MN 105
Sunakkhatta sutta: सुनक्खत्त-सुत्तन्त
Sunakkhattasutta
Devadahavagga
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ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् वैशाली में महावन की कूटागारशाला में विहार करते थे।
उस समय बहुत से भिक्षुओने भगवान के पास (अपनी) आशा (निर्वाण शक्ति) बखानी थी। — “जन्म (आवागमन) ,खतम हो गया, ब्रह्मचर्य-वास पूरा हो गया, करना था सो कर लिया। और कुछ करने को यहाँ (बाकी) नहीं है — यह मैं जानता हॅूं।”
सुनक्खत्त (सुनक्षत्र) लिच्छवि-पुत्र ने सुना, कि बहुत से भिक्षुओं ने भगवान के पास आज्ञा बखानी है । तब सुनक्खत्त लिच्छवि-पुत्र, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया, जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे सुनक्खत्त ने भगवान् से यह कहा —
“भन्ते ! मैंने सुना, कि बहुत से भिक्षुओं ने भगवान् के पास आज्ञा बखानी है। भन्ते ! जिन भिक्षुओं ने भगवान् के पास आज्ञा बखानी है- , क्या भन्ते! उन्होंने ठीक ही आज्ञा बखानी है, या यहाँ कोई कोई भिक्षु (ऐसे भी) हैं, जिन्होंने अभिमान के लिये आज्ञा बखानी है ?”
“सुनक्खत्त! जिन भिक्षुओं ने मेरे पास आज्ञा बखानी है- , (उनमें) हैं ऐसे भिक्षु जिन्होंने ठीक ही आज्ञा बखानी है, हैं (उनमें) ऐसे भिक्षु भी जिन्होंने अभिमान (अतिमान) के लिये आज्ञा बखानी है। उनमें, सुनक्खत्त ! जिन भिक्षुओं ने ठीक ही आज्ञा बखानी है, उनका वह (कथन) वैसा ही है, किन्तु, जिन भिक्षुओं ने अभिमान के लिये आज्ञा बखानी है, उनके विषय में तथागत को ऐसा होता है — इन्हें धर्म उपदेशूँगा। और फिर यहाँ, कोई कोई मोघ-पुरूप प्रश्न बनाकर, तथागत के पास पूछते हैं। तब सुनक्खत्त ! जो कि तथागत को यह होता रहा- इन्हें धर्म उपदेशूँगा, उसमें भी फर्क पड जाता है।”
“भगवान ! इसी का काल है, सुगत! इसी का काल है, कि भगवान धर्म उपदेशें।
भगवान् से सुनकर भिक्षु धारण करेंगे।”
“तो, सुनक्खत्त ! सुनो, अच्छी तरह मनमें करो, कहता हॅूं।”
“अच्छा भन्ते ।”- (कह) सुनक्खत्त! लिच्छविपुत्र ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा- “सुनक्खत्त ! यह पाँच कामगुण हैं। कौनसे पाँच ? — (1) इष्ट ॰ चक्षुर्विज्ञेय रूप , शब्द, गंध, रस, स्प्रष्टव्य। सुनक्खत्त! यह पाँच काम-गुण हैं। हो सकता है, सुनक्खत्त ! यहाँ कोई पुरूष सांसारिक लाभ का इच्छुक (लोक-आमिप-अधिमुक्त) हो। सुनक्खत्त ! सांसारिक लाभ के इच्छुक पुरूष=पुद्गल की बात उसके अनुरूप ही होती है, उसके अनुरूप ही वह सोचता-विचारता है, वैसे ही पुरूष का सेवन करता है, वैसे ही के साथ संसर्ग रखता है। आनिंज्य (सुख-दुख से परे की समाधि) संबंधिनी कथा कही जाने पर नहीं सुनना चाहता, नहीं कान देता, न चित्त को उपस्थित करता है, न उस (वैसा कहने वाले) पुरूष को भजता है, न उसके साथ संसर्ग रखता है। जैसे, सुनक्खत्त ! कोई पुरूष अपने गाँव से था निगम से चिरकाल से प्रवासी हुआ हो, वह उस ग्राम या निगम से थोड़े ही दिन पूर्व आये पुरूष को देखे। वह उस पुरूष से उस ग्राम-निगम का कुशल-मंगल, सुभिक्षता, अरोगता पूछे। उसको वह पुरूष उस ग्राम निगम की, आरोगता बतलावे। तो क्या मानते हो, सुनक्खत्त ! क्या वह (चिरप्रवासी) पुरूष, उस (अचिरप्रवासी) पुरूष (की बात) को सुनना चाहेगा, काम देगा, चित्त को अन्यत्र से उपस्थित करेगा, उस पुरूष को भजेगा, उस पुरूष के साथ संसर्ग करेगा ?”
“हाँ, भन्ते !”
“ऐसे ही सुनक्खत्त ! सांसारिक लाभ के इच्छुक पुरूष = पुद्गल की बात उसके अनुरूप ही होती है। न उसके साथ संसर्ग करता है।”
“हो सकता है, सुनक्खत्त ! यहाँ कोई पुरूष आनिंज्य का अनुरागी (अधिमुक्त)। सुनक्खत्त ! आनिंज्य-अनुरागी पुरूष की कथा उसके अनुरूप होती है। वैसे ही के साथ संसर्ग रखता है। सांसारिक-लाभ-संबंधिनी कथा कही जाने पर नहीं सुनना चाहता। न उसके साथ संसर्ग रखता है। जैसे, सुनक्खत्त ! ढ़ेपी से टूटा पीला पत्ता फिर होने के अयोग्य है, ऐसे ही सुनक्खत्त ! “आनिंज्य-अनुरागी पुरूष, के जो सांसारिक-लाभ के फंदे थे, वह टूट गये। उसे ऐसा कहना चाहिये- आानिंज्यानुरागी पुरूष, सांसारिक-लाभ के बंधनों से बेजुड़ा है।
“हो सकता है, सुनक्खत्त! यहाँ कोई पुरूष आकिंचन्य-आयतन-अनुरागी हो। सुनक्खत्त ! आकिंचन्यायतनानुरागी पुरूष की कथा उसके अनुरूप होती है। आनिंज्य-संबंधिनी कथा कही जाने पर नहीं सुनना चाहता। न उस (कहनेवाले) के साथ संसर्ग रखता है। जैसे, सुनक्खत्त ! कोई दो टुकडे हुई शिला न-जुडनेवाली होती है, ऐसे ही सुनक्खत्त ! आंकंचन्यायतनानुरागी पुरूष, आनिंज्य-बंधनों से बेजुडा है।
“हो सकता है, सुनक्खत्त !नैवसंज्ञा-नासंज्ञा-आयतन-अनुरागी हो। जैसे, सुनक्खत्त ! भोजन कर चुका पुरूष मनोज्ञ भोजन को वमन करदे। तो क्या सुनक्खत्त ! उस पुरूष की उस उवान्त के खाने की फिर इच्छा होगी?”
“नहीं, भन्ते !”
“सो क्यों?”
“भन्ते ! वह उवान्त घृणा की चीज है।”
“ऐसे ही, सुनक्खत्त ! नैव संज्ञा-नासंज्ञायतनानुरागी पुरूष, आकिंचन्यायतन के बंधनों से बे-जुडा है।
“हो सकता है, सुनक्खत्त ! सम्यक्-निर्वाण-अनुरागी हो। जैसे, सुनक्खत्त ! शिर कटा ताड फिर बढने लायक नहीं होता। ऐसे ही सुनक्खत्त ! सम्यक्-निर्वाणानुरागी पुरूष, के जो नैव-संज्ञा-नासंज्ञायतन-सम्बन्धी फंदे थे, वह छिन्न हो गये, उन्मूलित हो गये, शिर-कटे ताड़ जैसे हो गये, अभाव को प्राप्त हो गये, भविष्य में न उगने-लायक हो गये। उसे ऐसा समझना चाहिये — सम्यक्-निर्वाणानुरागी पुरूष, नैवसंज्ञा-नासंज्ञा-यतन के बंधनों से बे-जुडा है।
“हो सकता है, सुनक्खत्त ! कि किसी भिक्षुको ऐसा हो- श्रमण (बुद्ध) ने तृष्णा को शल्य (बाण का कर) कहा है, अविद्या को विप-दोष, जो कि छनद-राग (लोभ) और व्याप (द्रोह,द्वेष) से रोपी जाती है। सो उस तृष्णा (रूपी) शल्य को मैंने फेंक दिया अविद्या (रूपी) विष दोष को हटा दिया। वैसा न होते ही मैं सम्यक्-निर्वाण-अनुरागी हॅूं- ऐसा माननेवाला (एवं मानी) हो। और वह, जो धर्म (बातें) कि सम्यक्-निर्वाणानुरागी पुरूष के लिये अ-हित (अ-सप्पय) हैं, उनमें लग्न हो, आँख से अ-हित रूप को देखकर, (उसमें) अनुयुक्त हो, कान से अहित शब्द को सुनकर, (उसमें) अनुयुक्त हो, काया से अ-हित स्प्रष्टव्य को स्पर्श कर उसमें अनुयुक्त हो, मनसे अहित धर्म को जानकर उसमें अनुयुक्त हो। तब आँख से अ-हित रूपमें अनुयुक्त होते। मन से अहित धर्म में अनुयुक्त होते, उसके चित्त राग ध्वस्त करे। वह रागके द्वारा ध्वस्त चित्त से मरण को प्राप्त हो, या मरण-तुल्य दुःख को।
“जैसे, सुनक्खत्त ! कोई पुरूष गाढे़ विष के बुझे शल्य से विधा हो। उसके यार-दोस्त-भाईबंद शल्यकर्ता भिषक् को ला उपस्थित करे। वह शल्यकर्ता भिषक् शस्त्र के घाव के मुख के चारों ओर से काटदे, फिर ऐपणी (औजार) से खोजकर शल्य को निकालदे, फिर निःशेष विष-दोष को दूर करे। (फिर) वह (रोगीको) ऐसा कहे- हे पुरूष! तेरा शल्य निकल गया, विष-दोष निःशेषकरके हटा दिया गया, तब तुझे खतरा नहीं। (किन्तु) (1) तू पथ्य (सप्पाय) भोजन ही को खाना, अ-पथ्य भोजन के खाने से, कहीं तेरा घाव बहने न लगे। (2) समय-समय पर घाव को धोना (3) समय समय पर व्रण-मुख के न धोने से, समय समय पर व्रणमुख के न लेप करने से , कहीं पीव-लोहू तेरे व्रण-मुख में न भर जाये। (4) हवा-धूप में चलना-फिरना मत, हवा-धुप में चलने फिरने से कही मैल-टूँड तेरे व्रण-मुख (घाव) में न चले जाये। हे पुरूष ! (5) घाव की हिफाजत करना, (तब) उस (रोगी) को ऐसा हो- शल्य निकल गया, विष-दोष निःशेष हट गया। अब मुझे खतरा नहीं। (और) वह अपथ्य भोजन खाये। अपथ्य भोजन करने से उसका घाव बहने लगे। वह समय समय पर न घाव को धोवे, न लेप करे। न धोवे, न लेपने से उसकी घाव में पीव-लोहू भर जाये। वह हवा-धूप में चले-फिरे, चलने-फिरने से उसकी घाव में मैल-टूँड (रज-शूक) चले जाये। वह न घाव की हिफाजत करे, उसकी इस अपथ्य क्रिया, और उस सशेष विष-दोषापनयन- इन दोनों से घाव भारी हो जाये। वह घाव के भारी होने से मरण को प्राप्त होवे, या मरण-तुल्य दुःख को। ऐसे ही सुनक्खत्त ! हो सकता है किसी भिक्षुको ऐसा हो- श्रमण ने तृष्णा को शल्य कहा है। वह रागद्वारा ध्वस्त चित्त से मरण को प्राप्त हो, या मरण-तुल्य दुःख को।
“हो सकता है, सुनक्खत्त ! कि किसी भिक्षु को ऐसा हो- श्रमण ने तृष्णा को शल्य कहा है। वैसा होते- मैं सम्यक्-निर्वाण-अनुरागी हॅूं- ऐसा समझनेवाला। और वह, जो धर्म कि सम्यक्-निर्वाणानुरागी पुरूष के लिये अहित है, उनमें लग्न न हो, आँख से अहित रूप को देखकर उसमें अनुयुक्त (लग्न) न हो, मन से अहित धर्म को जानकर उसमें अनुयुक्त न हो। अनुयुक्त न होते उसके चित्त को राग न ध्वस्त करे। वह राग द्वारा न ध्वस्त हुये चित्त से न मरण को प्राप्त हो, न मरण-तुल्य दुःख को।
“जैसे, सुनक्खत्त ! कोई पुरूष गाढे विषमें बुझे शल्य से बिधा हो। निःशेष विषदोश को दूर करे, (फिर) वह ऐसा कहे- हे पुरूष ! घाव की हिफाजत करना, । वह पथ्य भोजन खाये, पथ्य भोजन खाने से उसका न बहने लगे, पीव-लोहु न भरे, घाव में मैल-टूँड न जाये। वह घाव की हिफाजत करे। उसकी इस पथ्य-क्रिया और उस निःशेष विषदोषापनयन- इन दोनों से घाव न बढे। वह छवि (ऊपरी चमडा)-सहित भरे घाव के कारण न मरण को प्राप्त हो, न मरण-तुल्य दुखको। ऐसे ही सुनमखत्त ! हो सकता है, किसी भिक्षुको ऐसा हो- श्रमण ने तृष्णा को शल्य कहा है। वह रागद्वारा न ध्वस्त हुये चित्त से न मरण को प्राप्त हो न मरण-तुल्य दुःख को।
“सुनक्खत्त ! अर्थ (बात) को समझाने के लिये मैंने यह उपमा दी है। यहाॅं यह अर्थ है- घ्रण (घाव) यह छः आध्यात्मिक (शरीर संबंधी) आयतनों का नाम है। विष-दोष यह अविद्या का नाम है। शल्य यह “तृष्णा का नाम है। ऐषणा यह स्मृति (होश रखने) का नाम है। शस्त्र यह “आर्य-प्रज्ञा का नाम है। शल्यकर्ता भिषक् यह तथागत-अर्हत् सम्यक् संबुद्ध का नाम है।
“सुनक्खत्त ! जो भिक्षु छः स्पर्शायतनों (चक्षु,श्रोण,घ्राण, जिव्हा, काय, मन) के विषयों में संयमी है। उपाधि (विषय-संग्रह) दुःख का मूल है। इसे जान उपाधि-रहित हो, उपाधि के क्षय से मुक्त हो गया है, वह उपाधि में काया को लगायेगा, या चित्त को देगा, यह समय नहीं। जैसे, सुनक्खत्त! आबखोरा (आपानीय-कांस) वर्णवान् (सुन्दर वर्ण), गंधवान् हो, (किन्तु) विष से लिप्त हो। तब कोई जीवन का इच्छुक, मरण का अनिच्छुक नहीं, सुखाकांक्षी, दुःख-विरोधी पुरूष आवे। तो क्या मानते हो, सुनक्खत्त ! क्या वह पुरूष उस आवखारेमें पियेगा। यदि जानता है, कि इससे पीने से मरण को प्राप्त होऊॅंगा, या मरण-तुल्य दुःख को ?”
“नहीं, भन्ते !”
“ऐसे ही, सुनक्खत्त ! जो भिक्षु छः स्पर्शायतनों में संयमी है। वह उपधि में काया को लगायेगा, या चित्त को देगा, यह संभव नही।
“जैसे, सुनक्खत्त! ज्हरीला साँप (आशीविष) हो। तब कोई जीवन का इच्छुक, पुरूष आवे। तो क्या मानते हो, सुनक्खत्त ! क्या वह पुरूष उस जहरीले (घोर विष) साँप को अपना हाथ या अॅंगुली देगा, यदि जानता है, कि इसके डसने से मैं मरण को प्राप्त होऊॅंगा या मरण-तुल्य-दुःख को ?”
“नहीं, भन्ते !”
“ऐसे ही सुनक्खत्त ! जो भिक्षु छः स्पर्शायतनों में संयमी है। वह उपधि में काया को लगायेगा, या चित्त को देगा, यह संभव नहीं। ”
भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो, सुनक्खत्त लिच्छविपुत्र ने भगवान् के भाषण को अभिनन्दित किया।
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
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