MN 124
Bākula sutta: वक्कुल-सुत्तन्त
Bākulasutta
Suññatavagga
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ऐसा मैंने सुना —
एक समय आयुष्मान् वक्कुल राजगृह में वेणुवन कलन्दक निवाप में विहार करते थे।
तब आयुष्मान् वक्कुल का पहिले गृही होते वक्त का मित्र अचेल (=नग्न) काश्यप, जहाँ आयुष्मान् वक्कुल थे, वहाँ गया, जाकर आयुष्मान् वक्कुल के साथ…संमोदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे अचेल काश्यप ने आयुष्मान् वक्कुल से यह कहा—
“आवुस वक्कुल! प्रब्रजित (संन्यासी) हुये कितना समय हुआ?”
“आवुस! मुझे प्रब्रजित हुये अस्सी वर्ष हो गये।”
“आवुस! प्रब्रजित हुये इन अस्सी वर्षो में कितनी बार तुमने मैंथुन सेवन किया?”
“आवुस काश्यप! मुझे इस तरह नहीं पूछना चाहिये—‘॰ कितनी बार तुमने मैथुन सेवन किया?’” आवुस काश्यप! मुझसे इस प्रकार पूछना चाहिये—‘॰ कितनी बार काम-संज्ञा (=काम का ख्याल) उत्पन्न हुई?’—आवुस काश्यप! (=एक बार भी) काम-संज्ञा उत्पन्न होना मैं नही जानता।
“जो कि (आप) आयुष्मान् वक्कुल प्रब्रजित हुये इन अस्सी वर्षो में काम-संज्ञा का उत्पन्न होना भी नहीं जानते; इसे हम आयुष्मान् वक्कुल का आश्चर्य=अद्भुत धर्म धारण करते (=समझते) है।”
“आवुस! अपने प्रब्रजित हुये इन अस्सी वर्षो में व्यापाद (=द्वेष) संज्ञा उत्पन्न होने को नहीं जानता।”
“॰ इसे भी हम आयुष्मान् वक्कुल का आश्चर्य-अद्भुत धर्म समझते है।”
“॰ विहिंसा (=हिंसा) संज्ञा ॰ नहीं जानता। ” “इसे भी ॰।”
“॰ काम-वितर्क (=काम संबंधी विचार) ॰ नहीं जानता।” “इसे भी ॰।”
“॰ व्यापाद-वितर्क ॰ नहीं जानता।” “इसे भी ॰।”
“॰ विहिंसा-वितर्क ॰ नहीं जानता।’ “इसे भी ॰।”
“॰ गृहपति-चीवर सेवन किया नहीं जानता।” “इसे भी ॰।”
“॰ शस्त्र (=कैंची आदि) से चीवर का काटना नहीं जानता।” “इसे भी ॰।”
“॰ सूई से चीवर का सीना नहीं जानता।” “इसे भी ॰।”
“॰ कठीन चीवर का सीना नहीं जानता।”—“इसे भी ॰।”
“॰ सब्रह्मचारियों के चीवर बनाने को सीना नहीं जानता।”—“इसे भी ॰।”
“॰ निमन्त्रण खाना नहीं जानता।”—“इसे भी ॰।”
“॰ अहो! मुझे कोई निमंत्रित करे, इस प्रकार चित्त को उत्पन्न होना भी नहीं जानता।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ अन्तर-घर (=गृहस्थ के घर) में बैठने को नहीं जानता।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ मातृ-ग्राम (=स्त्रियों) के आकार प्रकार को ख्याल में लाने को नहीं जानता।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ मातृग्राम को चार पद की गाथा तक उपदेश धर्म को नहीं जानता।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ भिक्षुणियों के निवास (=उपश्रय) में जाने को भी नहीं जानता।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ भिक्षुणियों को धर्म उपदेशने को ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ शिक्षमाणा को धर्म उपदेशने को ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ श्रामणेरी को धर्म उपदेशने को ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ (किसी को) प्रब्रज्या दी ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ उपसम्पदा दी ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ निःश्रय (=गुरू बनना) देने को ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ श्रामणेर से सेवा लेने को ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ जन्ताघर (=स्नानघर) में नहाने को ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ (स्नानीय) चूर्ण से नहाने को ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ सब्रह्मचारियों से देह मलवाने को ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ क्षण भर के लिये भी बीमारी की उत्पत्ति को ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ हर्रै के टुकडे भर भी औषध खाने को ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ अपश्रयण (=खाट) बिछाने को ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ शय्या पर सोने को ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“॰ वर्षा में गाँव के भीतर निवास को ॰।”—‘इसे भी ॰।”
“आवुस! सप्ताह भर ही मैंने स-रण (=चित्त-मल युक्त=अन्-अर्हत्) हो राष्ट्र-पिंड खाया,, फिर आठवें दिन आज्ञा (=अर्हत्व) उत्पन्न हुई।”—“यह भी ॰।”
“आवुस वक्कुल! इस धर्म-विनय (=धर्म) में मैं प्रब्रज्या पाऊँ, ॰ उपसंपदा पाऊँ।”
अचेल काश्यप ने इस धर्म में प्रब्रज्या पाई, उपसंपदा पाई। आयुष्मान् काश्यप उपसंपदा पाने के थोडे ही समय बाद, एकाकी ॰ और कुछ यहाँ करने को नहीं रहा’—यह जान गये। आयुष्मान् काश्यप अर्हतों में से एक हुये।
तब पीछे एक समय आयुष्मान् वक्कुल कंजी (=अपापूरण) ले (एक) विहार से (दूसरे) विहार में जा कहते थे—“निकलो आयुष्मानों! निकलो, आयुष्मानों! आज मेरा परिनिर्वाण होगा।”
जो कि आयुष्मान् वक्कुल कुंजी ले विहार से विहार में जा कहते थे—‘निकलो ॰ परिनिर्वाण होगा’—यह भी हम आयुष्मान् वक्कुल का आश्चर्य अद्भुत धर्म समझते है। आयुष्मान् वक्कुल भिक्षु-संघ के बीच में बैठे बैठे परिनिर्वाण को प्राप्त हुये। यह भी हम आयुष्मान् वक्कुल का आश्चर्य अद्भुत धर्म समझते है।
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
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