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MN 83

Maghadeva sutta: मखादेव-सुत्तन्त

Maghadevasutta

Rājavagga

Översättningar

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् मिथिला में मखादेव-आम्रवन में विहार करते थे।

एक जगह पर भगवान् मुस्कुरा उठे। तब आयुष्मान् आनन्द को यह हुआ—“भगवान् के मुस्कुराने का क्या कारण है? क्या वजह है? तथागत बिना कारण के नहीं मुस्कुराते।” तब आयुष्मान् आनन्द चीवर को एक कंधे पर कर, जिधर भगवान् थे, उधर हाथ-जोड़ भगवान् से बोले—

“भन्ते! भगवान् के मुस्कुराने का क्या कारण है ॰?”

“आनन्द! पूर्वकाल में इसी मिथिला में मखादेव नामक धार्मिक, धर्म-राजा, राजा हुआ था। (वह) धर्म में स्थित महाराजा, ब्राह्मणों में, गृहपतियो में निगमों में, (=कस्बों, नगरों) में जनपदों (=दीहतों) में धर्म से बर्तता था। चतुर्दशी (=अमावास्या) पंचदशी पूर्णिमा, और पक्ष की अष्टमियों उपोसथ (=उपवास व्रत) रखता था।…

“(उसने अपने शिर में पके बाल देख) ज्येष्ठ पुत्र कुमार को…बुलवाकर कहा—

“तात! कुमार! मेरे देवदूत प्रकट हो गये, शिर में पके केश दिखाई पड रहे हैं। मैंने मानुष-काम (=भोग) भोग लिये अब दिव्य-भोगों के खोजने का समय है। आओ तात! कुमार! इस राज्य को तुम लो। मैं केश-श्मश्रु मुँडा, काषाय-वस्त्र पहिन, घर से बेघर हो प्रब्रजित होऊँगा। सो तात! जब तुम भी सिर में पके बाल देखना, तो हजाम को एक गाँव इनाम (=वर) दे, ज्येष्ठ-पुत्र कुमार को अच्छी प्रकार राज्य पर अनुशासन कर, केश-श्मश्रु मुँडा, वस्त्र पहिन ॰ प्रब्रजित होना। जिसमें यह मेरा स्थापित कल्याणवत्र्म (=कल्याण-वट्ट) अनुप्रवर्तित रहे; तुम मेरे अन्तिम पुरूष मत होना। तात कुमार! जिस पुरूष युगल के वर्तमान रहते इस प्रकार के कल्याण-वत्र्म (=मार्ग) का उच्छेद होता है, वह उनका अन्तिम पुरूष होता है।”

“तब आनन्द! राजा मखादेव नाई को एक गाँव इनाम दे, जेष्ठ-पुत्र कुमार को अच्छी तरह राज्यानुशासन कर, इसी मखादेव-अम्बवन में शिर-दाढी मुँडा ॰ प्रब्रजित हुआ।…वह चार ब्रह्म-विहारों की भावना कर शरीर छोड मरने के बाद ब्रह्मलोक को प्राप्त हुआ।…

“आनन्द! राजा मखादेव के पुत्र ने भी…,राज मखादेव की…परम्परा में पुत्र पौत्र आदि…इसी मखादेव-अम्बवन में केश-श्मश्रु मुँडा…प्रब्रजित हुये।…।निमि उन राजाओं का अन्तिम धार्मिक, धर्म-राजा, धर्म में स्थित महाराजा हुआ।…।

“आनन्द! पूर्वकाल में सुधर्मा नामक सभा में एकत्रित हुये त्रायस्त्रिंश देवों के बीच में यह बात उत्पन्न हुई—‘लाभ है अहो! विदेहों को, सुन्दर लाभ हुआ है विदेहों को; जिनका…निमि जैसा धार्मिक, धर्म-राजा, धर्म-स्थित महाराजा है; निमि भी आनन्द!…इसी मखादेव-अम्ब-वन-में प्रब्रजित हुआ…।

“आनन्द! राजा निमि का कलार-जनक नामक पुत्र हुआ। वह घर छोड बेघर हो प्रब्रजित नहीं हुआ। उसने उस कल्याण वत्र्म का उच्छिन्न कर दिया। वह उनका अन्तिम-पुरूष हुआ।

“आनन्द! इस समय मैने भी यह कल्याण-वत्र्म स्थापित किया है;(जो कि) एकांत-निर्वेद के लिये, विराग के लिये, निरोध के लिये=उपशम के लिये, अभिज्ञा के लिये, संबोधि (=बुद्धज्ञान) के लिये, निर्वाण के लिये है—(वह) यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है—जैसे कि—सम्यक्-दृष्टि, सम्यक्-संकल्प, सम्यक्-वाक ॰ कमान्त, ॰ आजीव, ॰ व्यायाम, ॰ स्मृति, सम्यक् समाधि। यह आनन्द! मैने कल्याण-वत्र्म स्थापित किया है ॰। सो आनन्द! मैं यह कहता हूँ ‘जिसमें तुम मेरे स्थापित कल्याण-मार्ग को अनुप्रवर्तित करना (=चलाते रहा); तुम मेरे अन्तिम-पुरूष मत होना…।’”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

Om den här översättningen

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Må alla varelser vara lyckliga