MN 115
Bahudhātuka sutta: बहु-धातुक-सुत्तन्त
Bahudhātukasutta
Anupadavagga
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ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथ-पिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।
तब भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओ!”
“भदन्त!” (कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओं! जो कोई भय उत्पन्न होता है, वह सभी बाल (=मूर्ख) से ही उत्पन्न होता है, पंडित से नही। जो कोई उपद्रव उत्पन्न होते हैं, वह सभी बाल से ही उत्पन्न होते है, पंडित से नही। जो कोई उपसर्ग (=दिक्कले) ॰। जैसे, भिक्षुओं! तृण के घर या नरकट (=नल) के घर से निकली आग सुंदर लिये, वायुरहित, कुंडे लगे, खिडकी-किवाड-बंद कूटागारों (=महलो) को जला देती है; इसी प्रकार भिक्षुओं! जो कोई भय ॰ पंडित से नहीं। इस प्रकार, भिक्षुओ! बाल स-भय है, पंडित अ-भय; बाल स-उपद्रव हैं, पंडित अन्-उपद्रव; बाल स-उपसर्ग हैं, पंडित अन्-उपसर्ग। भिक्षुओं! पंडित से भय नहीं, पंडित से उपद्रव नहीं, ॰ उपसर्ग नही। इसलियें भिक्षुओं!—‘हम पंडित=विमर्शक (=मीमांसक) होंगे’—यह तुम्हें सीख लेनी चाहिये।”
ऐसा कहने पर आयुष्मान् आनंद ने भगवान् से यह कहा—“भन्ते! कितने से भिक्षु को पंडित=विमर्शक कहा जा सकता है?”
“आनन्द! जब भिक्षु धातु-कुशल (=धातु का सुंदर जानकार) होता है, आयतन-कुशल ॰, प्रतीत्य-समुत्पाद-कुशल ॰, स्थान-अस्थान-कुशल होता है। इतने से, आनन्द! भिक्षु को पंडित कहा जा सकता है। आनन्द! यह अठारह धातुयें हैं—(1) चक्षु धातु, (2) रूप ॰, (3) चक्षुर्विज्ञान धातु, (4) श्रोत्र ॰, (5) शब्द ॰, (6) श्रोत्र-विज्ञान ॰, (7) घ्राण ॰, (8) गंध ॰, (9) घ्राण-विज्ञान ॰, (10) जिह्वा ॰, (11) रस ॰, (12) जिह्वा-विज्ञान ॰, (13) काय ॰, (14) स्प्रष्टव्य ॰, (15) काय-विज्ञान ॰, (16) मनोधातु, (17) धर्म-धातु, (18) मनोविज्ञान-धातु। आनन्द! इन अठारह धातुओं को जानता-देखता है, तब भिक्षु को धातु-कुशल कहा जा सकता है।
“क्या, भन्ते! और भी पर्याय (=विकल्प) है, जिससे कि भिक्षु धातु-कुशल कहा जा सके?”
“हैं, आनन्द! यह छः धातुयें हैं—(1) पृथिवीधातु, (2) आप (=जल)-धातु, (3) तेज ॰, (4) वायु ॰, (5) आकाश ॰, (6) विज्ञान-धातु। आनंद! जब भिक्षु इन छः धातुओं को जानता देखता है; इतने से भी…धातु-कुशल कहा जा सकता है।”
“क्या, भन्ते! और भी पर्याय है ॰?”
“हैं, आनंद! यह छः धातुयें हैं—(1) सुख-धातु, (2) दुःख ॰, (3) सौमनस्य ॰, (4) दौर्मनस्य ॰, (5) उपेक्षा ॰, (6) अविद्या-धातु। आनंद! जब भिक्षु ॰।
“क्या भन्ते! और भी पर्याय है ॰?”
“है, आनंद! यह छः धातुयें (चित्त) हैं—(1) कामधातु, (2) निष्काम ॰, (3) व्यापाद ॰, (4) अ-व्यापाद ॰, (5) विहिंसा ॰, (6) अ-विहिंसा-धातु। आनंद! जब भिक्षु ॰।”
“क्या, भन्ते! और भी पर्याय है ॰?”
“हैं, आनंद! यह तीन धातुयें (=लोक) हैं—(1) काम-धातु, (2) रूप-धातु, (3) अ-रूप-धातु। आनंद! जब भिक्षु ॰।”
“क्या, भन्ते! और भी पर्याय है ॰?’
“हैं, आनंद! यह दो धातुयें (=लोक) हैं—(1) संस्कृत (=कृत) धातु, और (2) अ-संस्कृत-धातु। आनंद! जब भिक्षु ॰।”
“कितने से, भन्ते! भिक्षु को आयतन-कुशल कहा जा सकता है?’
“आनंद! यह आध्यात्मिक (=शरीर के भीतर के) बाह्य आयतन हैं—(1) चक्षु और रूप, (2) श्रोत्र और शब्द, (3) घ्राण और गंध, (4) जिह्वा और रस, (5) काय और स्प्रष्टव्य, (6) मन और धर्म। आनंद जब भिक्षु ॰।”
“कितने से, भन्ते! भिक्षु को प्रतीत्य-समुत्पाद कुशल कहा जा सकता है?’
“आनंद! यहाँ भिक्षु यह जानता है—‘इसके होने पर यह होता हैं’; ‘इसके उत्पन्न होने पर यह उत्पन्न होता है’। ‘इसके न होने पर यह नहीं होता’; ‘इसके निरोध (=नाश) होने पर इसका निरोध होता है।’ जो कि यह अविद्या के कारण संस्कार, संस्कार के कारण विज्ञान, विज्ञान के कारण नाम-रूप, नाम-रूप के कारण षड्-आयतन, षड्-आयतन के कारण स्पर्श, स्पर्श के कारण वेदना, वेदना के कारण तृष्णा, तृष्णा क कारण उपादान, उपादान के कारण भव, भव के कारण जाति, जाति के कारण जरा-मरण, शोक-रोना काँदना, दुःख-दौर्मनस्य, हैरानी-परेशानी उत्पन्न होती है। इस प्रकार इस केवल दुःख-पुंज की उत्पत्ति होती है। अविद्या के अशेष विराग, और निरोध से संस्कार का निरोध होता है, संस्कार-निरोध्या से विज्ञान-निरोध, विज्ञान-निरोध से नाम-रूप का निरोध, नाम-रूप के निरोध से षड्-आयतन का निरोध, षड्-आयतन के निरोध से स्पर्श-निरोध, स्पर्श-निरोध से वेदना-निरोध, वेदना-निरोध से तृष्णा का निरोध, तृष्णा-निरोध से उपादान-निरोध, उपादान-निरोध से भव-निरोध, भव-निरोध से जाति का निरोध, जात-निरोध से जरा-मरण, शोक परिदेव, दुःख-दौर्मनस्य, उपायास का निरोध होता है। इस प्रकार इस केवल दुःख-पुंज (आवागमन) का निरोध होता है। इतने से, आनंद! भिक्षु को प्रतीत्य-समुत्पाद-कुशल कहा जा सकता है।
“आनन्द! ‘इसका स्थान नहीं, इसके लिये अवकाश नहीं, कि दृष्टि-प्राप्त (=सच्चे दर्शन को जानने वाला) पुद्गल (=पुरूष) किसी संस्कार (=क्रिया, कृति) को नित्य के तौर पर ग्रहण करें’—इस स्थान को जानता है। इसके लिये स्थान हैं, कि पृथग्जन (=अज्ञ) किसी संस्कार को नित्य के तौर पर ग्रहण करे—इसे जानता है। ‘अ-स्थान है, अवकाश नहीं, कि दृष्टि-प्राप्त पुद्गल किसी संस्कार को सुख के तौर पर ग्रहण करें’—इसका स्थान नहीं (=अ-स्थान) इसे जानता है। ‘स्थान हैं, अवकाश है, जो पृथग्जन किसी संस्कार को सुख के तौर पर ग्रहण करें—यह स्थान (=संभव) हैं—इसे जानता है। ‘अस्थान है=अनवकाश है, कि दृष्टि-प्राप्त पुद्गल किसी धर्म को आत्मा के तौर पर ग्रहण करें—यह स्थान नहीं है’—इसे जानता है। ‘स्थान है ॰ जो पृथग्जन किसी धर्म को आत्मा के तौर पर ग्रहण करें—यह स्थान है’—इसे जानता है। ‘अस्थान (=अ-संभव हैं), अनवकाश हैं, जो दृष्टि-प्राप्त माता की हत्या करे—यह स्थान नहीं हैं—इसे जानता है। ‘स्थान है, अवकाश है, जो पृथग्जन माता की हत्या करे—यह स्थान हैं’—इसे जानता है। ‘अ-स्थान ॰, जो दृष्टि-प्राप्त पिता की हत्या करें—॰’ इसे जानता है। ‘स्थान है ॰ जो पृथग्जन पिता की हत्या करें—॰—इसे जानता है। ‘अस्थान है ॰ जो दृष्टि-प्राप्त दुष्ट चित्त से तथागत के (शरीर से) लोहू निकाले—॰ इसे जानता है। ‘स्थान है ॰ जो पृथग्जन ॰ लोहू निकाले—॰ इसे जानता है। ‘अस्थान हैं ॰ जो दृष्टि-प्राप्त संघ-भेद (=संघ में फूट) करे—॰ यह जानता है। ‘स्थान है ॰ जो पृथग्जन संघ-भेद करें—॰ यह जानता है। ‘अस्थान है ॰, जो दुष्टि-प्राप्त ॰ (बुद्ध को छोड) दूसरे को अपना शास्ता (=गुरू) बनावे—॰—यह जानता है। ‘स्थान है, जो पृथग्जन ॰ दूसरे को शास्ता बनावे—॰—यह जानता है। ‘अ-स्थान है ॰ जो एक लोक-धातु (=लोक) में पूर्व-पश्चात् न हो (एक काल में) दो अर्हत्-सम्यक्-संबुद्ध उत्पन्न हो—यह स्थान नहीं—इसे जानता है। ‘स्थान हैं ॰, जो एक लोक धातु में एक अर्हत् सम्यक् संबुद्ध उत्पन्न हों—यह स्थान है’—इसे जानता है। ‘अस्थान है ॰, जो एक लोक में धातु में एक काल में (=पूर्व-पीछे नहीं) दो राजा चक्रवर्ती उत्पन्न हों—॰—यह जानता है। ‘स्थान है ॰, जो एक लोक धातु में एक-काल में एक राजा चक्रवर्ती उत्पन्न हो—॰.—इसे जानता है। ‘अ-स्थान हैं ॰, जो स्त्री अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध हो—॰—॰। ‘स्थान है ॰, जो पुरूष अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध हो—॰—॰। ‘अस्थान है ॰, जो स्त्री राजा चक्रवर्ती है—॰—॰। ‘स्थान है ॰, जो पुरूष राजा चक्रवर्ती हो—॰—॰। ‘अस्थान है ॰, जो, स्त्री शक्र-पद, मार (=प्रजापति) पद या ब्रࢩमा के पद पर आरूढ हो—॰—॰। ‘स्थान है ॰, जो पुरूष शक्रपद॰—॰—॰। ‘अस्थान है ॰, जो कायिक दुराचार इष्ट=कान्त=मनाप (=प्रिय) विपाक हो—॰—॰। ‘स्थान है ॰, जो ॰ अन्-इष्ट=अ-कान्त=अ-मनाप विपाक हो॰—॰। अस्थान है ॰, जो वाग्-दुश्चरित का इष्ट ॰—॰—॰। स्थान है ॰, जो वाग्-दुश्चरित (=वाचिक दुराचार) का अनिष्ट ॰—॰—॰। अस्थान है ॰, जो मनो दुश्चरित इष्ट ॰—॰—॰। स्थान है ॰, जो मनो दुश्चरित का अनिष्ट ॰—॰—॰। अस्थान है ॰ जो काय-सुचरित का अनिष्ट ॰—॰—॰। स्थान है ॰, जो वाक्-सुचरित का इष्ट ॰—॰—॰। अस्थान है ॰, जो मनः सुचरितका अनिष्ट ॰ विपाक हो—॰—॰। स्थान है ॰, जो मनःसुचरित का इष्ट ॰ विपाक हो—॰—॰। अस्थान है ॰, जो काय-दुश्चरित से युक्त होते काया छोड मरने के बाद सुगति=स्वर्गलोक में उत्पन्न हो, यह स्थान नहीं—यह जानता है। स्थान है ॰, जो ॰ अपाय=दुर्गति=विनिपात, नरक में उत्पन्न हो—यह स्थान है—यह जानता है। अस्थान है ॰, जो वाग्-दुश्चरित ॰ स्वर्ग में —॰—॰। स्थान है ॰, जो वाग्-दुश्चरित ॰ नरक में ॰—॰—॰। अस्थान हे ॰, जो मनो-दुश्चरित ॰ स्वर्ग में—॰—॰। स्थान है ॰, जो मनोदुश्चरित ॰—नरक में—॰—॰। अस्थान है ॰, जो काय-सुचरित से युक्त होते…, काया छोड मरने के बाद अपाय=दुर्गति=विनिपात=नरक में उत्पन्न हो—यह स्थान नहीं—जानता है। स्थान है ॰, जो काय-सुचरित ॰, सुगति, स्वर्गलोक मंे उत्पन्न हो—यह स्थान है—यह जानता है। अस्थान है ॰, जो वाक्-सुचरित ॰, नरक में —॰—॰। स्थान है ॰, जो ॰ स्वर्ग में—॰—॰। अस्थान है ॰, जो मनःसुचरित ॰, नरक में—॰—॰। स्थान है ॰, जो मन‘सुचरति ॰—स्वर्ग में—॰—॰।
“आनंद! इतने से भिक्षु स्थान-अस्थान में कुशल कहा जा सकता है।”
ऐसा कहने पर आयुष्मान् आनंद ने भगवान् को यह कहा—
“आश्चर्य! भन्ते! अद्भूत!! भन्ते! किस नाम का भन्ते! यह धर्म-पर्याय (=धर्म उपदेश) है?”
“तो आनन्द! तू इस धर्म पर्याय को बहुधातुक यह भी धारण कर सकता है। चतुःपरिवर्त यह भी ॰। धर्मादर्श यह भी ॰। अमृतदुन्दुभि यह भी ॰। अनुत्तर-संग्राम-विजय यह भी ॰।”
भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् आनंद ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
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