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MN 45

Cūḷadhammasamādāna sutta: चूल-धम्मसमादान-सुत्तन्त

Cūḷadhammasamādānasutta

Cūḷayamakavagga

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ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओ!”

“भदन्त!” (कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओ! यह चार धर्मसमादान (= धर्म की स्वीकृतियाँ) है। कौन से चार?—भिक्षुओं! (1) एक धर्मसमादान वर्तमान मंे सुखद किन्तु भविष्य में दुःख-विपाक वाला होता है।…(2) वर्तमान में भी दुःखद और भविष्य में भी दुःखद होता है।…(3) वर्तमान में दुःखद, भविष्य में सुखद होता है।…(4) वर्तमान में भी सुखद और भविष्य में भी सुखद होता है।

(1) “भिक्षुओं! कौनसा धर्मसमादान वर्तमान में सुखद, (किन्तु) भविष्य में दुःखद होता है?—भिक्षुओ! कोई कोई श्रमण ब्राह्मण इस वाद के मानने वाले इस दृष्टि (= धारणा) वाले होते है—‘काम (= विषय) में कोई दोष नहीं।’ वह कामों से पतित होते हैं। वह मौलि (= जूडा)-बद्ध परिब्राजिका (= साधुनी स्त्रियों) का सेवन करते है। वह कहते है—‘क्यों वह श्रमण ब्राह्मण कामों के विषय में भविष्य का भय देख कामों के छोडने को कहते है, कामों की परिज्ञा (= परित्याग) को कहते हैं। इस तरूण, मृदुल, लोमश परिब्राजिका का बाँह से स्पर्श (तो) सुखमय है’—और कामों में पतित होते है। वह कामों में पतित हो, काया छोड मरने के बाद अपाय=दुर्गति, विनिपात=नरक में उत्पन्न होते हैं। वह वहाँ दुःखमय, तीव्र, कटु वेदनाओं को झेलते हैं। (तब) वह यह कहते हैं—‘वह आप श्रमण ब्राह्मण कामों में इसी भविष्य के भय को देख कामों के प्रहाण को कहते थे, कामों की परिज्ञा (= त्याग) को कहते थे। यह हम कामों के हेतु, कामों के कारण दुःखमय, तीव्र कटु वेदना झेल रहे है।’ जैसे भिक्षुओ! ग्रीष्म के अन्तिम मास में मालुवा (लता) का पका फल गिर पडे़। और भिक्षुओ! वह मालुवा का बीज किसी शाल (= साखू) के वृक्ष के नीचे पड़े। तब भिक्षुओ! जो शाल वृक्ष पर रहने वाला देवता है, वह भयभीत, उद्विग्न हो संत्रास को प्राप्त होवे। तब उस शाल वृक्ष पर रहने वाले देवता के मित्र अमात्य, जाति-बिरादरी वाले आराम-देवता, वन-देवता, वृक्ष-देवता, औषधि-तृण-वनस्पतियों में बसने वाले देवता आकर जमा हो उसे इस प्रकार आश्वासन दे—‘आप मत डरें, क्या जाने इस मालुवा के बीज को मोर निगल जाये, या मृग खा जाये, या जंगल की आग से जल जाये, या वन में काम करने वाले उठा ले जायें; या विचरने वाले खा जायें, या बिना बीज की होवे। तब भिक्षुओ! उस मालुवा के बीज को न मोर निगले, न मृग खाये ॰ न विचरने वाले खायें, और उसको बीज होवे। वह वर्षा कालीन मेघ से सिक्त हो अच्छी प्रकार उगे। उस (वृक्ष) पर तरूण, मृदुल, लोमश मालुवा लता विलवित होवे। यह उस शाल को लपेट ले। तब भिक्षुओ! उस शाल पर बसने वाले देवता को ऐसा हो। क्यों उन (मेरे) मित्र-अमात्य ॰ देवताओं ने आकर जमा हो मुझे इस प्रकार आश्वासन दिया—आप मत डरें ॰। इस तरूण, मृदुल, लोमश, विलंबिनी मालुवा लता का स्पर्श (तो) सुखमय है।—वह (लता) उस शाल को पकडे। पकडकर ऊपर छत्ता बनावे। ऊपर छत्ता बनाकर नीचे घना करे। नीचे घना कर उस शाल के बडे बढे स्कन्धों को प्रदारित करे। तब उस शाल पर रहने वाले देवता को ऐसा हो—उन (मेरे) मित्र-अमात्य ॰ देवताओं ने आकर मुझे इस प्रकार आश्वासन दिया—आप मत डरें ॰। और मैं अब उस मालुवा-बीज के कारण दुःखमय, तीव्र, कटु वेदनाओं को झेल रहा हूँ। ऐसे ही भिक्षुओ! वह श्रमण-ब्राह्मण इस वाद के मानने वाले ॰ झेल रहे है। भिक्षुओ! वह वर्तमान में सुखमय, भविष्य में दुःखमय धर्मसमादान कहा जाता है।

(2) “भिक्षुओ! कौनसा धर्मसमादान वर्तमान में भी दुःखमय और भविष्य में भी दुःखमय है?—भिक्षुओ! यहाँ कोई अचेलक (= नंगा साधु) होता है ॰ शाम को जलशयन के व्यापार में लग्न होता है, वह काया को छोड मरने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न होता है। भिक्षुओ! यह कहा जाता है वर्तमान में भी दुःखद, और भविष्य में भी दुःखद धर्मसमादान।

(3) “भिक्षुओं! कौनसा धर्मसमादान वर्तमान में दुःखद, (किन्तु) भविष्य में सुखमय है?—भिक्षुओ! यहाँ कोई (पुरूष) स्वभाव से ही तीव्र रागवाला होता है, वह निरंतर राग से उत्पन्न दुःख, दौर्मनस्य को झेलता रहता है। स्वभाव से तीव्र द्वेषवाला होता है ॰। स्वभाव से ही तीव्र मोह वाला होता है; वह निरंतर मोह से उत्पन्न दुःख दौर्मनस्य झेलता रहता है। वह दुःख=दौर्मनस्य के साथ ही अश्रुमुख, रूदन करते परिपूर्ण परिशुद्ध ब्रह्मचर्य का आचरण करता है। वह काया छोड मरने के बाद सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होता है। भिक्षुओ! यह कहा जाता है ॰।

(4) “भिक्षुओ! कौनसा धर्मसमादान वर्तमान में भी सुखद है, भविष्य में भी सुखमय है?—भिक्षुओं! यहाँ कोई (पुरूष) स्वभाव से ही तीव्र राग वाला नहीं होता, वह निरन्तर राग से उत्पन्न दुःख दौर्मनस्य को नहीं अनुभव करता। ॰ तीव्र द्वेष वाला नहीं होता ॰। ॰ तीव्र मोह वाला नहीं होता ॰। वह ॰ प्रथम-ध्यान ॰ द्वितीय-ध्यान ॰ तृतीय-ध्यान ॰ चतुर्थ-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। वह काया छोड मरने के बाद सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होता है। भिक्षुओ! यह वर्तमान में भी सुखद, भविष्य में भी सुखमय धर्मसमादान कहा जाता है। भिक्षुओ! यह चार धर्म-समादान हैं।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण को अभिनंदित किया।

Bu çeviri hakkında

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

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