब इक्ट्ठा होकर खायेंगे’। जो कुछ भन्ते! संखतियाँ (= सुन्दर पाक) हैं, सभी रात को (अधिक) होती हैं, दिन को कम। सो हमने भन्ते! भगवान् के प्रति पे्रम ॰ ख्याल कर उस रात्रि के विकाल भोजन को छोड दिया। पहिले भन्ते! भिक्षु रात के अंधकार में भिक्षाटन (= पिंडचार) करते थे। (उस समय वह) चन्दनिका (= गडहे) में भी घुस जाते थे, गडही (= ओलिगल्ल) में भी गिर जाते थें, काँटे की रूँधान पर भी चढ जाते थे, सोई गाय पर चढ जाते थे; कृत-कर्म (= अपना काम जिसने कर लिया है) अ-कृत-कर्म चोरो के साथी भी उनका संगम हो जाता था। (दुराचारिणी) स्त्रियाँ भी उन्हें अधर्म के लिये बुलाती थी। पहिले एक समय भन्तेे! मैं रात के अंधकार में भिक्षाटन कर रहा था, बिजली की चमक में, भन्ते! मैने एक स्त्री को बर्तन साफ करते देखा। उसने मुझे देख चीत्कार किया—‘अरे मरी! पिशाच!! मुझे (खाने आ रहा है)!!!, ऐसा कहने पर मैंने भन्ते! उस स्त्री को कहा—‘भगिनी! मैं पिशाच नहीं हूँ, भिक्षा के लिये भिक्षु खडा हूँ।’ ‘भिक्षु का बाप मरे, भिक्षु की मा मरे। भिक्षु को गाय काटने की तीक्ष्ण छुरी से अपना पेट काट लेना अच्छा है, न कि रात के अंधकार में तुम्हारा भीख माँगना।’ भन्ते! वह (बात) याद करते मुझे ऐसा हातेा है—‘आहे! भगवान् हमारे बहत से दुःखो के अपहर्ता है ॰ कुशल धर्मो के उपहर्ता है।”

“ऐसे ही उदायी! कोई कोई मोघपुरूष मेरे—‘यह छोडो’—कहने पर ऐसा कहते है—‘क्या इस छोटी बात के लिये, तुच्छ बात के लिये यह श्रमण ज़िद् कर रहा है’ और वह उसे नहीं छोडते, और मेरे विषय में विरक्ति उत्पन्न करते हैं। (किन्तु) जो भिक्षु सीख चहने वाले होते है, उनको यह होता है—‘यह जबर्दस्त बंधन है; दृढ़ बन्धन है, स्थिर बंधन है, मजबूत (= अपूतिक=न-सडा) बंधन है, स्थूल कलिगर (= पशुओं के गले में बाँधने का काष्ठ) है।’ जैसे उदायी! पूति (= पोय) लता के बंधन से बँधी लटुकिका (= गौरय्या) पक्षी वहीं बंध, बंधन या मरण की प्रतीक्षा करती है। उदायी! जो (आदमी) यह कहे—‘चूँकि वह लटुकिका पक्षी पूति-लता के बंधन से बँधी है, वह वहं बध, बंधन या मरण की प्रतीक्षा कर रही है; किन्तु उसका वह अबल बंधन है, दुर्बल बन्धन है, पूतिक (= सडा) बंधन है, असारक बंधन है।’ क्या उदायी! ऐसा कहते वह ठीक कह रहा है?”

“नहीं भन्ते! वह लटुकिका पक्षी जिस पूतिलता के बंधन से बँधी वहीं बध, बँधन या मरण की प्रतीक्षा कर रही है; वह उसके लिये बलवान् (= मजबुत) बंधन है ॰ स्थूल कलिगर है।”

“ऐसे ही उदायी! कोई कोई मोघपुरूष मेरे—‘यह छोडो’—कहने पर, ॰ स्थूल कलिगर है।

“किन्तु यहाँ उदायी! कोई कोई कुलपुत्र मेरे—‘यह छोडो’—कहने पर, ऐसा कहते हैं—‘इस छोटी बात, इस तुच्छ बात को छोडना क्या (बडी बात) है, जिसे छोडने के लिये भगवान् कह रहे हैं, जिसके त्याग के लिये सुगत करह रहे है’ और उसे छोड देते हैं, और मेरे विषय में विरक्ति उत्पन्न नहीं करते। जो सीख चाहने वाले भिक्षु हैं, वह उसे छोड निश्चिन्त हो, रोग गिराकर, परद-वृत्ति (= दूसरों के दिये से वृत्ति करने वाला) मृग के समान चित्त के साथ विहरते है। उदायी! उनके लिये वह अबल बंधन है ॰ असारक बंधन है। जैसे उदायी!=हरिस-जैसे दाँतो वाला महाकाय, संग्राम चारी, बडे मजबुत रस्सों से बँधा उत्तम जात का राजकीय नाग (= हाथी का पट्टा) थोडा ही शरीर घुमाने से उन बंधनों को तोड कर, छिन्न कर, जहाँ चाहे वहाँ चला जाये। उदायी! जो ऐसा कहे—॰ जो कि ॰ हाथी का पट्टा थोडा ही शरीर से घुमाने से जिन बंधनों को तोड कर ॰ जहाँ चाहे, वहाँ चला जाये; वह मजबुत बंधन हैं ॰ स्थूल कलिंगर है। ऐसा कहते हुये उदायी! क्या वही ठीक कह रहा है?”

“नहीं, भन्ते! ॰ राजा का नाग थोडा ही शरीर घुमाने से जिन बंधनों को तोड कर ॰ चला जाये, वह उसके लिये अबल बंधन है ॰ असारक बंधन है।”

“ऐसे ही उदायी! कोई कोई कुलपुत्र मेरे—‘यह छोडो’—कहने पर ॰ मृग के समान चित्त से विहरते है। उदायी! उनके लिये वह अबल बंधन है ॰ असारक बंधन है।”

“जैसे, उदायी! केाई दरिद्र धनहीन, अन्-आढय पुरूष हो, उसके पास एक कुरूप, कौआ-उडावन, टूटा फूटा घर हो, एक कुरूप टूटी फूटी खटोली हो, एक…घडे भर भरने लायक अनाज हो, एक कुरूपा मेहरिथा (= जायिका) हो। वह (संघ-) आराम में हाथ-पैर धो मनोज्ञ भोजन प्रहण कर शीतल छाया में बैठे ध्यानरत भिक्षु को देखे। उसको ऐसा हो—‘अहो, श्रमण-भाव (= संन्यासी होना) सुखमय है, अहो! श्रमण भाव निरोग है। अहो! कही मैं भी केश-दाढी मुँडा काषयवस्त्र पहिन घर छोड बेघर (= अनागरिक) हो प्रब्रहित हो जाता।’ किन्तु वह उस अपने कुरूप, कौआ-उडावन, टूटे फूटे घर को ॰ कुरूपा मेहरिया को छोड कर, केश-दाढी मुडा काषाय वस्त्र पहिन प्रब्रहित नहीं हो सके। उदायी! यदि कोई यह कहे—जिस बंधन से बँधा वह, उस अपने ॰ टूटे फूटे घर को ॰ एक कुरूपा मेहरयिा को छोड कर ॰ प्रब्रजित नहीं हो सकता; वह उसके लिये अबल बंधन है ॰ असारक बंधन है’ ऐसा कहते हुये उदायी! क्या वह ठीक कह रहा है?”

“नहीं, भन्ते! जिस बंधन से बँधा वह, उस अपने ॰ टूटे फुटे घर ॰ को छोड कर ॰ प्रब्रजित नहीं हो सकता, वह उसके लिये बलवान् बंधन है ॰ स्थूल कलिंगर है।”

“ऐसे ही उदायी! कोई कोई मोघपुरूष — मेरे ‘यह छोडो’—कहने पर, ॰ स्थूल कलिंगर है।

“जैसे उदायी! कोई गृहपति या गृहपति-पुत्र आढ्य, महाधनी, महाभोगवान् हो; (उसके पास) बहुत अशर्फियों (= निष्क) के ढेर का संचय हो, बहुत अनाज के ढेर का संचय हो, बहुत खेतों का संचय हो, बहुत घरों का संचय हो, बहुत मार्याओं का संचय हो, बहुत दासों ॰, ॰ दासियों ॰ का संचय हो। वह (संघ-) आराम में हाथ-पैर धो ॰ भिक्षु को देखे। उसको ऐसे हो—‘अहो! श्रमण-भाव ॰ घर से बेघर हो जाता है।’ और वह उस अपनी बहुत अशर्फियों के ढेर से संचय को ॰ बहुत दासियों के संचय को छोड कर, केशदाढी मुँडा ॰ प्रब्रजित हो सके। तो उदायी! यदि ऐसा कहे—जिस बंधन से बँधा वह; उस अपने ॰ दासियों के संचय को छोड कर प्रब्रजित हो सकता है, वह उसक मजबूत बंधन है ॰ स्थूल कलिंगर है। ऐसा कहते हुये उदायी! क्या वह ठीक कह रहा है?”

“नहीं, भन्ते! वह गृहपति ॰ जिस बंधन से बँधा, अपने ॰ दासियों के संचय को छोड कर, प्रब्रजित हो सकता है; वह इसके लिये अबल बंधन है ॰ असारक बंधन है।”

“उदायी! लोक में चार प्रकार के पुरूष —पुद्गल विद्यमान हैं। कौन से चार?—(1) यहाँ उदायी! एक पुद्गल उपधि (= भोग-इच्छा, भोग-संग्रह) के प्रहाण के लिये=उपधि के त्याग के लिये संलग्न होता है; तब उपधि-प्रहाण के लिये ॰ संलग्न उसे उपधि-संबंधी स्वर-संकल्प (= संकल्प) उत्पन्न होते हैं, वह उनको स्वीकार करता है, उनको छोडता नहीं, अलग नहीं करता, अन्त नहं करता, नाश नहीं करता। उदायी! इस पुद्गल को मैं संयोगी कहता हूँ, विसंयोगी नहीं। सो किस हेतु?—उदायी! ‘इस पुद्गल की इन्द्रिय (= मन का झुकाव) भिन्न हैं’—यह मुझे ज्ञात है। (2) यहाँ उदायी! एक पुद्गल उपधि प्रहाण के लिये ॰ संलग्न होता है; तब ॰ स्वर-संकल्प उत्पन्न होते हैं, वह उन्हं न स्वीकार (= स्वागत) करता है, न उनको छोडता है ॰। उदायी! इस पुद्गल को भी मैं संयोगी कहता हूँ, विसंयोगी नहीं। ॰ यह मुझे ज्ञात है। (3) यहाँ उदायी! ॰ स्वर-संकल्प उत्पन्न होते है। उदायी! (उसको) स्मृति (= होश) धीरे-धीरे (= दंधा) उत्पन्न होती है; फिर वह शीघ्र ही उन्हंें छोडता है ॰। जैसे उदायी! (कोई) पुरूष दिन की धूप में सन्तप्त लोहे के कडाह में दो या तीन पानी के छींटे डाले, उदायी! पानी की छींटो का गिरना धीरे धीरे होता है; (किन्तु) फिर वह शीघ्र नष्ट हो जाते है। ऐसे ही यहाँ उदाीय! कोई ॰ स्वर-संकल्प उत्पन्न होते है। ॰ शीघ्र ही उन्हें छोडता है ॰। उदायी! इस पुद्गल को भी मैं संयोगी कहता हूँ, विसंयोगी नहीं। ॰ यह मुझे ज्ञात है। (4) यहाँ उदायी! एक पुद्गल—‘उपधि दुःखों का मूल है’—यह जानकर, उपधि-रहित होता है, उपधि के क्षय के कारण विमुक्त होता है। उदायी! इस पुद्गल को मैं वि-संयोगी कहता हूँ, संयोगी नहीं। सो किस हेतु?—उदायी! इस पुद्गल की इंद्रिय भिन्न है’—यह मुझे ज्ञात है।

“उदायी! पाँच काम-गुण (= भोग) हैं। कौन से पाँच?—(1) चक्षु द्वारा ज्ञेय (= चक्षुर्विज्ञेय) इष्ट, कान्त, मनाप=प्रिय, कमनीय=रंजनीय रूप; श्रोत्र-विज्ञेय ॰ शब्द; घ्राण-विज्ञेय ॰ गंध; जिह्वा-विज्ञेय ॰ रस; काय-विज्ञेय ॰ स्प्रष्टव्य। उदायी! यह पाँच काम-गुण हैं। इन पाँच काम-गुणों को लेकर उदायी! जो सुख=सौमनस्य उत्पन्न होता है, वह काम-सुख=मीढ-सुख, पृथग्जन (= अज्ञ)-सुख, अनार्य-सुख कहा जाता है, (जो कि) असेवनीय=आभावनीय न-बहुली-करणीय (= न बढाने योग्य) है। ‘इस सुख से डरना चाहिये’—मैं कहता हूँ। यहाँ उदायी! भिक्षु कामों से विहरित ॰ प्रथम-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है ॰ द्वितीय-ध्यान ॰। ॰ तृतीय-ध्यान ॰। ॰ चतुर्थ-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। उदायी! यह निष्कामता (= काम-रहित) सुख है, प्रविवेक-सुख, उपशम-सुख, सम्बोध-सुख कहा जाता है; (जो कि) सेवनीय, भावनीय, बहुलीकरणीय है। ‘इस सुख से भय नहीं करना चाहिये’—मैं कहता हूँ।

“यहाँ उदायी! भिक्षु कामांे से विरहित ॰ प्रथम-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। उदायी! इसे मैं इंगित (= चंचल) कहता हूँ। वहाँ क्या इंगित है?—(यही) जो कि (इस ध्यान में) वितर्क, विचार नष्ट नहीं हुये रहते…। यहाँ उदायी! भिक्षु ॰ द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। उदायी! इसे मैं इंगित में कहता हूँ। (वहाँ क्या) इंगित है?—(यही) जो कि (इस ध्यान में) प्रीति-सुख निरूद्ध नहीं हुआ रहता…। ॰ तृतीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। ॰ जो कि (इस ध्यान में) उपेक्षा-सुख निरूद्ध नहीं हुआ रहता…। ॰ चतुर्थ-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। उदायी! मैं इसे अन्-इंगित (= चंचलता रहित) कहता हूँ।

“यहाँ उदायी! भिक्षु कामों से विरहित ॰ प्रथम-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। उदायी! इसे मैं अन्-अलं (= अपर्याप्त)—कहता हूँ, ‘छोड दो’—कहता हूँ, ‘अतिक्रमण कर जाओ’—कहता हूँ। इसके अतिक्रमण का उपाय क्या है?—यहाँ उदायी! ॰ द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। यह उसका समतिक्रम (= अतिक्रमण करने का उपाय) है। उदायी! इसे भी मैं ॰ ‘अतिक्रमण कर जाओ’ कहता हूँ। इसका समतिक्रम क्या है?—॰ तृतीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। यह उसका समतिक्रम है। इसे भी ॰ ॰ ‘अतिक्रमण कर जाओ’—कहता हूँ। इसका समतिक्रम क्या है?—॰ चतुर्थ-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। यह उसका समतिक्रम है। इसे भी ॰ ॰। ॰—आकाशानन्त्यायतन ॰। ॰ ॰ विज्ञानानन्त्यायतन ॰। ॰ ॰ आकिंचन्यायतन ॰। ॰ ॰ नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन को प्राप्त हो विहरता है। यह उसका समतिक्रम है। इसे भी उदायी! मैं अपर्याप्त ॰ कहता हूँ। क्या है, इसका समतिक्रम?—यहाँ उदायी! भिक्षु नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन को सर्वथा अतिक्रमण कर संज्ञा-वेदित-निरोध को प्राप्त हो विहरता है। यह उसका समतिक्रम है। इस प्रकार उदायी! मैं नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन के भी प्रहाण (= परित्याग) को कहता हूँ। उदायी! क्या ऐसा कोई छोटा-बडा (= अणु-स्थूल) संयोजन (= बंधन) देखते हो, जिसके प्रहाण को मैं नहीं कहता?”

“नहीं, भन्ते!”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् उदायी ने भगवान् के भाषण को अभिनंदित किया।

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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

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