MN 128
Upakkilesa sutta: उपक्किलेस-सुत्तन्त
Upakkilesasutta
Suññatavagga
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ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान कौशाम्बी के घोषिताराम में विहार करते थे। उस समय कौशाम्बी में भिक्षु मंडन करते, कलह करते, विवाद करते, एक दूसरे को मुख (रूपी) शक्ति (=हथियार) से बेधते फिरते थे। तब कोई भिक्षु, जहाँ भगवान् थे, वहाँ जाकर भगवान् को अभिवादन कर, एक ओर खडा हो गया। एक ओर खडे हुये उस भिक्षु ने भगवान् से यो कहा—“यहाँ कौशाम्बी में भन्ते! भिक्षु मंडन करते, कलह करते, विवाद करते, एक दूसरे को मुखशक्ति से बेधते फिरते हैं। अच्छा हो यदि भन्ते! भगवान्, जहाँ वह भिक्षु हैं, वहाँ चलें।”
भगवान् ने मौन से उसे स्वीकार किया। तब भगवान् जहाँ वह भिक्षु थे, वहाँ गये। जाकर उन भिक्षुओं से बोले—
“बस भिक्षुओ! भंडन, कलह, विग्रह, विवाद (मत) करो।”
ऐसा कहने पर एक भिक्षु ने भगवान् से कहा—
“भन्ते! भगवान्! धर्म-स्वामी! रहने दें। परवाह मत करें। भन्ते! भगवान्! धर्म-स्वामी! दृष्ट-धर्म (इसी जन्म) के सुख के साथ विहार करें। हम इस भंडन, कलह, विग्रह, विवाद से (स्वयं निपट लेंगे)।’
दूसरी बार भी भगवान् ने उन भिक्षुओं से कहा—“बस भिक्षुओ ॰! ॰”। ॰। तीसरी बार भी भगवान् ॰। ॰।
तब भगवान् पूवाह्न समय (वस्त्र) पहिनकर, पात्र-चीवर ले कौशाम्बी में भिक्षाचार कर, भोजन कर, पिंड-पात से उठ, आसन समेट, पात्र चीवर ले, खडे ही खडे इस गाथा को बोले।
“बड़े शब्द करने वाले एक समान (यह) जन कोई भी अपने को बाल (=अज्ञ) नहीं मानते;
संघ के भंग होने (और) मेरे लिये मन में नहीं करते।।
मूढ, पंडित से दिखलाते, जीभ पर आई बात को बोलने वाले;
मन-चाहा मुख फैलाना चाहते है; जिस (कलह) से (अयोग्य मार्गपर) ले जाये गये है, उसे नहीं जानते।।
‘मुझे निन्दा’, ‘मुझे मारा’, ‘मुझे जीता’, ‘मुझे त्यागा’।
(इस तरह) जो उसको (मन में) बाँधते (=उपनहन) हैं, उनका वैर शांत नहीं होता।।
‘मुझे निन्दा’, ‘मुझे मारा’, ‘मुझे जीता’, ‘मुझे त्यागा’।
(इस तरह) जो उसको नहीं बाँधते, उनका वैर शांत हो जाता है।।
वैर से वैर यहाँ कभी शांत नहीं होता।
अ-वैर से (ही) शांत होता है, यही सनातन-धर्म है।।
दूसरे (=अपंडित) नहीं जानते, कि हम यहाँ मृत्यु को प्राप्त होंगे।
जो वहाँ (मृत्यु के पास) जाना जानते हैं, वे (पंडित) बुद्धिगत (कलहों को) शमन करते हैं।।
हड्डी तोडने वालों, प्राण हरने वालों, गाय-घोड़ा-धन-हरने वालों।
राष्ट्र को विनाश करने वालों (तक) का भी मेल होता है।।
यदि नम्र-साधु-विहारी धीर (पुरूष) सहचर=सहायक (=साथी) मिले।
तो सब झगड़ों को छोड, प्रसन्न हो, बुद्धिमान् उसके साथ विचरे।।
यदि नम्र साधु-विहारी धीर सहचर सहायक न मिले।
तो राजा की भाँति विजित राष्ट्र को छोड़, उत्तम मातंग-राज की भाँति अकेला विचरे।।
अकेला विचरना अच्छा हैं, बाल से मित्रता नहीं (अच्छी)।
बे-पर्वाह हो उत्तम मातंग-(=नाग) राज की भाँति अकेला विचरे, और पाप न करे।”
“खमनीय है भगवान्! यापनीय हैं भगवान्! मैं पिंड के लिये तकलीफ नहीं पाता।”
तब भगवान् आयुष्मान् भृगु को धार्मिक कथा से ॰ समुत्तेजित कर ॰, आसन से उठकर, जहाँ प्राचीन-वंश-दाव है, वहाँ गये। उस समय आयुष्मान् अनुरूद्ध, आयुष्मान् नन्दिय और आयुष्मान् किम्बिल प्राचीन-वंश-दाव में विहार करते थे। दाव-पालक (=वन-पाल) ने दूर से ही भगवान् को आते देखा। देखकर भगवान् से कहा—
“महाश्रमण! इस दाव में प्रवेश मत करो। यहाँ पर तीन कुल-पुत्र यथाकाम (=मौज से) विहर रहे हैं। उनको तकलीफ मत दो।”
आयुष्मान् अनुरूद्ध ने दाव-पाल को भगवान् के साथ बात करते सुना। सुनकर दाव-पाल से यह कहा—
“आवुस! दाव-पाल! भगवान् को मत मना करो। हमारे शास्ता भगवान् आये हैं।”
तब आयुष्मान् अनुरूद्ध जहाँ आयुष्मान् नन्दिय और आयुष्मान् किम्बिल थे वहाँ गये। जाकर बोले—
“आयुष्मानों! चलो आयुष्मानों! हमारे शास्ता भगवान् आ गये।”
तब आयुष्मान् अनुरूद्ध, आयुष्मान नन्दिय, आयुष्मान किम्बिल भगवान् की अगवानी कर, एक ने पात्र-चीवर ग्रहण किया, एक ने आसन बिछाया, एक ने पादोदक रक्खा। भगवान् ने बिछाये आसन पर बैठ पैर धोये। वे भी आयुष्मान् भगवान् को अभिवादन कर, एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे हुये आयुष्मान् अनुरूद्ध से भगवान् ने कहा—
“अनुरूद्धो! खमनीय तो है? यापनीय तो है? पिंड के लिये तो तुम लोग तकलीफ नहीं पाते?”
“खमनीय है, भगवान्!॰”
“अनुरूद्धों! क्या एकत्रित, परस्पर मोद-सहित, दूध-पानी हुये, परस्पर प्रिय-दृष्टि से देखते, विहरते हो?”
“हाँ, भन्ते! हम एकत्रित ॰।”
“तो कैसे अनुरूद्धो! तुम एकत्रित ॰।”
“भन्ते! मुझे, यह विचार होता है—‘मेरे लिये लाभ है! मेरे लिये सुलाभ प्राप्त हुआ है, जो ऐसे स-ब्रह्मचारियों (=गुरू भाइयों) के साथ विहरता हूँ’। भन्ते! इन आयुष्मानों में मेरा कायिक-कर्म अन्दर और बाहर से मित्रतापूर्ण होता है; वाचिक-कर्म अन्दर और बाहर से मित्रता-पूर्ण होता है; मानसिक-कर्म अन्दर और बाहर ॰। तब भन्ते! मुझे यह होता है—क्यों न मैं अपना मन हटा कर, इन्हीं आयुष्मानों के चित्त के अनुसार वर्तू। सो भन्ते! मैं अपने चित्त को हटाकर इन्हीं आयुष्मानों के चित्तों का अनुवर्तन करता हूँ। भन्ते! हमारे शरीर नाना हैं, किन्तु चित्त एक…।”
आयुष्मानृ नन्दी ने भी कहा—“भन्ते! मुझे यह होता है ॰।”
आयुष्मान् किम्बिल ने भी कहा—भन्ते! मुझे यह ॰।
“साधु, साधु, अनुरूद्धो! अनुरूद्धो! क्या तुम प्रमाद-रहित, आलस्य-रहित, संयमी हो, विहरते हो?”
“भन्ते! हाँ! हम प्रमाद-रहित ॰।”
“अनुरूद्धो! तुम कैसे प्रमाद-रहित ॰?”
“भन्ते! हमारे में जो पहिले ग्राम से भिक्षचार करके लौटता है, वह आसन लगाता हैं, पीने का पानी रखता है, कुडे की थाली रखता है। जो पीछे गाँव से पिंडचार करके लौटता है, (वह) भोजन (में से जो) बँचा रहता है, यदि चाहता है, खाता है, (यदि) नहीं चाहता हैं, तो (ऐसे) स्थान में, जहाँ हरियाली न हो, छोड देता है, या जीव-रहित पानी में छोड देता है। आसनो को समेटता है। पीने के पानी को समेटता है। कूडे की थाली को धोकर समेटता है। खाने की जगह पर झाडू देता है। पानी के घडे, पीने के घडे, या पाखाने के घडे में जिसे खाली देखता हैं; उसे (भर कर) रख देता हैै। यदि वह उसके होने लायक नहीं होता तो हाथ के इशारे से, हाथ के संकेत (=हत्थ-विलंघक) से दूसरों को बुलाकर, पानी के घडे, या पीने के घडे को (भर कर) रखवाता है। भन्ते! हम उसके लिये वाग्-युद्ध नहीं करते। भन्ते! हम पाँचवें दिन सारी रात धर्म-सम्बन्धी कथा करते बैठते है। इस प्रकार भन्ते! हम प्रमाद-रहित ॰।”
“साधु, साधु, अनुरूद्धो! अनुरूद्धो! इस प्रकार प्रमाद-रहित, निरालस, संयमी हो विहरते, क्या तुम्हें उत्तर-मनुष्य-धर्म अलमार्य-ज्ञान-दर्शन-विशेष अनुकूल-विहार प्राप्त है?”
“भन्ते! हम प्रमाद-रहित ॰ विहार करते, अवभास और रूपों के दर्शन को जानते है। किंतु वह अवभास, और रूपों के दर्शन हम लोगों को जल्द ही अन्तर्धान हो जाते है। हम इसका कारण नहीं जान पाते।”
“अनुरूद्धो! तुम्हें वह कारण जान लेना चाहिये। मैं भी सम्बोधि से पूर्व, न बुद्ध हुआ, बोधि-सत्व होते (समय) अवभास और रूपों के दर्शन को जानता था। मेरा वह अवमास और रूपों का दर्शन जल्द ही अन्तर्धान हो जाता था। तब मुझे, अनुरूद्धो! यह हुआ — क्या है हेतु (=कारण), क्या है प्रत्यय (=कार्य), जिससे मेरा अवमास और रूपों का दर्शन अन्तर्धान हो जाता है। तब मुझे अनुरूद्धों यह हुआ—(1) विचिकित्सा (=शंका, संदेह) मुझे उत्पन्न हुई, विचिकित्सा के कारण मेरी समाधि च्युत हो गई। समाधि के च्युत होने पर अवभास और रूपों का दर्शन अन्तर्धान होता है। सो मैं ऐसा करूँ, जिसमें फिर विचिकित्सा न उत्पन्न हो। सो मैं अनुरूद्धो! प्रमाद-रहित ॰ विहार करते, अवभास (=प्रकाश) और रूपों का दर्शन देखने लगा। (किंतु) वह अवभास और रूपों का दर्शन जल्द ही (फिर) अन्र्तधान हो जाता था। तब मुझे अनुरूद्धो! यह हुआ — क्या है हेतु ॰। तब मुझे अनुरूद्धो! हुआ—(2) अमनसिकार (=मन में दृढ़ करना), मुझे उत्पन्न हुआ। अ-मनसिकार के कारण मेरी समाधि च्युत हुईै ॰। सो मैं ऐसा करूँ, जिसमें फिर न विचिकित्सा न अ-मनसिकार उत्पन्न हो। सो मैं ॰। ॰ (3) थीन-मिद्ध (=स्त्यान-मिद्ध) ॰। ॰ न विचिकित्सा न अमनसिकार, न थीन-मिद्ध उत्पन्न हो। सो मैं ॰। ॰ (4) छम्मितत्त (=स्तम्भितत्व) ॰। स्तम्भितत्व (=जडता) के कारण मेरी समाधि च्युत हुई। समाधि के च्युत होने पर, अवमास और रूपों का दर्शन अन्तर्धान हुआ। अनुरूद्धो! जैसे पुरूष (अँधेरी रात मंे) रास्तें में जा रहा हो, उसके दोनों ओर बटेंरे उड जायँ। उसके कारण उसको स्तम्भितत्व उत्पन्न हो। ऐसे ही अनुरूद्धो! मुझे स्तम्भितत्व उत्पन्न हुआ। स्तम्भितत्व के कारण ॰। सो मैं ऐसा करूँ, जिसमें फिर न विचिकित्सा उत्पन्न हो, न अ-मनसिकार, न स्त्यान-मिद्ध, न स्तम्भितत्व। सो मैं अनुरूद्धो ॰। (5) ॰ उप्पील (=उब्बिल्ल=उत्पीडा=विह्वलता) ॰। अनुरूद्धो! पुरूष एक निधि (=खजाना) को ढूँढता, एक ही बार पाँच निधियों के मुख को पा जाय, जिसके कारण उसे उत्पीडा उत्पन्न हो। ऐसे ही अनुरूद्धों! उत्पीडा उत्पन्न हुई। उत्पीडा के कारण मेरी समाधि च्युत हुई ॰। सो मैं ऐसा करूँ, जिसमें मुझे फिर न विचिकित्सा उत्पन्न हो ॰ न उत्पीडा। सो मैं अनुरूद्धो! ॰। ॰ (6) दुटठृल्ल (=दुःस्थौल्य) ॰। सो मैं ऐसा करूँ, जिसमें मुझे न विचिकित्सा उत्पन्न हो ॰, न दुःस्थौल्य। सो मैं ॰। तब मुझे अनुरूद्धो! यह हुआ—(7) अति-आरब्ध-वीर्य (=अच्चारद्ध-वीरिय, अत्यधिक अभ्यास) मुझे उत्पन्न हुआ ॰। जैसे अनुरूद्धो! ॰। सो मैं ऐसा करूँ, जिसमें मुझे ॰ अत्यारब्ध वीय। ॰। (8) अति-लीन-वीर्य (=अतिलीनवीरिय) ॰। जैसे अनुरूद्धो! पुरूष बटेर को ढीला पकडे, वह उसके हाथ से उड जाय ॰। सो मैं ॰ अति-लीन-वीर्य ॰। ॰ (9) अभिजप्प (=अभिजल्प) ॰। सो मैं ॰ अभिजप्प ॰। ॰ (10) नानात्वप्रज्ञा (=नानात्तपंञा) ॰।
“सो मैं ॰ नानात्व-प्रज्ञा ॰। ॰ (11) अतिनिध्यायितत्व (=अतिनिज्झायतित्त) रूपों का मुझे उत्पन्न हुआ। अतिनिध्यायितत्व के कारण मेरी रूपों की समाधि-च्युत हुई। समाधि के च्युत होने से अवभास, और रूपों का दर्शन अन्तर्धान हुआ। सो में ऐसा करूँ, जिसमें मुझे फिर न (1) विचिकित्सा उत्पन्न हो, न (2) अ-मनसिकार, न (3) स्त्यान-मुद्ध, न (4) स्तभितत्व, न (5) उत्पीडा, न (6) दुःस्थौल्य, न (7) अत्यारब्ध-वीर्य, न (8) अति-लीन-वीर्य, न (9) अनभि-जल्प, न (10) अनात्व-प्रज्ञा, न (11) रूपो का अति-निध्यायितत्व। सो मैने अनुरूद्धो! ‘विचिकित्सा चित्त का उप-क्लेश (=मल) है’ जानकर, चित्त के उप-क्लेश विचिकित्सा को छोड दिया; ‘अ-मनसिकार चित्त का उप-क्लेश हैं’ जानकर, चित्त के उप-क्लेश अ-मनसिकार को छोड दिया; ॰ स्त्यान-मृद्ध ॰; ॰ स्तम्भितत्व ॰; ॰ उत्पीडा ॰; ॰ दुःस्थौल्य ॰; ॰ अत्यारब्ध-वीर्य ॰ अति-लीन-वीर्य ॰; ॰ अभि-जल्प ॰; ॰ नानात्व-प्रज्ञा ॰; ॰ रूपों का अति-नि-ध्यायितत्व चित्त का उप-क्लेश है’ जानकर, चित्त के उप-क्लेश रूपों के अति-निध्यायितत्व को छोड दिया। सो मैं अनुरूद्धो! प्रमाद-रहित निरालस, संयमी हो विहरते अवभास को जानता, और रूपों को नहीं देखता; रूपों को देखता, और अवमास को नहीं पहिचानता (कि) ‘केवल रात (है, या) केवल दिन, या केवल राज-दिन’।
“तब मुझे अनुरूद्धो! यह हुआ — क्या हेतु हे, क्या प्रत्यय है, (कि) मैं अवभास को जानता हूँ ॰? तब मुझे अनुरूद्धो! यह हुआ — जिस समय मैं रूप को निमित्त (=विशेषता) को मन में न कर, अवभास के निमित्त ही हो मन में करता हूँ, उस समय अवभास को पहिचानता हूँ, और रूपों को नहीं देखता। जिस समय मैं अवभास के निमित्त को मन में न कर, रूपों के निमित्त को मन में करता हूँ, उस समय रूपों को देखता हूँ, ‘केवल रात है, केवल दिन है, केवल रात-दिन है’ इस अवभास को नहीं पहिचानता। सो मैं अनुरूद्धो! प्रमाद-रहित ॰ विहरते, अल्प (=परित्त) अवभास को भी पहिचानता, अल्प रूप को भी देखता; अ-प्रमाण (=महान्) अवभास को भी पहिचानता, अ-प्रमाण रूपों को भी देखता—‘केवल रात है, केवल दिन है, केवल रात-दिन है’। तब मुझे अनुरूद्धो! मुझे यह हुआ — जिस समय समाधि अल्प होती है, उस समय मेरा चक्षु अल्प होता है; सो मैं अल्प चक्षु से परिच्छिन्न (=अल्प) ही अवभास को जानता हूँ, परिच्छिन्न ही रूपों को देखता हूँ। जिस समय अप्रमाण समाधि होती है, उस समय मेरा चक्षु अप्रमाण होता है; सो मैं अप्रमाण चक्षु से अ-प्रमाण अवभास को जानता; अप्रमाण रूपों—केवल दिन, केवल रात, केवल रात-दिन को देखता। क्योंकि अनुरूद्धो! मैंने ‘विचिकित्सा चित्त का उप-क्लेश है’ जानकर, चित्त के उप-क्लेश विचिकित्सा को छोड दिया था। ‘अमसिकार ॰। स्त्यानमृद्ध ॰। स्तम्भितत्व ॰। उत्पीडा ॰। दु‘स्थौलय ॰। अत्यारब्ध-वीर्य ॰। अति-लीन-वीर्य ॰। अभि-जल्प ॰। नानार्थ-संज्ञा ॰। ‘रूपों का अति-निध्यायितत्व चित्त का उपक्लेश है’ जानकर, चित्त के उप-क्लेश अतिनिध्यायितत्व को छोड दिया था।
“तब मुझे अनुरूद्धो! ऐसा हुआ — जो मेरे चित्त को उप-क्लेश थे, वह छुट गये। हाँ तो, अब मैं तीन प्रकार से समाधि भावना करूँ। सो मैं अनुरूद्धो! वितर्क-सहित भी समाधि की भावना करता। वितर्क-रहित विचार मात्रवाली समाधि की भावना करता। वितर्क-रहित समाधिक की भी भावना करता। प्रीति (=स-प्रीतिक) समाधि भी ॰;। उपेक्षा-युक्त समाधि ॰। क्योंकि, अनुरूद्धो! मैंने स-वितर्क स-विचार समाधि की भी भावना की थी; अवितर्क विचारमात्रवाली समाधि ॰। अवितर्क अविचार समाधि ॰। स-प्रीतिक ॰। निःप्रीतिक ॰। सात-सह-गत ॰। मेरे लिये ज्ञानदर्शन हो गया। मेरी चित्त की विमुक्ति (=मुक्ति) अटल हो गई। यह अन्तिम जन्म है। अब पुनर्भव (=आवागमन) नहीं।”
भगवान्! (इस प्रकार बोले); आयुष्मान् अनुरूद्ध ने सन्तुष्ट हो भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
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