MN 142
Dakkhiṇāvibhaṅga sutta: दक्खिणा-विभंग-सुत्तन्त
Dakkhiṇāvibhaṅgasutta
Vibhaṅgavagga
Översättningar
ऐसा मैंने सुना है —
एक समय भगवान् शाक्यों (के देश) में कपिल वस्तु के न्यग्रोधराम में विहार करते थे। तब महाप्रजापती गौतमी नये दुस्स (=धुस्से) के जोडे को लेकर, जहाँ भगवान् थे वहाँ आई। आकर भगवान् को अभिवदन कर एक ओर बैठ गई। एक ओर बैठी, महाप्रजापती गौतमी ने भगवान् को यो कहा—“भन्ते! यह अपना ही काता, अपना ही बुना, मेरा यह नया धुस्सा-जोडा भगवान् को (अर्पण है)। भन्ते! भगवान् अनुकम्पा (=कृपा) कर, इसे स्वीकार करे।”
ऐसा कहने पर भगवान् ने महाप्रजापती गौतमी से कहा—
“गौतमी! (इसे) संघ को दे दे। संघ को देने से मैं भी पूजित हूँगा , और संध भी।”
दूसरी बार भी ॰ कहा—“भन्ते यह ॰”।…“गौतमी! संघ को दे ॰”। तीसरी बार भी ॰।
यह कहने पर आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् से यो कहा—
“भन्ते! भगवान् महाप्रजापती गौतमी के धुस्सा-जोडे को स्वीकार करें। भन्ते! आपादिका (=अभिभाविका), पोषिका, क्षीर-दायिका (होने से), भगवान् की मौसी महाप्रजापती गौतमी बहुत उपकार करने वाली है। इसने जननी के मरन पर भगवान् को दूध पिलाया। भगवान् भी महाप्रजापती गौतमी के महोपकारक है। भन्ते! भगवान् के कारण महाप्रजापति ॰ बुद्ध की शरण आई, धर्म की शरण आई, संघ की शरण आई। भगवान् के कारण भन्ते! महाप्रजापती गौतमी प्राणातिपात (=हिंसा) से विरत हुई। अदत्तादान (=बिना दिये लेना=चोरी से) विरत हुई। काम-मिथ्याचार से ॰ मृषावाद से (=झूठ बोलना) से ॰। सुरा-मेरय (=कच्ची शराब)-मद्य-प्रमादस्थान (=प्रमाद करने की जगह) से ॰। भगवान् के कारण भन्ते! महाप्रजापति गौतमी बुद्ध में अत्यन्त श्रद्धा (=प्रसाद) युक्त, धर्म में अत्यन्त प्रसाद-युक्त, संघ में अत्यन्त प्रसाद-युक्त (हुई); आर्य (=उत्तम) कांत (=कमनीय=सुन्दर) शीलों से युक्त (हुई)। भगवान् के ही कारण भन्ते! ॰ दुःख से बेफिक्र हुई, दु‘ख-समुदय से ॰, दुःख-निरोध से ॰, दुःख-निरोध-गामिनी-प्रतिपद् से ॰। भगवान् भी भन्ते! महाप्रजापति गौतमी के महाउपकारक है।”
“आनन्द! यह ऐसा ही है, पुद्गल (=व्यक्ति=प्राणी) पुद्गल के सहारे बुद्ध का शरणागत होता है,
धर्म का ॰, संघ का ॰। लेकिन आनन्द! जो यह अभिवादन, प्रत्युपस्थान (=सेवा), अंजलि जोडना=समीची करना, चीवर, पिंड-पात, शयनासन, ग्लान (=रोगी) को पथ्य-औषध देना है, (इसे) मैं इस पुद्गल का उस पुद्गल के प्रति सुप्रतिकार (=प्रत्युपकार) नहीं कहता। जो (कि यह) पुद्गल (दूसरे) पुद्गल के सहारे प्राणातिपात ॰, अदत्तादान ॰, काम-मिथ्याचार ॰, मृषावाद ॰, सुरा-मेरय-मद्य-प्रमाद-स्थान से विरत होता है! आनन्द! जो यह अभिवादन ॰। जो यह आनन्द! पुद्गल के सहारे दुःख से बेफिक्र होता है ॰।
आनन्द! यह चैदह प्राति-पुद्गलिक (=व्यक्तिगत) दक्षिणायें (=दान) हैं। कौनसी चैदह? तथागत अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध को दान देता है; यह पहिली प्राति-पुद्गलिक दक्षिण है। प्रत्येक संबुद्ध को दक्षिणा देता है; यह दुसरी ॰। तथागत के श्रावक (=शिष्य) अर्हत् को ॰ तीसरी ॰। अर्हत्-फल के साक्षात् करने में लगे हुये को ॰ चैथी ॰। अनागामी को ॰ पाँचवी ॰। अनागामिफल साक्षत् करने में लगे हुये को ॰ छठीं ॰। सकृदागामी को ॰ सातवीं ॰। सकृदागामि-फल साक्षात् करने में लगे को ॰ आठवीं ॰। सोतापन्न को ॰ नवीं ॰। सोपापत्ति (=स्रोत आपत्ति) फल साक्षात् करने में लगे को ॰ दसवीं ॰। गाँव के बाहर के वीत-राग को ॰ ग्यारहवीं ॰। शीलवान् पृथग्जन (=स्रोत आपत्ति आदि को न प्राप्त) को ॰ बारहवीं ॰ दुःशील पृथग्जन को ॰ तेरहवीं ॰। तिर्यग्योनिगत (=पशु पक्षी आदि) को ॰ चैदहवीं ॰। वहाँ आनन्द! तिर्यग्योनि-गत को दान देने में सौ गुनी दक्षिणा की आशा रखती चाहिये। दुःशील पुथग्जन मे ॰ हजार गुनी ॰। शील-वान् पृथग्जन में ॰ सौ हजार ॰। ॰ सौ हजार करोड ॰। स्रोत आपत्ति फल साक्षात् करने में लगे को दान दे ॰ असंख्य (=अनगिनत) अप्रमेय (=प्रमाण रहित) दक्षिणा की आशा रखनी चाहिये। फिर स्रोतआपन्न की बात क्या कहती है? फिर सकृदागामी ॰? फिर अनागामी ॰? फिर अर्हत् ॰? फिर प्रत्येक-बुद्ध ॰? फिर तथागत अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध ॰?
“आनन्द! यह सात संघ-गत (=संघ में की) दक्षिणायें है। कौनसी सात? बुद्ध प्रमुख दोनों संघो को दान देता है; यह पहिली संघ-गत दक्षिणा है। तथागत के परिनिर्वाण पर दोनों संघों ॰ दूसरी ॰। भिक्षु-संघ को ॰ तीसरी ॰। भिक्षुणी-संघ को ॰ चैथी ॰। मुझे संघ इतने भिक्षु भिक्षुणी उद्देश करें (=दान देने के लिये दे), ऐसे दान देता है ॰ वह पाँचवी ॰। मुझे संघ में से इतने भिक्षु ॰ छठीं ॰। मुझे संघ में इतनी भिक्षुणियाँ ॰, सातवीं ॰।
“आनन्द! भविष्य काल में भिक्षु-नाम-धारी (=गोत्रभू), काषाय-मात्र-धारी (=काषाय-कंठ) दुःशील, पाप-धर्मा (=पापी) (भिक्षु) होंगे। (लोग) संघ के (नाम पर) उन दुःशीलों को दान देंगे। उस वक्त भी आनन्द! मैं संघ-विषयक दक्षिणा को असंख्येय, अपरिमित (फलवाली) कहता हूँ। आनन्द! किसी तरह भी संघ-विषयक दक्षिणा से प्राति-पुद्गलिक (=व्यक्तिगत) दक्षिणा को अधिक फल-दायक मैं नहीं मानता।
“आनन्द! यह चार दक्षिणा (=दान) की विशुद्धियाँ (=शुद्धियाँ) हैं। कौनसी चार? आनन्द! (कोई कोई) दक्षिणा तो दायक से परि-शुद्ध होती है, प्रति ग्राहक से नहीं। (कोई) दक्षिण प्रति-ग्राहक से परिशुद्ध होती है, दायक से नहीं। आनन्द! (कोई) दक्षिणान दायक से शुद्ध होती है, न प्रति-ग्राहक से। (कोई) दक्षिणा दायक से भी शुद्ध होती है प्रति ग्राहक से भी…। आनन्द! दक्षिणा कैसे दायक से शुद्ध होती है,…प्रतिग्राहक से नहीं…? आनन्द! जब दायक शलीवान् (=सदाचारी) और कल्याणधर्मा (=पुण्यात्मा) हो, और प्रति-ग्राहक हो दुःशील (=दुराचारी) पाप-धर्मा (=पापी); तो आनन्द! दक्षिणा दायक से शुद्ध होती है, प्रति ग्राहक से नही। आनन्द! कैसे दक्षिणा प्रति-ग्राहक से शुद्ध होती है, दायक से नहीं? आनन्द! जब प्रतिग्राहक शीलवान् और कल्याण-धर्मा हो, (और) दायक हो दुःशील, पाप-धर्मा ॰। आनन्द! कैसे दक्षिणा न दायक से शुद्ध होती है, न प्रति-ग्राहक से? आनन्द! जब दायक दुःशील, पाप-धर्मा हो, और प्रतिग्राहक भी दुःशील पाप-धर्मा हो। आनन्द! कैसे दक्षिणा दायक से भी शुद्ध होती है, और प्रतिग्राहक से भी? आनन्द! (जब) दायक शीलवान् कल्याण-धर्मा हो (और) प्रतिग्राहक भी शीलवान् कल्याण-धर्मा हो, तो ॰। आनन्द! यह चार दक्षिणा की विशुद्धियाँ है।”
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Må alla varelser vara lyckliga